इजरायल में चुनावी नतीजों के बाद सियासी पेच, सरकार बनाने के लिए बहुमत जुटाने की चुनौती

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खबर की तारीख: 28–29 अक्टूबर 2026 | अंतरराष्ट्रीय राजनीति

इजरायल में चुनाव के बाद सरकार गठन को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की स्थिति में देश की निगाहें संसदीय सीटों के अंतिम गणित और विभिन्न राजनीतिक दलों के रुख पर टिकी हैं। शुरुआती चुनावी रुझानों में बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को बढ़त मिलने की बात सामने आई है, लेकिन इस बढ़त को स्थायी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त मान लेना जल्दबाजी होगी। इजरायल की संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल करना सरकार गठन की सबसे बड़ी शर्त है और इसी मोर्चे पर नेतन्याहू के सामने चुनौती बनी हुई है।

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इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। यहां कुल 120 सदस्य होते हैं और सरकार को बहुमत का समर्थन प्राप्त करने के लिए कम से कम 61 सांसदों का साथ चाहिए। यदि कोई गठबंधन इस संख्या तक नहीं पहुंच पाता, तो उसे अन्य दलों का समर्थन हासिल करने, साझा सरकार बनाने या राजनीतिक समझौते करने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में चुनावी बढ़त के बावजूद सरकार का गठन कई दौर की बातचीत और राजनीतिक जोड़-तोड़ पर निर्भर कर सकता है।

हालांकि, 28–29 अक्टूबर 2026 के चुनावी घटनाक्रम से संबंधित शुरुआती रुझानों और अंतिम आधिकारिक परिणामों के बीच अंतर हो सकता है। इसलिए सरकार गठन की स्थिति पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले प्रमाणित चुनावी आंकड़ों और संबंधित दलों की औपचारिक घोषणाओं को देखना जरूरी है।

चुनावी बढ़त के बावजूद नेतन्याहू के सामने बहुमत का संकट

इजरायल की राजनीति में चुनाव के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगली सरकार का नेतृत्व कौन करेगा और उसे संसद में कितने सांसदों का समर्थन मिलेगा। शुरुआती मतगणना के आधार पर नेतन्याहू का गठबंधन सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में उभरता दिखाई दिया, लेकिन उसके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या नहीं है। दूसरी ओर, विपक्षी खेमे को भी अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कठिनाई हो रही है।

रॉयटर्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों की 28 अक्टूबर की रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती मतगणना में नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को लगभग 53 सीटें मिलने का अनुमान था, जबकि गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी समूह को करीब 48 सीटें मिलती दिखाई दे रही थीं। अरब नेतृत्व वाले दलों के खाते में लगभग 19 सीटें जाने का अनुमान था। इन आंकड़ों के अनुसार किसी भी प्रमुख खेमे के पास अकेले बहुमत नहीं था। Reuters +2

इस स्थिति ने चुनाव के बाद की राजनीति को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है। अब केवल अधिक सीटें जीतना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि अन्य दलों के साथ ऐसा समझौता करना भी जरूरी होगा, जिससे सरकार संसद में अपना बहुमत साबित कर सके।

छोटे दलों के हाथ में बड़ी राजनीतिक भूमिका

इजरायल की चुनावी व्यवस्था में छोटे राजनीतिक दलों का प्रभाव अक्सर निर्णायक हो जाता है। इसका कारण यह है कि यहां कोई एक पार्टी सामान्यतः संसद की सभी या अधिकांश सीटें हासिल नहीं कर पाती। इसलिए सरकार बनाने के लिए कई दलों को मिलकर गठबंधन तैयार करना पड़ता है।

जब प्रमुख राजनीतिक समूह बहुमत से पीछे रह जाते हैं, तब कुछ सीटें जीतने वाले दलों की अहमियत बढ़ जाती है। वे समर्थन देने के बदले अपने राजनीतिक कार्यक्रमों, नीतिगत प्राथमिकताओं और सरकार में भागीदारी से संबंधित शर्तें रख सकते हैं।

नेतन्याहू के सामने भी यही स्थिति है। यदि उनका गठबंधन 61 सीटों तक नहीं पहुंचता, तो उन्हें दूसरे दलों का समर्थन हासिल करने के विकल्प तलाशने होंगे। इसके लिए उन्हें सहयोगी दलों के साथ बातचीत करनी पड़ सकती है और साझा कार्यक्रम पर सहमति बनानी पड़ सकती है।

