प्रतापगढ़ में बीएलओ बेहाल: एक साल से मानदेय लंबित, फिर भी कंधों पर पंचायत चुनाव की जिम्मेदारी

कुंडा/प्रतापगढ़। पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच प्रतापगढ़ जनपद में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। एक ओर जहां प्रशासन चुनावी तैयारियों को लेकर सक्रिय नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर सबसे अहम भूमिका निभाने वाले बीएलओ पिछले एक वर्ष से अपने मानदेय के भुगतान के लिए इंतजार कर रहे हैं। बाबागंज और कुंडा ब्लॉक सहित जिले के अधिकांश हिस्सों में यही स्थिति देखने को मिल रही है, जिससे कर्मचारियों में भारी नाराजगी और आक्रोश व्याप्त है।
लगातार जिम्मेदारियां, लेकिन भुगतान शून्य
बीएलओ का कार्य किसी भी निर्वाचन प्रक्रिया की नींव माना जाता है। गांव-गांव जाकर मतदाता सूची का पुनरीक्षण, नए मतदाताओं का नाम जोड़ना, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना, त्रुटियों का संशोधन और डेटा को ऑनलाइन अपडेट करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य उनके जिम्मे होते हैं। इसके बावजूद उन्हें पिछले एक साल से मानदेय नहीं मिलना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
बाबागंज और कुंडा ब्लॉक के बीएलओ का कहना है कि वे लगातार फील्ड में काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी मेहनत का उचित पारिश्रमिक उन्हें नहीं दिया जा रहा। कई बार संबंधित अधिकारियों को अवगत कराने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो सका है।
नियम और हकीकत में बड़ा अंतर
निर्वाचन व्यवस्था के तहत भारत निर्वाचन आयोग ने बीएलओ के कार्य की अहमियत को देखते हुए उनका वार्षिक मानदेय 6,000 रुपये से बढ़ाकर 12,000 रुपये कर दिया है, जो औसतन 1,000 रुपये प्रति माह होता है। इसके अतिरिक्त विशेष पुनरीक्षण अभियानों के लिए अलग से प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान है।
आयोग के स्पष्ट निर्देश हैं कि बीएलओ को समय पर मानदेय भुगतान सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पहली कड़ी हैं। लेकिन प्रतापगढ़ में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है, जहां भुगतान फाइलों में उलझकर रह गया है।
आर्थिक और मानसिक दबाव में कर्मचारी
मानदेय न मिलने के कारण बीएलओ आर्थिक और मानसिक दबाव झेल रहे हैं। एक ओर उन पर लगातार कार्य का दबाव है, तो दूसरी ओर उन्हें अपने खर्च से फील्ड ड्यूटी और अन्य कार्य करने पड़ रहे हैं। इससे कर्मचारियों में निराशा और असंतोष बढ़ता जा रहा है।
कर्मचारियों का कहना है कि बिना भुगतान के लगातार कार्य करना अब मुश्किल होता जा रहा है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो पंचायत चुनाव की तैयारियों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
उठ रहे सवाल
बीएलओ के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब चुनाव प्रक्रिया की बुनियाद रखने वाले कर्मचारियों को ही नजरअंदाज किया जा रहा है, तो निष्पक्ष और सुचारु चुनाव कैसे संभव हो पाएंगे? प्रशासन एक ओर चुनावी तैयारियों का दावा कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर जमीनी कर्मचारियों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
पूरे जिले का बनता मुद्दा
बाबागंज और कुंडा से शुरू हुई यह आवाज अब पूरे प्रतापगढ़ जिले में फैल चुकी है। विभिन्न ब्लॉकों के बीएलओ भी इसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। यदि जल्द ही मानदेय का भुगतान नहीं किया गया, तो यह मामला और गंभीर रूप ले सकता है।
प्रतापगढ़ में बीएलओ का लंबित मानदेय अब केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। पंचायत चुनाव जैसे महत्वपूर्ण कार्य से पहले यदि इस मुद्दे का समाधान नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन बीएलओ की इस पीड़ा को कब तक नजरअंदाज करता है, या फिर समय रहते उनकी समस्याओं का समाधान कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाता है।
