राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम: स्वस्थ पशुधन से सशक्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई राह

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नई दिल्ली। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन केवल कृषि का सहायक साधन नहीं, बल्कि…

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नई दिल्ली। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन केवल कृषि का सहायक साधन नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आय, रोजगार और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। गाय, भैंस, बकरी और अन्य पशु ग्रामीण परिवारों के लिए दूध, मांस, खाद तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों का स्रोत हैं। ऐसे में पशुओं को संक्रामक बीमारियों से सुरक्षित रखना किसानों की आर्थिक स्थिरता के साथ-साथ देश की खाद्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी आवश्यक है।

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (National Animal Disease Control Programme-NADCP) की शुरुआत की। इस अभियान का उद्देश्य पशुधन को गंभीर संक्रामक रोगों से बचाना, बीमारी के प्रसार को सीमित करना और चरणबद्ध तरीके से इनके उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ना है। कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर टीकाकरण, रोग की निगरानी, वैज्ञानिक परीक्षण और पशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने जैसे उपायों को प्रमुखता दी गई है।

पशु स्वास्थ्य और किसान की आय का सीधा संबंध

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन किसी परिवार की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसान पशुपालन के माध्यम से अपनी कृषि आय को मजबूत करते हैं। यदि पशुओं में गंभीर बीमारी फैलती है तो दूध उत्पादन प्रभावित हो सकता है, पशु की उत्पादकता घट सकती है और उपचार पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है।

संक्रामक रोगों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनका प्रभाव एक पशु तक सीमित नहीं रहता। पर्याप्त सावधानी और निगरानी के अभाव में संक्रमण दूसरे पशुओं तथा आसपास के क्षेत्रों तक फैल सकता है। यही कारण है कि पशु रोगों की रोकथाम को केवल उपचार के बजाय रोकथाम, टीकाकरण और निगरानी आधारित रणनीति के रूप में देखना आवश्यक है।

NADCP इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए देशभर में पशु स्वास्थ्य सुरक्षा का एक व्यापक ढांचा तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है।

करोड़ों पशुओं तक पहुंचा टीकाकरण अभियान

राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत खुरपका-मुंहपका यानी FMD के विरुद्ध बड़े पैमाने पर टीकाकरण किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक 147.16 करोड़ वैक्सीन खुराक दी जा चुकी हैं और लगभग 8.04 करोड़ किसानों को इसका लाभ मिला है।

भारत जैसे विशाल देश में इतने व्यापक स्तर पर टीकाकरण अभियान संचालित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। देश के अलग-अलग राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां, पशुधन की संख्या और पशुपालकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच अलग-अलग है। ऐसे में घर-घर या गांव-गांव तक पशु स्वास्थ्य सेवाओं को पहुंचाना कार्यक्रम की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

व्यापक टीकाकरण का उद्देश्य केवल तत्काल संक्रमण को रोकना नहीं है। लगातार प्रतिरक्षण के माध्यम से बीमारी के प्रसार की संभावना कम की जा सकती है और पशुधन आबादी में रोग के खिलाफ सुरक्षा मजबूत की जा सकती है।

FMD मामलों में आई उल्लेखनीय गिरावट

राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम की प्रगति को बीमारी से संबंधित आंकड़ों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2019 में FMD के 132 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2025 में इनकी संख्या घटकर 40 रह गई।

यह कमी व्यापक टीकाकरण और रोग निगरानी की दिशा में किए गए प्रयासों के महत्व को रेखांकित करती है। हालांकि किसी संक्रामक बीमारी को पूरी तरह समाप्त करना एक लंबी और निरंतर प्रक्रिया होती है। इसके लिए नियमित टीकाकरण के साथ-साथ संदिग्ध मामलों की तुरंत पहचान, नमूनों की जांच, प्रभावी निगरानी और राज्यों के बीच सूचनाओं का त्वरित आदान-प्रदान भी जरूरी है।

इसलिए FMD नियंत्रण को एक बार की गतिविधि के बजाय लगातार चलने वाले राष्ट्रीय अभियान के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

ब्रुसेलोसिस पर भी नियंत्रण की दिशा में प्रगति

NADCP का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारी के प्रभाव को कम करना भी है। पशुधन से जुड़ी इस बीमारी की रोकथाम के लिए टीकाकरण, निगरानी और जागरूकता को महत्व दिया जाता है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ब्रुसेलोसिस के मामले 2019 में 22 से घटकर 2025 में 15 रह गए। आंकड़ों में आई यह गिरावट पशु रोग नियंत्रण के लिए अपनाए गए उपायों की दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।

हालांकि, बीमारी को नियंत्रित करने के लिए सरकारी प्रयासों के साथ पशुपालकों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी पशु में बीमारी के असामान्य संकेत दिखाई दें तो उसे दूसरे पशुओं से अलग रखना, समय पर पशु चिकित्सक से सलाह लेना और संबंधित विभाग को जानकारी देना संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है।