हालांकि, केवल सीटों की संख्या देखकर किसी दल के समर्थन को निश्चित नहीं माना जा सकता। राजनीतिक विचारधारा, नेतृत्व को लेकर मतभेद और राष्ट्रीय मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण सरकार गठन की बातचीत को कठिन बना सकते हैं।

विपक्ष के सामने भी आसान नहीं है राह

नेतन्याहू के गठबंधन को बहुमत न मिलने का अर्थ यह नहीं है कि विपक्ष आसानी से सरकार बना लेगा। विपक्षी खेमे के सामने भी अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को एक मंच पर लाने की चुनौती है।

गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी समूह को बहुमत तक पहुंचने के लिए अन्य राजनीतिक दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया में उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि सहयोगी दल केवल चुनावी गणित के आधार पर ही नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और नेतृत्व के सवाल पर भी सहमत हों।

विपक्ष के लिए एक अतिरिक्त चुनौती यह है कि सभी दलों के बीच नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने के उद्देश्य पर सहमति होने के बावजूद सरकार चलाने के तरीके को लेकर मतभेद हो सकते हैं। सैन्य सेवा, सुरक्षा नीति, धार्मिक समूहों की भूमिका और देश के भविष्य की दिशा जैसे मुद्दों पर अलग-अलग दलों की प्राथमिकताएं गठबंधन को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए विपक्ष के सामने भी केवल संख्या जुटाना ही नहीं, बल्कि एक स्थिर और कार्यक्षम सरकार का स्वरूप तैयार करना जरूरी होगा।

अरब दलों के समर्थन पर टिकी निगाहें

इस चुनाव के बाद अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। शुरुआती परिणामों में इन दलों को उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व मिलने का अनुमान लगाया गया। यदि प्रमुख गठबंधन बहुमत से पीछे रहते हैं, तो इन दलों का समर्थन सरकार गठन के समीकरण बदल सकता है।

कुछ विपक्षी नेताओं के लिए इन दलों के साथ सहयोग करना बहुमत हासिल करने का एक संभावित रास्ता हो सकता है। लेकिन इस विकल्प को लेकर राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। इजरायल की राजनीति में अरब दलों के साथ औपचारिक गठबंधन या संसदीय समर्थन का प्रश्न लंबे समय से संवेदनशील रहा है।

नेतन्याहू के नेतृत्व वाले खेमे और विपक्ष के भीतर भी इस विषय पर अलग-अलग विचार सामने आए हैं। यही कारण है कि अरब दलों की भूमिका केवल सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार गठन की संभावनाओं और राजनीतिक समझौतों की दिशा पर भी इसका असर पड़ सकता है। as it happened +2

यदि विपक्ष इन दलों का समर्थन प्राप्त करने में सफल रहता है, तो उसके लिए बहुमत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन इसके लिए राजनीतिक सहमति और संभावित सहयोग की शर्तों पर स्पष्टता जरूरी होगी।

राष्ट्रपति की भूमिका क्यों होगी महत्वपूर्ण?

इजरायल में राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग की भूमिका सरकार गठन की अगली प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकती है। आधिकारिक चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद राष्ट्रपति विभिन्न संसदीय दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं। इसके बाद वह उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर दे सकते हैं, जिसके पास आवश्यक समर्थन जुटाने की बेहतर संभावना हो।

यह प्रक्रिया केवल इस आधार पर तय नहीं होती कि किस पार्टी ने सबसे अधिक सीटें जीती हैं। किसी उम्मीदवार के पक्ष में अन्य सांसदों का समर्थन कितना है, यह भी महत्वपूर्ण होता है।

सरकार बनाने का अवसर मिलने के बाद संबंधित उम्मीदवार को तय समयसीमा के भीतर आवश्यक समर्थन जुटाना होता है। यदि पहला प्रयास सफल नहीं होता, तो नियमों के अनुसार दूसरे उम्मीदवार को भी अवसर मिल सकता है। यदि निर्धारित प्रक्रियाओं के बाद भी सरकार नहीं बन पाती, तो नए चुनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

राष्ट्रपति हर्जोग ने चुनाव के बाद राजनीतिक दलों से बातचीत में लचीलापन दिखाने और एक और चुनाव से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया। इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व के सामने सरकार गठन के साथ-साथ स्थिर प्रशासन सुनिश्चित करने का दबाव भी है। The Times of Israel +1

इजरायल की नीतियों पर क्या पड़ सकता है असर?

