वापसी के बाद भी न्याय की दरकार — प्यार, शादी का झांसा और पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल
प्रतापगढ़/मुंबई। प्रतापगढ़ जिले के जलालपुर (डीहवा) गांव की रहने वाली प्रियंका की मुंबई से बरामदगी के बाद भी उसके परिवार की परेशानियां खत्म नहीं हुई हैं। युवती और उसके पिता महेश कुमार द्वारा लगाए गए आरोपों ने शादी का झांसा देकर युवती को मुंबई ले जाने, वहां कथित रूप से गलत परिस्थितियों में फंसने और बाद में पुलिस कार्रवाई को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।

परिवार का कहना है कि युवती को वापस घर लाने के बाद अब उनकी प्राथमिकता मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई है। दूसरी ओर, पूरे घटनाक्रम में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
शादी का भरोसा देकर मुंबई बुलाने का आरोप
प्रियंका के अनुसार, रायबरेली जिले के रोखा गांव निवासी विशाल कुमार भारती, पुत्र दिलीप कुमार, ने उससे शादी करने का भरोसा दिलाया था। परिवार का आरोप है कि इसी भरोसे के आधार पर युवती मुंबई चली गई।
प्रियंका ने यह भी दावा किया कि मुंबई जाने से पहले उसे घर से निकलने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई थी। उसके पिता के अनुसार, जलालपुर डीहवा गांव के कोटेदार सुशील कुमार भारती के बेटे, जिसे परिवार ‘अन्नू’ के नाम से जानता है, ने कथित तौर पर विशाल के कहने पर युवती को पैसे दिए थे।
इन आरोपों की वास्तविकता और दोनों व्यक्तियों की भूमिका जांच का विषय है।
मुंबई पहुंचने के बाद बदले हालात
प्रियंका का कहना है कि मुंबई पहुंचने के बाद विशाल उसे दादर रेलवे स्टेशन के आसपास स्थित एक कमरे में ले गया। उसके मुताबिक कमरे में पहले से कई अन्य युवक मौजूद थे।
युवती ने आरोप लगाया है कि वहां उसके साथ अनुचित व्यवहार करने और गलत तरीके से छूने का प्रयास किया गया। परिस्थितियों से घबराकर वह किसी तरह वहां से निकलने में सफल हुई और दादर रेलवे स्टेशन पहुंची।
यह आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। इनकी पुष्टि के लिए पुलिस जांच, मेडिकल रिकॉर्ड, संभावित प्रत्यक्षदर्शियों, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल फोन की जानकारी तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की आवश्यकता हो सकती है।
दादर स्टेशन से पुलिस तक पहुंची युवती
दादर रेलवे स्टेशन पर भटकती हुई मिलने के बाद पुलिस ने युवती को अपने संरक्षण में लिया। परिवार के अनुसार, उसे पहले चिकित्सकीय जांच के लिए ले जाया गया और इसके बाद बाल गृह/चिल्ड्रन्स होम भेजे जाने की प्रक्रिया हुई।
बाद में प्रतापगढ़ से परिजनों ने आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी की और युवती को वापस अपने साथ ले आए।
इस घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने रखा है कि दूसरे शहर में बरामद हुई किसी युवती की सुरक्षा, बयान और पुनर्वास की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ाई गई और उसके द्वारा लगाए गए आरोपों की जानकारी संबंधित स्थानीय पुलिस तक किस रूप में पहुंची।
घर से गायब होने के बाद पिता ने दी थी तहरीर
प्रियंका के लापता होने के बाद उसके पिता महेश कुमार ने स्थानीय महेशगंज थाने में लिखित शिकायत दी थी। परिवार का कहना है कि शिकायत में कथित रूप से शामिल व्यक्ति का नाम और मोबाइल नंबर जैसी जानकारी भी उपलब्ध कराई गई थी।
परिवार का दावा है कि इसके बावजूद उन्हें अपेक्षित स्तर की कार्रवाई दिखाई नहीं दी। अब बेटी की वापसी के बाद पिता चाहते हैं कि पहले दी गई शिकायत और मुंबई में सामने आए घटनाक्रम को एक साथ जोड़कर पूरे मामले की जांच की जाए।
समझौते के दबाव का भी लगाया आरोप
महेश कुमार का आरोप है कि पुलिस द्वारा उन्हें थाने बुलाकर समझौते या सुलहनामे से संबंधित कागजात पर हस्ताक्षर कराने का प्रयास किया गया। परिवार के अनुसार, उन्हें यह भी बताया गया कि युवती के साथ कोई गंभीर घटना साबित नहीं हुई है, इसलिए मामला समाप्त किया जा सकता है।
