ईरान युद्ध के छह महीने पूरे होने पर नैन्सी पेलोसी का ट्रंप पर हमला, रणनीति को बताया ‘बड़ी विफलता’

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अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को छह महीने पूरे होने के मौके पर अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी सामने आई है। पूर्व अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति पर कड़ा हमला बोला है। सोशल मीडिया पर जारी अपने एक पोस्ट में पेलोसी ने इस सैन्य अभियान को ट्रंप की ओर से चुना गया युद्ध बताते हुए इसे गंभीर रणनीतिक भूल करार दिया। उन्होंने दावा किया कि संघर्ष के दौरान अमेरिकी सैन्यकर्मियों की जान गई है और सैकड़ों घायल हुए हैं।

पेलोसी की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर राजनीतिक मतभेद लगातार गहरे होते जा रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेता राष्ट्रपति ट्रंप से युद्ध के उद्देश्य, खर्च, सैन्य रणनीति और भविष्य की दिशा को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। वहीं ट्रंप प्रशासन की ओर से अभियान को अमेरिकी सुरक्षा हितों से जोड़ते हुए अपनी कार्रवाई का बचाव किया गया है।

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छह महीने बाद भी रणनीतिक लक्ष्य पर सवाल

पेलोसी ने अपने पोस्ट में कहा कि संघर्ष को शुरू हुए छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन उनके अनुसार अमेरिकी अभियान अभी तक अपने घोषित रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सका है। उन्होंने युद्ध पर खर्च हुए अरबों डॉलर और अमेरिकी सैनिकों के नुकसान का उल्लेख करते हुए ट्रंप प्रशासन की नीतियों की आलोचना की।

उनकी टिप्पणी का मुख्य केंद्र यही रहा कि किसी भी सैन्य अभियान की सफलता का आकलन केवल सैन्य कार्रवाई या हमलों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके अंतिम रणनीतिक परिणामों से होना चाहिए। यदि युद्ध के बाद भी क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा, स्पष्ट राजनीतिक समाधान और निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं होते, तो अभियान की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

पेलोसी ने इसी संदर्भ में ट्रंप के अभियान को व्यंग्यात्मक रूप से ‘ऑपरेशन एपिक फेल्योर’ कहा। यह शब्दावली पहले भी ट्रंप की ईरान नीति के आलोचकों द्वारा इस्तेमाल की जा चुकी है। अमेरिकी सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने भी अप्रैल में ट्रंप की ईरान नीति की आलोचना करते हुए इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया था।

युद्ध की मानवीय कीमत बनी बड़ा मुद्दा

ईरान संघर्ष को लेकर अमेरिकी विपक्ष की सबसे बड़ी चिंताओं में सैन्यकर्मियों की सुरक्षा भी शामिल है। पेलोसी ने अपने पोस्ट में 19 अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत और 750 से अधिक के घायल होने का दावा किया। यह आंकड़ा उनके बयान के संदर्भ में सामने आया है और इसे उनके राजनीतिक आरोप के रूप में देखना जरूरी है।

युद्धों में सैन्य नुकसान के अलावा व्यापक मानवीय और आर्थिक प्रभाव भी होते हैं। संघर्ष लंबा खिंचने पर सैनिकों के परिवारों, प्रभावित नागरिकों, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है। ईरान से जुड़ा संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ से ‘एपिक फेल्योर’ तक

अमेरिकी अभियान का आधिकारिक नाम ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ बताया गया है। लेकिन ट्रंप के विरोधियों ने इसे ‘ऑपरेशन एपिक फेल्योर’ कहना शुरू कर दिया। यह केवल राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि अभियान के उद्देश्यों और परिणामों को लेकर चल रही बहस को भी दर्शाता है।

अप्रैल में सीनेट में चक शूमर ने दावा किया था कि युद्ध के कारण ऊर्जा कीमतों, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता पर दबाव बढ़ा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि आखिर अमेरिकी प्रशासन की जीत की स्पष्ट परिभाषा क्या है।

बाद में जून में भी कुछ अमेरिकी सांसदों ने अभियान के परिणामों को लेकर असंतोष व्यक्त किया। कांग्रेस की सदस्य मेडेलीन डीन ने कहा था कि ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ का अंत ‘ऑपरेशन एपिक फेल्योर’ के रूप में हुआ। उन्होंने सैन्यकर्मियों के बलिदान और घायल सैनिकों को याद करते हुए प्रशासन की रणनीति की आलोचना की थी।

ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल

ईरान युद्ध को लेकर अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अमेरिका आगे किस दिशा में जाएगा। किसी भी लंबे सैन्य संघर्ष में शुरुआत के उद्देश्यों और बाद में पैदा हुई परिस्थितियों के बीच अंतर बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने सैन्य दबाव बनाए रखने, बातचीत का रास्ता अपनाने या संघर्ष को समाप्त करने जैसी कठिन चुनौतियां आती हैं।

ईरान के मामले में यह चुनौती और बड़ी है क्योंकि संघर्ष का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहता। मध्य पूर्व के दूसरे देश, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी इससे प्रभावित होते हैं। युद्ध लंबा चलने पर तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

विपक्ष का बढ़ता राजनीतिक दबाव

पेलोसी का बयान अमेरिकी राजनीति में बढ़ते दबाव का एक और संकेत माना जा रहा है। डेमोक्रेटिक नेताओं का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन ने पर्याप्त स्पष्टता के बिना अमेरिका को एक बड़े सैन्य संघर्ष में झोंक दिया। वे कांग्रेस की भूमिका, युद्ध की संवैधानिक प्रक्रिया और प्रशासन की जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।

हाउस डेमोक्रेटिक नेता हकीम जेफ्रीज ने जून में भी ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति की आलोचना की थी और युद्ध की लागत तथा अमेरिकी सैनिकों के नुकसान का मुद्दा उठाया था।

हालांकि, ट्रंप समर्थक इस आलोचना से अलग दृष्टिकोण रखते हैं। उनका तर्क है कि ईरान पर सैन्य दबाव का उद्देश्य अमेरिकी और सहयोगी देशों की सुरक्षा को मजबूत करना तथा क्षेत्र में खतरे को कम करना है। इसलिए अभियान का अंतिम मूल्यांकन केवल तत्काल नुकसान के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

छह महीने बाद आगे क्या?

छह महीने पूरे होने के बाद ईरान संघर्ष अब केवल सैन्य अभियान का विषय नहीं रह गया है। यह अमेरिकी घरेलू राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, ऊर्जा बाजार और मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ चुका है।

नैन्सी पेलोसी का बयान इसी व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है। उन्होंने युद्ध की लागत और सैनिकों के नुकसान को आधार बनाकर ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर, प्रशासन के समर्थक सैन्य अभियान को अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आवश्यक बताते रहे हैं।

आने वाले समय में इस संघर्ष का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होगा कि अमेरिका अपने घोषित उद्देश्यों को कितनी हद तक हासिल कर पाता है और क्षेत्र में स्थायी शांति तथा सुरक्षा स्थापित करने के लिए क्या रास्ता अपनाता है। फिलहाल पेलोसी का बयान यह स्पष्ट करता है कि ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राजनीति में बहस खत्म नहीं हुई है। छह महीने बाद भी युद्ध की कीमत, रणनीतिक उपलब्धियों और भविष्य की दिशा पर तीखी राजनीतिक लड़ाई जारी है।

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