यूपी के स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पर हाई कोर्ट सख्त, परिवहन व्यवस्था की निगरानी के निर्देश
अमरेश त्रिपाठी
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात
लखनऊ, 26 सितंबर 2026। उत्तर प्रदेश में स्कूली बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने साफ किया है कि बच्चों को स्कूल तक सुरक्षित पहुंचाना और स्कूल से वापस घर तक सुरक्षित लाना केवल अभिभावकों की जिम्मेदारी नहीं है। स्कूल प्रबंधन, परिवहन व्यवस्था से जुड़े लोगों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बनती है।

अदालत के निर्देशों के बाद प्रदेश के स्कूलों में बच्चों के आवागमन से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी और अधिक व्यवस्थित किए जाने की संभावना है। रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने सभी जिलों में जिला स्कूल वाहन सुरक्षा समितियों को नियमित रूप से बैठक करने तथा प्रत्येक स्कूल में स्कूल परिवहन सुरक्षा समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं।
हर स्कूल में परिवहन सुरक्षा समिति पर जोर
हाई कोर्ट के निर्देशों का प्रमुख हिस्सा स्कूल परिवहन व्यवस्था से जुड़ा है। अदालत ने कहा है कि केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका जमीन पर प्रभावी तरीके से पालन भी होना चाहिए। इसके लिए स्कूल स्तर पर परिवहन सुरक्षा समिति की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
स्कूल परिवहन समिति का उद्देश्य बच्चों के आवागमन से जुड़े सुरक्षा प्रबंधों पर नजर रखना, संबंधित व्यवस्थाओं की समीक्षा करना और जरूरत पड़ने पर कमियों को सामने लाना होगा। इससे स्कूल बस, वैन और अन्य वाहनों से आने-जाने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जवाबदेही तय करने में मदद मिल सकती है।
अदालत ने जिला स्तर पर गठित स्कूल वाहन सुरक्षा समितियों की नियमित बैठकें कराने की जरूरत पर भी जोर दिया है। इसका उद्देश्य यह है कि स्कूल परिवहन से जुड़े नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनकी समय-समय पर समीक्षा और निगरानी होती रहे।
नियमों के प्रभावी पालन की जरूरत
स्कूली बच्चों के परिवहन को लेकर मोटर वाहन नियमों में पहले से कई प्रावधान मौजूद हैं। हाई कोर्ट की ओर से सामने आए निर्देशों में इन प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन को महत्वपूर्ण माना गया है। यानी स्कूल वाहनों से संबंधित सुरक्षा नियमों की जानकारी होने के साथ-साथ उनका पालन भी सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।
अदालत की कार्यवाही से यह संदेश सामने आया है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े नियमों में किसी प्रकार की लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। स्कूलों में आने-जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए परिवहन व्यवस्था की नियमित जांच और निगरानी आवश्यक है।
स्कूल वैन को लेकर भी महत्वपूर्ण बात
रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के दौरान स्कूल वैन से जुड़े एक महत्वपूर्ण नियम का भी उल्लेख हुआ। स्कूल वैन के संचालन के लिए नियमों के तहत अभिभावक या अभिभावकों के समूह के साथ समझौता होना आवश्यक बताया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य अभिभावकों और स्कूल परिवहन व्यवस्था के बीच जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना है। बच्चों के स्कूल आने-जाने के लिए इस्तेमाल होने वाले वाहनों की व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।
मुख्य सचिव को निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश
हाई कोर्ट ने प्रदेश स्तर पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मुख्य सचिव की भूमिका भी तय की है। रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य सचिव को जिला स्कूल वाहन सुरक्षा समितियों की नियमित बैठकें सुनिश्चित कराने और स्कूल परिवहन सुरक्षा समितियों के गठन तथा उनके कामकाज की निगरानी के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने को कहा गया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि अदालत केवल स्कूल स्तर पर नियमों के पालन तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि जिला और राज्य स्तर पर भी निगरानी की व्यवस्था को सक्रिय रखने पर जोर दे रही है।
अभिभावकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश
बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। स्कूल बस या वैन से बच्चों को भेजते समय अभिभावक परिवहन व्यवस्था से जुड़ी आवश्यक जानकारी हासिल कर सकते हैं और स्कूल प्रबंधन से सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी ले सकते हैं।
हालांकि, अदालत के निर्देशों का मूल उद्देश्य जिम्मेदारी का पूरा बोझ अभिभावकों पर डालना नहीं है। स्कूल परिसर और स्कूल परिवहन से जुड़े मामलों में संस्थान तथा संबंधित प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी बढ़ेगी
हाई कोर्ट के रुख के बाद स्कूल प्रबंधन को परिवहन व्यवस्था को लेकर अधिक सक्रिय भूमिका निभानी पड़ सकती है। स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या, वाहनों की उपलब्धता और रोजाना होने वाले आवागमन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था की नियमित समीक्षा जरूरी होगी।
स्कूल परिवहन से जुड़ी किसी भी व्यवस्था में स्पष्ट रिकॉर्ड, जिम्मेदार व्यक्तियों की जानकारी और नियमों के पालन की निगरानी व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। समिति के स्तर पर होने वाली नियमित बैठकों से भी कमियों की पहचान और सुधार की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।
नियमों की निगरानी पर रहेगा जोर
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा केवल किसी एक दिन की जांच का विषय नहीं है। वाहनों से विद्यार्थियों का नियमित आवागमन होता है, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था की निरंतर निगरानी जरूरी है। जिला स्तर की समितियों की बैठकें और स्कूल स्तर की परिवहन समितियां इसी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन सकती हैं।
हाई कोर्ट के निर्देशों का प्रभावी पालन होने पर स्कूल परिवहन से जुड़े नियमों की समीक्षा अधिक नियमित रूप से हो सकती है। इससे स्कूल प्रबंधन, अभिभावकों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी सामने आती है।
बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
स्कूल किसी भी बच्चे के लिए केवल पढ़ाई की जगह नहीं होता, बल्कि दिन के कई घंटे विद्यार्थी वहीं बिताते हैं। ऐसे में स्कूल परिसर और वहां तक पहुंचने वाली परिवहन व्यवस्था सुरक्षित होना आवश्यक है।
हाई कोर्ट के हालिया रुख ने इसी जिम्मेदारी को रेखांकित किया है। जिला समितियों की नियमित बैठक, स्कूल परिवहन सुरक्षा समितियों का गठन और नियमों के पालन की निगरानी जैसे कदमों के जरिए व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाने की कोशिश की जा रही है।
अब महत्वपूर्ण यह होगा कि अदालत के निर्देशों को संबंधित विभाग और स्कूल प्रबंधन किस स्तर तक व्यवहार में लागू करते हैं। यदि सुरक्षा नियमों की नियमित समीक्षा और निगरानी प्रभावी तरीके से होती है, तो इससे विद्यार्थियों के स्कूल आवागमन से जुड़ी व्यवस्थाओं में जवाबदेही और सुरक्षा दोनों को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश में स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर हाई कोर्ट का रुख स्कूलों, जिला प्रशासन और परिवहन व्यवस्था से जुड़े सभी पक्षों के लिए स्पष्ट संदेश है कि सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि नियमित जिम्मेदारी है। जिला और स्कूल स्तर पर समितियों की सक्रियता के साथ निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना अब इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।