फ़रवरी 13, 2026

काशी तमिल संगमम् और ‘तमिल करकलम्’: भाषा के माध्यम से भारत को जोड़ने की ऐतिहासिक पहल

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भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ विविधता केवल पहचान नहीं, बल्कि शक्ति का आधार है। इसी विविधता को सांस्कृतिक और भाषाई एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य काशी तमिल संगमम् और इससे जुड़े ‘तमिल करकलम्’ अभियान ने किया है। ये पहलें केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सदियों पुराने रिश्तों का पुनर्जीवन हैं।

🔸 काशी तमिल संगमम्: सभ्यताओं का सांस्कृतिक संगम

काशी तमिल संगमम् की शुरुआत वर्ष 2022 में स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर की गई थी। इसका मूल विचार काशी और तमिलनाडु के बीच आध्यात्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक रिश्तों को फिर से मजबूत करना था।

वर्ष 2025 में आयोजित इसका चौथा संस्करण काशी तमिल संगमम् 4.0 नई ऊँचाइयों तक पहुँचा। इस आयोजन में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास और काशी हिंदू विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इस संगमम् के दौरान—

  • तमिल भाषा और साहित्य की समृद्ध परंपरा को साझा किया गया
  • शास्त्रीय संगीत, भरतनाट्यम, योग और आयुर्वेद जैसे सांस्कृतिक तत्वों को मंच मिला
  • छात्रों, कलाकारों, शिक्षाविदों और आम नागरिकों की भागीदारी ने इसे जन-सांस्कृतिक आंदोलन बना दिया

यह आयोजन भारत की उस सोच को सजीव करता है, जहाँ विविध भाषाएँ और परंपराएँ मिलकर एक साझा राष्ट्र-चेतना बनाती हैं।

📗 ‘तमिल करकलम्’: भाषा से आत्मीय जुड़ाव

काशी तमिल संगमम् के अंतर्गत वर्ष 2025 में शुरू किया गया ‘Let Us Learn Tamil – तमिल करकलम्’ अभियान एक अभिनव शैक्षिक प्रयोग रहा। इसका उद्देश्य था—काशी के विद्यार्थियों को तमिल भाषा से परिचित कराना और उनके मन में दक्षिण भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान पैदा करना।

इस पहल की प्रमुख विशेषताएँ रहीं—

  • वाराणसी के 50 से अधिक स्कूलों में तमिल भाषा का परिचय
  • सरल शब्दावली, संवाद आधारित शिक्षण और डिजिटल सामग्री का उपयोग
  • भाषा को बोझ नहीं, बल्कि अनुभव के रूप में प्रस्तुत करना

यह अभियान यह संदेश देता है कि भाषा सीखना केवल ज्ञान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवेदनशीलता भी सिखाता है।

🌟 प्रधानमंत्री की दृष्टि: भाषा एक सेतु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में इन पहलों को भारत की आत्मा से जुड़ा प्रयास बताया। उनके अनुसार भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने वाली शक्ति है। काशी तमिल संगमम् जैसे कार्यक्रम भारत की उस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जहाँ भिन्नताओं में भी अपनापन होता है।

🧭 निष्कर्ष: सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा

काशी तमिल संगमम् और तमिल करकलम् अभियान भारत की भाषाई विविधता को सम्मान देने वाली दूरदर्शी पहलें हैं। ये कार्यक्रम न केवल उत्तर और दक्षिण को जोड़ते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाते हैं कि भाषा और संस्कृति किसी क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधी होती।

यह पहल भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक सशक्त कदम है—जहाँ संवाद, समझ और सम्मान के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा रहा है।


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