BRICS नेटवर्क यूनिवर्सिटी की बैठक में पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण पर जोर, डिजिटल युग की चुनौतियों पर हुआ मंथन

नई दिल्ली। भारत की 2026 की BRICS अध्यक्षता के दौरान शिक्षा और ज्ञान परंपराओं से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के केंद्र में लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हुई। इसी क्रम में शिक्षा मंत्रालय की ओर से BRICS नेटवर्क यूनिवर्सिटी (BRICS NU) की बैठक का आयोजन किया गया। यह बैठक 20 जुलाई 2026 को वर्चुअल माध्यम से आयोजित हुई, जिसमें डिजिटल दौर में पारंपरिक और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण से जुड़े विषय पर विचार-विमर्श किया गया।
बैठक का मुख्य विषय था—“डिजिटल युग में पारंपरिक और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण की आवश्यकता और चुनौतियां।” यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तेजी से बदलती तकनीक, वैश्वीकरण और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के बीच दुनिया की अनेक प्राचीन ज्ञान परंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इन परंपराओं को किस तरह सुरक्षित रखा जाए और नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
BRICS मंच पर ज्ञान परंपराओं की चर्चा
BRICS देशों के बीच सहयोग केवल आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं है। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में सहयोग भी इस समूह की व्यापक साझेदारी का हिस्सा है। BRICS नेटवर्क यूनिवर्सिटी इसी प्रकार के शैक्षणिक सहयोग को आगे बढ़ाने वाला मंच है।
भारत की 2026 की BRICS अध्यक्षता के दौरान इस मंच पर पारंपरिक ज्ञान को चर्चा का विषय बनाना व्यापक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। भारत समेत कई BRICS देशों के पास सदियों पुरानी चिकित्सा, कृषि, पर्यावरण, वास्तुकला, हस्तशिल्प, लोकज्ञान और सामाजिक जीवन से जुड़ी ज्ञान प्रणालियां मौजूद हैं।
इनमें से बहुत-सी परंपराएं पुस्तकों में दर्ज होने के बजाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही हैं। आधुनिक जीवनशैली में बदलाव के साथ ऐसी मौखिक परंपराओं के सामने संरक्षण की चुनौती और बड़ी हो गई है।
डिजिटल युग में संरक्षण की नई संभावना
तकनीक को अक्सर पारंपरिक ज्ञान के लिए चुनौती के रूप में देखा जाता है, लेकिन यही तकनीक उसके संरक्षण का प्रभावी माध्यम भी बन सकती है।
पुराने दस्तावेजों का डिजिटलीकरण, लोक परंपराओं की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, डिजिटल अभिलेखागार, ऑनलाइन शोध डेटाबेस और बहुभाषी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऐसे ज्ञान को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
उदाहरण के लिए किसी क्षेत्र की पारंपरिक कृषि पद्धति केवल स्थानीय किसानों के अनुभव तक सीमित न रहकर डिजिटल दस्तावेज के रूप में संरक्षित की जा सकती है। इसी प्रकार लोकगीत, हस्तशिल्प तकनीक, पारंपरिक जल प्रबंधन या स्थानीय वनस्पतियों से संबंधित ज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से रिकॉर्ड करके शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों तक पहुंचाया जा सकता है।
इस दृष्टि से डिजिटल तकनीक पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच पुल का काम कर सकती है।
केवल संरक्षण नहीं, प्रमाणिकता भी जरूरी
पारंपरिक ज्ञान को डिजिटल रूप में सुरक्षित करना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। इसके साथ उसकी प्रमाणिकता और मूल स्रोत को सुरक्षित रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
किस समुदाय से कोई ज्ञान आया, उसका ऐतिहासिक संदर्भ क्या है और उसका उपयोग किस प्रकार होता रहा है—इन सभी पहलुओं का रिकॉर्ड जरूरी है। अन्यथा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद उसका वास्तविक संदर्भ खो सकता है।
विशेष रूप से स्वदेशी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के मामले में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि उस ज्ञान का उपयोग कौन कर सकता है और उससे होने वाले आर्थिक लाभ में मूल समुदाय की क्या भूमिका होगी।
बौद्धिक संपदा अधिकार की चुनौती
पारंपरिक ज्ञान को डिजिटल दुनिया में लाने के साथ बौद्धिक संपदा अधिकार का प्रश्न भी सामने आता है। किसी समुदाय की पीढ़ियों पुरानी जानकारी यदि डिजिटल माध्यम से सार्वजनिक हो जाती है, तो उसके व्यावसायिक इस्तेमाल की संभावना बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल बिना अनुमति या बिना उचित श्रेय के न हो। खासकर औषधीय पौधों, पारंपरिक उपचार पद्धतियों, हस्तशिल्प और स्थानीय तकनीकों से संबंधित ज्ञान का व्यावसायिक उपयोग करते समय समुदायों के अधिकारों की रक्षा महत्वपूर्ण होगी।
इसलिए डिजिटल संरक्षण के साथ कानूनी और नैतिक ढांचे को मजबूत करना भी आवश्यक है।
नई पीढ़ी को जोड़ना बड़ी चुनौती
किसी भी ज्ञान परंपरा को जीवित रखने के लिए केवल उसे संग्रहित करना पर्याप्त नहीं है। नई पीढ़ी को उससे जोड़ना भी जरूरी है।
