निकारागुआ में लोकतंत्र पर बढ़ता संकट, ओर्टेगा-मुरिलो सरकार के संवैधानिक बदलाव पर अमेरिका सख्त

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मनागुआ/वॉशिंगटन। निकारागुआ की राजनीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा और सह-राष्ट्रपति रोसारियो मुरिलो के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा संविधान में किए गए नए बदलावों ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनावी प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1 सितंबर 2026 को निकारागुआ की नेशनल असेंबली ने संवैधानिक संशोधनों को पहली विधायी मंजूरी दी। इन प्रस्तावित बदलावों में राष्ट्रपति और अन्य निर्वाचित पदों की अवधि छह से बढ़ाकर सात वर्ष करने तथा कुछ विपक्षी नेताओं और सरकार द्वारा “देशद्रोही” या “तख्तापलट समर्थक” बताए जाने वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने जैसे प्रावधान शामिल हैं।

अमेरिका ने इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ओर्टेगा-मुरिलो के नियंत्रण वाली नेशनल असेंबली ने निकारागुआ में बची हुई लोकतांत्रिक व्यवस्था को और कमजोर कर दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका आगामी अमेरिकी राज्यों के संगठन यानी OAS की विदेश मंत्रियों की बैठक में निकारागुआ के खिलाफ कदम उठाने की दिशा में काम करेगा।

संविधान में दूसरी बड़ी कवायद

निकारागुआ में यह संवैधानिक बदलाव पिछले कुछ वर्षों में सत्ता संरचना में किए गए लगातार परिवर्तनों की अगली कड़ी माना जा रहा है। 2025 में हुए संवैधानिक बदलावों के बाद रोसारियो मुरिलो को सह-राष्ट्रपति का पद मिला था और राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पांच से बढ़ाकर छह वर्ष किया गया था। अब नए प्रस्ताव में इसे सात वर्ष करने की बात कही गई है।

ताजा संशोधन में निर्वाचित अधिकारियों के साथ-साथ सेना और पुलिस के प्रमुखों की अवधि भी सात वर्ष करने का प्रावधान बताया गया है। इसके अलावा चुनावी संस्थाओं की शक्तियों और राजनीतिक दलों की पात्रता से जुड़े नियमों में भी महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं।

निकारागुआ के कानून के अनुसार संवैधानिक संशोधन को दो अलग-अलग विधायी सत्रों में मंजूरी मिलना आवश्यक है। इसलिए 1 सितंबर को हुई पहली मंजूरी के बाद प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। दूसरी विधायी मंजूरी 2027 में होने की योजना बताई गई है।

चुनाव व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनावों को लेकर है। डेनियल ओर्टेगा ने जुलाई 2026 में संकेत दिया था कि निकारागुआ में आगे चुनाव नहीं होने चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार विपक्ष के सत्ता में लौटने का खतरा है। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई।

नई संवैधानिक व्यवस्था औपचारिक रूप से चुनावों को पूरी तरह समाप्त नहीं करती, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि प्रमुख विपक्षी नेताओं और राजनीतिक समूहों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है, तो चुनाव की वास्तविक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी। ऐसे में चुनाव होने के बावजूद मतदाताओं के सामने राजनीतिक विकल्प सीमित हो सकते हैं।

अमेरिकी अधिकारियों और मानवाधिकार संगठनों की चिंता भी इसी बिंदु पर केंद्रित है कि लोकतांत्रिक चुनाव केवल मतदान कराने का नाम नहीं है। स्वतंत्र उम्मीदवार, विपक्षी दल, निष्पक्ष चुनावी संस्थाएं और राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के आवश्यक हिस्से हैं।

अमेरिका की कड़ी प्रतिक्रिया

अमेरिका ने निकारागुआ के घटनाक्रम को केवल घरेलू राजनीतिक बदलाव नहीं माना है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि वॉशिंगटन आगामी OAS विदेश मंत्रिस्तरीय बैठक में ऐसे कदमों को आगे बढ़ाएगा, जिनका उद्देश्य निकारागुआ के साथ “सामान्य तरीके से कारोबार” करने की स्थिति को बदलना है।

इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका इस मुद्दे को क्षेत्रीय स्तर पर उठाना चाहता है। पहले भी वॉशिंगटन ने कहा था कि निकारागुआ में लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के खिलाफ केवल अमेरिकी स्तर पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी और पश्चिमी गोलार्ध के देशों को सामूहिक प्रतिक्रिया पर विचार करना चाहिए।

हालांकि अमेरिका ने अभी तक इन नए कदमों का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि आगामी OAS बैठक में वास्तव में किस प्रकार के राजनीतिक या आर्थिक उपाय सामने आएंगे।

OAS की भूमिका महत्वपूर्ण

निकारागुआ संकट में OAS की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। संगठन के स्थायी परिषद ने पहले ही निकारागुआ की स्थिति पर विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी। अमेरिका के साथ अर्जेंटीना, कोस्टा रिका, पनामा और पैराग्वे ने इस दिशा में प्रस्ताव का समर्थन किया था।

