भाजपा समर्थकों का त्रिस्तरीय चरित्र-दोष: तीन चेहरे, तीन मुखौटे और एक ही विरोधाभास

राजनीतिक विचारधाराएँ लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। किसी भी दल का समर्थन करना नागरिक का अधिकार है। लेकिन जब किसी विचारधारा का समर्थन तथ्यों, सिद्धांतों और नैतिकता के बजाय सुविधानुसार बदलते तर्कों पर आधारित होने लगे, तब वह केवल राजनीतिक निष्ठा नहीं रह जाती, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और वैचारिक प्रवृत्ति बन जाती है। भारतीय राजनीति में अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि भाजपा के एक वर्ग के समर्थकों में तीन ऐसे चरित्र-दोष दिखाई देते हैं, जो उनके सार्वजनिक व्यवहार को परिभाषित करते हैं। इन्हें तीन मुखौटों के रूप में समझा जा सकता है।
पहला मुखौटा: राष्ट्रवाद का चयनात्मक संस्करण
भाजपा समर्थकों का एक बड़ा वर्ग स्वयं को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताता है। उनके अनुसार राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्रहित से ऊपर कुछ नहीं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यही राष्ट्रवाद कई बार व्यक्ति-विशेष, दल-विशेष या सत्ता-विशेष तक सीमित हो जाता है।
यदि सरकार की किसी नीति की आलोचना की जाए, तो उसे कई बार सीधे राष्ट्र-विरोध से जोड़ दिया जाता है। लेकिन जब वही सरकार किसी विवाद में घिरती है, तब राष्ट्र और सरकार के बीच का अंतर अचानक धुंधला हो जाता है।
वास्तविक राष्ट्रवाद सत्ता से प्रश्न पूछने का भी अधिकार देता है। लोकतंत्र में सरकार राष्ट्र नहीं होती; सरकार केवल राष्ट्र की एक अस्थायी प्रतिनिधि होती है। इसलिए सरकार की आलोचना को राष्ट्र-विरोध कहना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत माना जाता है।
दूसरा मुखौटा: नैतिकता का सुविधाजनक सिद्धांत
भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अवसरवाद और अपराधीकरण के विरुद्ध भाजपा ने लंबे समय तक राजनीतिक अभियान चलाया। लेकिन जब वही आरोप भाजपा के नेताओं या सहयोगियों पर लगते हैं, तो अनेक समर्थकों की भाषा बदल जाती है।
जो नेता विपक्ष में रहते हुए भ्रष्ट कहलाते थे, वही भाजपा में शामिल होने के बाद “अनुभवी”, “राष्ट्रवादी” या “विकास पुरुष” बन जाते हैं। इसी प्रकार, जिन राजनीतिक गठबंधनों को पहले अनैतिक बताया जाता था, सत्ता की आवश्यकता पड़ने पर उन्हें राष्ट्रीय हित का नाम दे दिया जाता है।
इस प्रवृत्ति से यह संदेश जाता है कि नैतिकता सिद्धांत नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का उपकरण बन गई है।
तीसरा मुखौटा: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दोहरा पैमाना
भाजपा समर्थकों का एक वर्ग तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है जब उनकी विचारधारा या उनके समर्थकों पर कार्रवाई होती है। लेकिन जब किसी पत्रकार, लेखक, कलाकार, छात्र या विपक्षी नेता की अभिव्यक्ति विवाद का विषय बनती है, तब वही लोग कठोर कार्रवाई की मांग करते दिखाई देते हैं।
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार नहीं है; इसका अर्थ उन विचारों की रक्षा भी है जिनसे हम सहमत नहीं हैं। यदि अभिव्यक्ति का अधिकार केवल अपने पक्ष के लोगों तक सीमित हो जाए, तो वह अधिकार नहीं बल्कि विशेषाधिकार बन जाता है।
तीनों मुखौटों की समानता
इन तीनों प्रवृत्तियों में एक समान तत्व दिखाई देता है—सिद्धांतों का स्थायित्व नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार उनका बदल जाना।
- राष्ट्रवाद तब तक महत्वपूर्ण है, जब तक वह सत्ता के पक्ष में हो।
- नैतिकता तब तक आवश्यक है, जब तक आरोप विपक्ष पर हों।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक मूल्यवान है, जब तक लाभ अपने पक्ष को मिले।
यही कारण है कि आलोचक इसे “तीन मुखौटों” की राजनीति कहते हैं—जहाँ चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन उद्देश्य सत्ता के पक्ष में तर्क गढ़ना होता है।
क्या यह केवल भाजपा समर्थकों तक सीमित है?
निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो यह समस्या केवल भाजपा या उसके समर्थकों तक सीमित नहीं है। भारतीय राजनीति में लगभग सभी बड़े दलों के कट्टर समर्थकों में ऐसे विरोधाभास देखे जा सकते हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वाम दल या अन्य राजनीतिक समूहों के कुछ समर्थक भी कई बार अपने पसंदीदा दल के लिए अलग और विरोधियों के लिए अलग मानदंड अपनाते हैं।
इसलिए यदि इस प्रवृत्ति की आलोचना की जाती है, तो उसका उद्देश्य किसी एक दल को निशाना बनाना नहीं, बल्कि राजनीतिक कट्टरता के उस मनोविज्ञान को समझना होना चाहिए, जिसमें व्यक्ति अपनी विचारधारा की रक्षा के लिए तथ्यों और सिद्धांतों की अनदेखी करने लगता है।
निष्कर्ष
लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन करना पूरी तरह वैध और सम्मानजनक है। लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान अंध-समर्थन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समर्थन है। यदि राष्ट्रवाद, नैतिकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को परिस्थितियों के अनुसार बदला जाए, तो वे मूल्य नहीं, राजनीतिक हथियार बन जाते हैं।
एक परिपक्व लोकतांत्रिक नागरिक की पहचान यह नहीं है कि वह किस दल का समर्थक है, बल्कि यह है कि क्या वह अपने ही पसंदीदा दल से भी वही प्रश्न पूछ सकता है जो वह अपने विरोधियों से पूछता है। सिद्धांत तभी विश्वसनीय होते हैं जब वे मित्र और प्रतिद्वंद्वी—दोनों पर समान रूप से लागू हों। तभी लोकतंत्र मजबूत होता है और राजनीतिक विमर्श विश्वास के योग्य बनता है।