आज के विद्यार्थी डिजिटल माध्यमों के साथ सहज हैं। ऐसे में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक डिजिटल शिक्षा सामग्री, इंटरैक्टिव पाठ्यक्रम, डॉक्यूमेंट्री, डिजिटल संग्रहालय और ऑनलाइन शोध संसाधनों के माध्यम से युवाओं तक पहुंचाया जा सकता है।
यदि पारंपरिक ज्ञान को केवल पुराने दस्तावेजों के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, तो युवा पीढ़ी उससे दूरी बना सकती है। इसके बजाय यह दिखाना आवश्यक है कि पुरानी ज्ञान प्रणालियों में आधुनिक समाज के लिए क्या उपयोगी सीख मौजूद है।
आधुनिक विज्ञान के साथ संवाद की जरूरत
पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उनके बीच संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है। हालांकि हर पारंपरिक दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए किसी भी पारंपरिक ज्ञान का आधुनिक उपयोग करने से पहले वैज्ञानिक परीक्षण और प्रमाणिकता की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
यह दृष्टिकोण दोहरे लाभ दे सकता है। एक तरफ वैज्ञानिक अनुसंधान को नए विचार और स्थानीय अनुभव मिल सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से बेहतर तरीके से समझा और संरक्षित किया जा सकता है।
BRICS देशों के बीच सहयोग की संभावना
BRICS देशों के पास विविध सांस्कृतिक और ज्ञान परंपराओं का बड़ा भंडार है। यदि इन देशों के विश्वविद्यालय मिलकर डिजिटल अभिलेखागार, शोध परियोजनाएं और शैक्षणिक कार्यक्रम विकसित करें तो पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया मॉडल तैयार हो सकता है।
विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए संयुक्त परियोजनाएं शुरू की जा सकती हैं। अलग-अलग देशों की स्थानीय ज्ञान प्रणालियों की तुलना करके यह समझने का प्रयास किया जा सकता है कि कृषि, जल संरक्षण, पर्यावरण और सामुदायिक जीवन जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक अनुभव आज के समय में किस तरह उपयोगी हो सकते हैं।
ऐसा सहयोग केवल संस्कृति के संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा और अनुसंधान को भी नई दिशा दे सकता है।
डिजिटल विभाजन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
पारंपरिक ज्ञान को डिजिटल बनाने की प्रक्रिया में एक बड़ी चुनौती डिजिटल पहुंच की असमानता भी है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले अनेक समुदायों के पास आधुनिक डिजिटल संसाधनों की सीमित उपलब्धता हो सकती है।
इसलिए संरक्षण की प्रक्रिया केवल बड़े विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। स्थानीय समुदायों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और युवाओं को भी इसमें शामिल करना होगा।
स्थानीय भाषा में डिजिटल सामग्री तैयार करना भी आवश्यक है। यदि ज्ञान केवल अंग्रेजी या कुछ प्रमुख भाषाओं तक सीमित रहेगा तो उसका लाभ उन समुदायों तक नहीं पहुंच पाएगा जिनके पास वह ज्ञान मूल रूप से मौजूद है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
भारत की पहचान उसकी विविध ज्ञान परंपराओं से भी जुड़ी है। आयुर्वेद, योग, पारंपरिक कृषि, जल प्रबंधन, हस्तशिल्प, लोककला और विभिन्न क्षेत्रों की सामुदायिक परंपराएं देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ भारत के सामने इन परंपराओं को आधुनिक ज्ञान व्यवस्था से जोड़ने का अवसर मौजूद है। BRICS नेटवर्क यूनिवर्सिटी जैसे मंच इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आधार तैयार कर सकते हैं।
भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान इस विषय पर चर्चा से यह संदेश भी जाता है कि वैश्विक सहयोग केवल आधुनिक तकनीक और आर्थिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए। मानव सभ्यता के पुराने ज्ञान को संरक्षित करना भी भविष्य निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निष्कर्ष
BRICS नेटवर्क यूनिवर्सिटी की 20 जुलाई 2026 की वर्चुअल बैठक ने पारंपरिक और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण को डिजिटल युग की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में सामने रखा। बैठक का विषय इसी चुनौती पर केंद्रित था कि आधुनिक तकनीक के दौर में सदियों पुराने ज्ञान को किस तरह सुरक्षित रखा जाए और नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
आज डिजिटल तकनीक के पास ज्ञान को रिकॉर्ड करने और दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचाने की अभूतपूर्व क्षमता है। लेकिन इसके साथ प्रमाणिकता, समुदायों के अधिकार, बौद्धिक संपदा, डिजिटल पहुंच और वैज्ञानिक सत्यापन जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं।
इसलिए भविष्य की रणनीति केवल “पुराने ज्ञान को बचाने” तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लक्ष्य यह होना चाहिए कि पारंपरिक और स्वदेशी ज्ञान को सम्मानपूर्वक दस्तावेजीकृत किया जाए, उसके मूल समुदायों के अधिकार सुरक्षित रखे जाएं और वैज्ञानिक तथा शैक्षणिक दृष्टिकोण से उसका अध्ययन किया जाए।
यदि BRICS देशों के विश्वविद्यालय इस दिशा में मिलकर काम करते हैं, तो डिजिटल तकनीक के माध्यम से दुनिया की विविध ज्ञान परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क विकसित किया जा सकता है।