OAS के सामने अब चुनौती यह है कि सदस्य देश निकारागुआ के संवैधानिक बदलावों पर किस तरह सामूहिक प्रतिक्रिया देते हैं। इस मुद्दे पर क्षेत्रीय देशों के बीच पूरी तरह एक जैसी राय नहीं है। कुछ सरकारें कठोर राजनयिक दबाव की समर्थक हैं, जबकि अन्य देश राष्ट्रीय संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत को अधिक महत्व देते हैं।

यही कारण है कि OAS की आगामी चर्चा केवल निकारागुआ तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे अमेरिकी महाद्वीप में लोकतांत्रिक मानकों और क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा पर भी असर पड़ सकता है।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

इंटर-अमेरिकन कमीशन ऑन ह्यूमन राइट्स यानी IACHR ने भी निकारागुआ में संवैधानिक बदलावों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। आयोग के अनुसार प्रस्तावित बदलाव राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को सीमित कर सकते हैं और सत्ता हस्तांतरण के लिए आवश्यक लोकतांत्रिक परिस्थितियों को और कमजोर कर सकते हैं।

IACHR ने 2025 के संवैधानिक संशोधनों का भी उल्लेख किया था, जिनके बारे में उसका कहना था कि उन्होंने सत्ता के केंद्रीकरण को मजबूत किया और राज्य की विभिन्न संस्थाओं के बीच स्वतंत्रता एवं शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया।

मानवाधिकार के नजरिए से सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक भागीदारी का है। यदि किसी व्यक्ति या संगठन को व्यापक और अस्पष्ट श्रेणियों के आधार पर चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तो इससे नागरिकों के राजनीतिक अधिकार प्रभावित होने की आशंका रहती है।

2028 की ओर बढ़ता निकारागुआ

नए बदलावों का एक बड़ा राजनीतिक प्रभाव चुनावी समय-सारणी पर पड़ सकता है। मौजूदा घटनाक्रमों के अनुसार अगले चुनावों का समय 2028 तक खिसक सकता है और वर्तमान नेतृत्व की अवधि भी बढ़ जाएगी।

इससे ओर्टेगा-मुरिलो सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है। आलोचकों का मानना है कि इससे विपक्ष को संगठित होने, स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियां चलाने और चुनावी प्रतिस्पर्धा की तैयारी करने में और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

वहीं सरकार इन बदलावों को राष्ट्रीय संप्रभुता, राजनीतिक स्थिरता और विदेशी हस्तक्षेप से सुरक्षा के संदर्भ में प्रस्तुत कर रही है। निकारागुआ की आधिकारिक व्याख्या में विदेशी कानूनों और बाहरी दबावों को देश की स्वतंत्रता के लिए चुनौती बताया गया है।

क्षेत्रीय राजनीति पर असर

निकारागुआ का संकट मध्य अमेरिका की राजनीति पर भी प्रभाव डाल सकता है। यदि अमेरिका OAS के माध्यम से सामूहिक दबाव बनाने में सफल रहता है, तो अन्य लैटिन अमेरिकी देशों को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ सकती है।

दूसरी ओर, यदि सदस्य देशों के बीच मतभेद बने रहते हैं, तो OAS के लिए प्रभावी सामूहिक कार्रवाई करना कठिन हो सकता है। इस स्थिति में अमेरिका को अलग से आर्थिक या राजनयिक कदम उठाने पड़ सकते हैं।

निकारागुआ के घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर विवाद अब केवल चुनाव की तारीख तक सीमित नहीं रहा। संविधान, न्यायपालिका, चुनावी संस्थाएं, राजनीतिक दलों की मान्यता और सुरक्षा संस्थाओं की भूमिका—इन सभी क्षेत्रों में बदलावों ने सत्ता के केंद्रीकरण पर बहस को तेज कर दिया है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण चरण संवैधानिक संशोधनों की दूसरी विधायी मंजूरी होगी। यदि प्रस्ताव अंतिम रूप से पारित हो जाता है, तो निकारागुआ की राजनीतिक व्यवस्था में सात वर्षीय कार्यकाल और राजनीतिक पात्रता से जुड़े नए नियम संवैधानिक ढांचे का हिस्सा बन सकते हैं।

इसके साथ ही अमेरिका और OAS की अगली कार्रवाई पर भी पूरी दुनिया की नजर रहेगी। वॉशिंगटन पहले ही संकेत दे चुका है कि वह इस मामले में क्षेत्रीय स्तर पर दबाव बढ़ाना चाहता है।

निकारागुआ के लिए असली चुनौती यह होगी कि क्या देश में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था कायम रह सकती है जिसमें सत्ता परिवर्तन, विपक्ष की भागीदारी और स्वतंत्र चुनाव वास्तविक रूप से संभव हों। आने वाले महीनों में संवैधानिक प्रक्रिया, OAS की प्रतिक्रिया और अमेरिका की नीति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि निकारागुआ का राजनीतिक भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ता है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ओर्टेगा-मुरिलो सरकार के संवैधानिक बदलावों ने निकारागुआ में लोकतंत्र को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को एक नए और अधिक गंभीर चरण में पहुंचा दिया है। अमेरिका और क्षेत्रीय संगठन अब जिस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, उससे न केवल निकारागुआ की राजनीति बल्कि पूरे पश्चिमी गोलार्ध में लोकतांत्रिक मानकों की दिशा प्रभावित हो सकती है।

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