हालांकि, किसी मामले में समझौता अथवा कार्रवाई का निर्णय केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि लागू कानून, पीड़िता के बयान, उपलब्ध साक्ष्यों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर होना चाहिए।
परिवार इसी बिंदु पर निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।
परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल
प्रियंका के पिता का कहना है कि यदि उनकी बेटी को शादी का भरोसा देकर दूसरे शहर ले जाया गया था और वहां उसके साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार हुआ, तो केवल उसके सुरक्षित वापस लौट आने से पूरे घटनाक्रम की जांच समाप्त नहीं होनी चाहिए।
उनका कहना है कि पुलिस को यह पता लगाना चाहिए कि युवती मुंबई क्यों गई, उसे किसने बुलाया, यात्रा के लिए आर्थिक सहायता किसने दी, मुंबई में वह किन लोगों के संपर्क में थी और दादर स्टेशन पहुंचने से पहले उसके साथ वास्तव में क्या हुआ।
इन सवालों के जवाब साक्ष्यों और जांच के माध्यम से ही सामने आ सकते हैं।
मोबाइल और डिजिटल साक्ष्य हो सकते हैं अहम
ऐसे मामलों में मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, चैट, सोशल मीडिया बातचीत, लोकेशन संबंधी उपलब्ध जानकारी, टिकट या यात्रा रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यदि युवती और संबंधित व्यक्तियों के बीच शादी अथवा मुंबई बुलाने को लेकर बातचीत हुई थी, तो डिजिटल रिकॉर्ड घटनाक्रम की कड़ियों को समझने में मदद कर सकते हैं। इसी तरह, स्टेशन और आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज से भी घटनाओं की समयरेखा तैयार की जा सकती है।
हालांकि, किसी भी डिजिटल सामग्री की प्रामाणिकता और कानूनी स्वीकार्यता जांच की प्रक्रिया में निर्धारित की जानी चाहिए।
पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवाल
इस पूरे प्रकरण में परिवार की सबसे बड़ी मांग पुलिस जांच को लेकर है। परिवार चाहता है कि शिकायत में लगाए गए प्रत्येक आरोप की अलग-अलग जांच हो और यदि जांच में किसी व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
साथ ही, यदि किसी आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप जांच में प्रमाणित नहीं होते हैं, तो उसके खिलाफ निष्कर्ष भी साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
इसलिए मामले में निष्पक्षता और पारदर्शिता दोनों महत्वपूर्ण हैं।
प्रियंका और उसके पिता की मांग
प्रियंका का कहना है कि उसने जिस भरोसे के आधार पर मुंबई जाने का फैसला किया था, वहां परिस्थितियां उसकी अपेक्षा के विपरीत हो गईं। उसका दावा है कि खतरा महसूस होने के बाद उसने वहां से निकलकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की।
उसके पिता महेश कुमार की मांग है कि उनकी बेटी के बयान को गंभीरता से लिया जाए और विशाल कुमार भारती सहित उन सभी लोगों की भूमिका की जांच की जाए जिनके नाम परिवार ने शिकायत या अपने बयानों में बताए हैं।
मामला अभी जांच और साक्ष्यों का विषय
इस मामले में लगाए गए आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। विशाल कुमार भारती और अन्य संबंधित व्यक्तियों का पक्ष सामने आना तथा पुलिस की आधिकारिक जांच रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल परिवार की मांग यही है कि मामले को केवल आपसी विवाद या समझौते के रूप में देखने के बजाय उपलब्ध शिकायत, युवती के बयान और मुंबई में हुई घटनाओं को ध्यान में रखकर निष्पक्ष जांच की जाए।
प्रियंका की सुरक्षित घर वापसी के बाद अब परिवार की नजर इस बात पर है कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और कथित घटनाक्रम से जुड़े सवालों का जवाब कब मिलता है।