जुलाई 13, 2026

“देश से प्रेम हो, कट्टर राष्ट्रवाद नहीं” — राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का संदेश और बदलती वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था

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नई दिल्ली/पेरिस:
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने राष्ट्रीय दिवस (बैस्टिल डे) की पूर्व संध्या पर दिए गए अपने संबोधन में देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि “देशभक्ति स्वीकार्य है, लेकिन राष्ट्रवाद नहीं।” उनका यह संदेश केवल फ्रांस की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यूरोप की सुरक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर

अपने संबोधन में मैक्रों ने कहा कि देशभक्ति का अर्थ अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान, जिम्मेदारी और समर्पण की भावना है। यह नागरिकों को अपने देश के विकास, सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के लिए प्रेरित करती है।

इसके विपरीत, उन्होंने संकीर्ण राष्ट्रवाद को ऐसी सोच बताया जो सहयोग के बजाय टकराव, अलगाव और विभाजन को बढ़ावा दे सकती है। उनके अनुसार, आधुनिक दुनिया की जटिल चुनौतियों का सामना केवल राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहकर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए साझेदारी और सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।

यूरोप की साझा सुरक्षा पर जोर

पेरिस स्थित होटल डी ब्रिएन (फ्रांस के रक्षा मंत्रालय) में दिए गए भाषण में राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि यूरोपीय देशों को अलग-अलग रक्षा नीतियों पर निर्भर रहने के बजाय सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। उनका मानना है कि यदि प्रत्येक देश केवल अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में लगा रहेगा, तो इससे संसाधनों का बिखराव होगा और सामूहिक सुरक्षा कमजोर पड़ेगी।

उन्होंने यूरोप के देशों से रक्षा, तकनीक, सैन्य समन्वय और रणनीतिक सहयोग को नई गति देने का आह्वान किया।

रक्षा क्षेत्र में फ्रांस की बढ़ती भूमिका

मैक्रों ने बताया कि पिछले एक दशक में फ्रांस ने अपने रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की है। उनका उद्देश्य केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना नहीं, बल्कि यूरोप की सामूहिक रक्षा क्षमता में भी महत्वपूर्ण योगदान देना है।

उन्होंने फ्रांसीसी सशस्त्र बलों के सैनिकों के साहस, समर्पण और बलिदान का सम्मान करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा उनके अथक प्रयासों और सेवा भावना पर आधारित है।

बदलते वैश्विक हालात का प्रभाव

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव आए हैं। इस संघर्ष ने यूरोपीय देशों को यह महसूस कराया है कि सुरक्षा केवल राष्ट्रीय स्तर का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी भी है।

इसी संदर्भ में मैक्रों ने कहा कि स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए यूरोप को एकजुट रहना होगा। यदि सदस्य देश केवल अपने-अपने हितों तक सीमित रहेंगे, तो निर्णय लेने में देरी होगी और सामूहिक क्षमता कमजोर पड़ेगी।

भारत के लिए क्या संदेश?

भारत में भी समय-समय पर देशभक्ति और राष्ट्रवाद को लेकर सार्वजनिक विमर्श होता रहा है। मैक्रों का दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि सच्ची देशभक्ति अपने देश को मजबूत, सुरक्षित और समृद्ध बनाने के साथ-साथ वैश्विक सहयोग, शांति और पारस्परिक सम्मान को भी महत्व देती है।

आज के दौर में जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों जैसी समस्याओं का समाधान केवल एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

निष्कर्ष

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का संदेश केवल फ्रांस की नीति का बयान नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था पर एक व्यापक दृष्टिकोण भी है। उनका विचार यह रेखांकित करता है कि अपने देश के प्रति प्रेम और समर्पण लोकतांत्रिक मूल्यों तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ भी संभव है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में स्थायी शांति, सुरक्षा और विकास के लिए संतुलित देशभक्ति, सहयोग और साझा जिम्मेदारी की भावना पहले से कहीं अधिक आवश्यक दिखाई देती है।

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