सरकार गठन में देरी का प्रभाव केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देश की सुरक्षा व्यवस्था, आर्थिक प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े निर्णय भी प्रभावित हो सकते हैं।

इजरायल पश्चिम एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में नई सरकार की नीतियों पर पड़ने वाला असर क्षेत्रीय कूटनीति और अन्य देशों के साथ उसके संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।

यदि गठबंधन बनाने के लिए कई दलों के बीच समझौते किए जाते हैं, तो सरकार के साझा कार्यक्रम में अलग-अलग सहयोगियों की मांगों को शामिल करना पड़ सकता है। इससे सुरक्षा, सैन्य सेवा, धार्मिक नीतियों और बजट से जुड़े निर्णयों पर बातचीत लंबी हो सकती है।

इसके अलावा, चुनाव के दौरान उठे मुद्दों पर जनता की अपेक्षाएं भी नई सरकार के सामने रहेंगी। मतदाताओं को उम्मीद होगी कि राजनीतिक नेतृत्व प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखे और देश की प्रमुख चुनौतियों पर ठोस फैसले करे।

हालांकि, सरकार गठन में देरी का अर्थ यह नहीं है कि देश का प्रशासन पूरी तरह रुक जाएगा। नई सरकार बनने तक मौजूदा मंत्रिमंडल कार्यवाहक सरकार के रूप में जिम्मेदारियां निभाता रहेगा। फिर भी लंबे समय तक अनिश्चितता बने रहने से महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों पर दबाव बढ़ सकता है।

क्या इजरायल में फिर चुनाव हो सकते हैं?

यदि कोई भी राजनीतिक समूह आवश्यक समर्थन हासिल करने में सफल नहीं होता, तो इजरायल में दोबारा चुनाव कराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह अंतिम परिणाम नहीं है। राजनीतिक दलों के बीच समझौता, गठबंधन में नए सहयोगियों का शामिल होना या किसी व्यापक साझा सरकार का गठन भी संभावित विकल्प हैं।

नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाना होगी। वहीं, विपक्ष को यह साबित करना होगा कि वह अलग-अलग राजनीतिक विचारों के बावजूद एक स्थिर सरकार चलाने में सक्षम है।

दोबारा चुनाव कराने का विकल्प राजनीतिक दलों के लिए आसान समाधान नहीं होगा, क्योंकि इससे देश को फिर चुनावी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और सरकार गठन की अनिश्चितता आगे बढ़ सकती है। इसलिए बातचीत और समझौते की संभावनाएं महत्वपूर्ण बनी रहेंगी।

निष्कर्ष

28–29 अक्टूबर 2026 के चुनावी घटनाक्रम ने इजरायल की राजनीति में बहुमत के गणित को सबसे अहम मुद्दा बना दिया है। शुरुआती परिणामों में नेतन्याहू के गठबंधन को बढ़त मिलने के बावजूद 61 सीटों का आंकड़ा हासिल करना उसके लिए बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर, विपक्ष को भी सरकार बनाने के लिए अतिरिक्त समर्थन और साझा राजनीतिक सहमति की जरूरत है।

छोटे दलों और अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक समूहों की भूमिका आने वाले दिनों में निर्णायक हो सकती है। राष्ट्रपति की सलाह-मशविरा प्रक्रिया और दलों के बीच होने वाली बातचीत से ही यह स्पष्ट होगा कि अगली सरकार किसके नेतृत्व में बनेगी।

फिलहाल इजरायल में सत्ता की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। अंतिम चुनावी आंकड़ों, राजनीतिक समझौतों और बहुमत के समर्थन पर ही सरकार का भविष्य निर्भर करेगा। यदि दल आपसी मतभेद दूर करके समझौते पर पहुंचते हैं, तो नई सरकार का गठन संभव है; अन्यथा राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है और नए चुनाव का विकल्प सामने आ सकता है।

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