NSP एंटीबॉडी में कमी से मिले महत्वपूर्ण संकेत

पशु रोग नियंत्रण की वास्तविक स्थिति का आकलन केवल सामने आए मामलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक निगरानी में NSP एंटीबॉडी जैसे संकेतकों का भी अध्ययन किया जाता है। ये संकेतक संक्रमण की स्थिति और उसके प्रसार को समझने में वैज्ञानिकों और पशु स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए उपयोगी होते हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार NSP एंटीबॉडी की मौजूदगी 2019 में 20.8 प्रतिशत से घटकर 2025 में 8.1 प्रतिशत हो गई। इस बदलाव को FMD नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा सकता है।

इस तरह के आंकड़े यह समझने में मदद करते हैं कि रोग नियंत्रण अभियान का प्रभाव केवल रिपोर्ट किए गए मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि संक्रमण की व्यापक स्थिति में भी बदलाव दिखाई दे रहा है।

Asia-1 के मामलों में महत्वपूर्ण उपलब्धि

FMD वायरस के अलग-अलग प्रकार पशुधन स्वास्थ्य के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। इनमें Asia-1 भी महत्वपूर्ण प्रकार रहा है। इसके विरुद्ध नियंत्रण हासिल करना भारत के पशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।

Asia-1 से जुड़े मामलों में कमी का अर्थ केवल बीमारी के आंकड़ों में सुधार नहीं है। इसका व्यापक असर पशुपालकों की आय, दूध उत्पादन, पशु उत्पादकता और ग्रामीण बाजारों पर पड़ सकता है। जब पशुओं में बीमारी का खतरा कम होता है तो किसानों को उत्पादन में अचानक गिरावट और उपचार संबंधी अतिरिक्त आर्थिक बोझ से बचने में सहायता मिलती है।

रोग नियंत्रण की यह प्रगति भारत के पशुधन क्षेत्र को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

केवल टीकाकरण नहीं, निगरानी भी जरूरी

पशु रोगों पर स्थायी नियंत्रण के लिए केवल वैक्सीन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। बीमारी की पहचान और उसके संभावित प्रसार पर लगातार नजर रखना भी आवश्यक है।

इसके लिए आधुनिक निगरानी व्यवस्था, प्रयोगशाला नेटवर्क, प्रशिक्षित पशु चिकित्साकर्मी, समय पर रिपोर्टिंग और डिजिटल तकनीक का उपयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ग्रामीण स्तर पर पशुपालकों को भी यह जानकारी होनी चाहिए कि बीमारी के संभावित लक्षण दिखने पर किस विभाग या स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करना है।

जितनी जल्दी संक्रमण की पहचान होगी, उतनी ही जल्दी नियंत्रण संबंधी कार्रवाई शुरू की जा सकेगी।

पशुपालकों की जागरूकता बनेगी सबसे बड़ी ताकत

सरकारी योजनाओं की सफलता में लाभार्थियों की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। पशु स्वास्थ्य के मामले में यह भूमिका और भी अहम हो जाती है। किसान यदि समय पर टीकाकरण करवाते हैं, पशुओं की नियमित निगरानी करते हैं और बीमारी के संकेतों की जानकारी देते हैं तो रोग नियंत्रण अभियान अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

गांवों में पशु स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता अभियान और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम पशुपालकों को वैज्ञानिक पशुपालन के प्रति जागरूक करने में मदद कर सकते हैं।

स्वस्थ पशुधन से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

भारत के लिए पशुधन स्वास्थ्य का मुद्दा सीधे ग्रामीण समृद्धि से जुड़ा है। स्वस्थ पशु अधिक उत्पादक होते हैं और उनका सीधा लाभ पशुपालक परिवारों की आय पर पड़ता है। बीमारी का खतरा घटने से उपचार खर्च कम करने, उत्पादन बनाए रखने और पशुपालन को अधिक भरोसेमंद आजीविका बनाने में सहायता मिल सकती है।

राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम इसी व्यापक लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। FMD और ब्रुसेलोसिस के मामलों में कमी, बड़े पैमाने पर टीकाकरण और निगरानी संकेतकों में सुधार इस अभियान की प्रगति को दर्शाते हैं।

आने वाले समय में यदि टीकाकरण की निरंतरता, वैज्ञानिक निगरानी, प्रयोगशाला क्षमता, पशु चिकित्सकीय सेवाओं और किसानों की भागीदारी को और मजबूत किया जाता है, तो भारत पशु रोगों के नियंत्रण के लक्ष्य के और करीब पहुंच सकता है।

निष्कर्षतः, स्वस्थ पशुधन केवल स्वस्थ गांवों की पहचान नहीं है, बल्कि यह किसानों की आर्थिक सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की मजबूती से भी जुड़ा है। NADCP जैसे व्यापक अभियानों के माध्यम से भारत पशु स्वास्थ्य को राष्ट्रीय विकास के एजेंडे से जोड़ते हुए एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ सकता है, जहां कम बीमारी, अधिक पशु उत्पादकता और बेहतर ग्रामीण आय एक-दूसरे के पूरक बनें।

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