ड्रोन कैसे काम करता है? जानिए उड़ने वाले ड्रोन के पीछे का पूरा विज्ञान

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आज के समय में ड्रोन तकनीक तेजी से हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन रही है। शादी और कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी से लेकर खेती, सर्वेक्षण, आपदा प्रबंधन, डिलीवरी और वैज्ञानिक अनुसंधान तक ड्रोन का इस्तेमाल अलग-अलग क्षेत्रों में किया जा रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना पायलट के कॉकपिट में बैठे एक छोटा-सा ड्रोन हवा में स्थिर कैसे रहता है और अपनी दिशा कैसे बदलता है?

दरअसल, ड्रोन के काम करने के पीछे मोटर, प्रोपेलर, बैटरी, सेंसर, फ्लाइट कंट्रोलर, संचार प्रणाली और कई सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम का तालमेल होता है। आधुनिक ड्रोन लगातार अपने सेंसर से जानकारी लेते हैं और उसी के आधार पर मोटरों की गति को नियंत्रित करते हैं।

ड्रोन क्या होता है?

ड्रोन को सामान्य भाषा में ऐसा उड़ने वाला विमान कहा जा सकता है जिसे जमीन पर मौजूद व्यक्ति रिमोट कंट्रोल या किसी स्वचालित प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित कर सकता है। तकनीकी भाषा में इसे Unmanned Aircraft System (UAS) या छोटे आकार के मामले में Unmanned Aircraft कहा जाता है।

ड्रोन के कई प्रकार होते हैं। इनमें चार प्रोपेलर वाले क्वाडकॉप्टर सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। इसके अलावा छह या आठ प्रोपेलर वाले मल्टीरोटर ड्रोन और विमान जैसे डिजाइन वाले फिक्स्ड-विंग ड्रोन भी होते हैं।

ड्रोन हवा में कैसे उड़ता है?

ड्रोन के उड़ने का सबसे महत्वपूर्ण काम उसके प्रोपेलर और मोटर करते हैं। जब बैटरी से बिजली मोटरों तक पहुंचती है तो मोटर तेजी से घूमने लगती हैं। मोटरों से जुड़े प्रोपेलर हवा को नीचे की ओर धकेलते हैं। इसके परिणामस्वरूप ड्रोन पर ऊपर की दिशा में बल उत्पन्न होता है और वह हवा में उठने लगता है।

जब प्रोपेलरों द्वारा पैदा किया गया ऊपर की ओर बल ड्रोन के वजन के बराबर हो जाता है, तो ड्रोन एक निश्चित ऊंचाई पर मंडरा सकता है। इसे होवरिंग कहा जाता है।

यही कारण है कि ड्रोन के लिए प्रोपेलर का आकार, मोटर की क्षमता और वजन का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण होता है।

मोटर की गति से बदलती है दिशा

क्वाडकॉप्टर ड्रोन में सामान्यतः चार मोटर और चार प्रोपेलर होते हैं। फ्लाइट कंट्रोलर आवश्यकता के अनुसार प्रत्येक मोटर की गति को अलग-अलग बढ़ाता या घटाता है।

यदि सभी मोटर लगभग समान गति से घूमते हैं तो ड्रोन स्थिर रह सकता है। लेकिन किसी दिशा में जाने के लिए मोटरों की गति में अंतर पैदा किया जाता है।

उदाहरण के लिए, आगे बढ़ने के लिए ड्रोन अपने शरीर को थोड़ा आगे की ओर झुका सकता है। इससे प्रोपेलरों द्वारा उत्पन्न बल का एक हिस्सा आगे की दिशा में काम करने लगता है और ड्रोन आगे बढ़ता है।

इसी तरह पीछे, दाएं या बाएं जाने के लिए ड्रोन अपने कोण को बदलता है।

ड्रोन में फ्लाइट कंट्रोलर क्या करता है?

फ्लाइट कंट्रोलर ड्रोन का दिमाग माना जा सकता है। यह लगातार सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों को पढ़ता है और तय करता है कि मोटरों को कितनी गति से चलाना है।

आधुनिक उड़ान प्रणालियों में मुख्य नियंत्रक मोटर की गति, GPS स्थिति, सेंसरों और पायलट के निर्देशों जैसी जानकारियों को संसाधित कर सकता है।

मान लीजिए हवा के कारण ड्रोन थोड़ा दाईं तरफ झुकने लगा। सेंसर इस बदलाव को महसूस करते हैं। फ्लाइट कंट्रोलर उस जानकारी का विश्लेषण करता है और संबंधित मोटरों की गति में बहुत छोटे बदलाव करता है। इससे ड्रोन दोबारा संतुलित होने की कोशिश करता है।

यह प्रक्रिया एक सेकंड में कई बार हो सकती है।

IMU सेंसर की भूमिका

ड्रोन को स्थिर रखने में IMU यानी Inertial Measurement Unit की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसमें सामान्यतः जाइरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर जैसे सेंसर होते हैं।

जाइरोस्कोप ड्रोन के घूमने या झुकने से संबंधित बदलावों को मापने में मदद करता है, जबकि एक्सेलेरोमीटर गति और त्वरण में होने वाले बदलावों का पता लगाने में सहायता करता है। FAA के दस्तावेजों में भी IMU को ड्रोन की स्थिति और गति में बदलाव पहचानने वाली महत्वपूर्ण प्रणाली के रूप में बताया गया है।

इन सेंसरों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर फ्लाइट कंट्रोलर ड्रोन को संतुलित रखने के लिए मोटरों को नियंत्रित करता है।

GPS ड्रोन को रास्ता कैसे बताता है?

कई आधुनिक ड्रोन में GPS या अन्य GNSS तकनीक का इस्तेमाल होता है। GPS उपग्रहों से प्राप्त संकेतों के आधार पर रिसीवर अपनी स्थिति निर्धारित करता है। FAA के अनुसार GPS रिसीवर कई उपग्रहों के संकेतों का इस्तेमाल करके अक्षांश, देशांतर, ऊंचाई और समय जैसी जानकारी निर्धारित कर सकता है।

GPS की मदद से सक्षम ड्रोन अपनी स्थिति को समझने, निर्धारित स्थान पर बने रहने और कुछ स्वचालित उड़ान सुविधाओं को संचालित करने में सहायता प्राप्त कर सकता है।

हालांकि GPS हर परिस्थिति में समान रूप से सटीक नहीं होता। इमारतों, पेड़ों और अन्य बाधाओं के कारण सिग्नल या स्थिति निर्धारण प्रभावित हो सकता है।

बैटरी ड्रोन को ऊर्जा देती है

ड्रोन की पूरी उड़ान उसकी बैटरी पर निर्भर करती है। सामान्य मल्टीरोटर ड्रोन में हल्की लेकिन पर्याप्त ऊर्जा देने वाली बैटरी इस्तेमाल की जाती है।

बैटरी से बिजली Electronic Speed Controller यानी ESC तक जाती है। ESC मोटर की गति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फ्लाइट कंट्रोलर के निर्देशों के अनुसार ESC मोटर को आवश्यक गति देने में मदद करता है।

ड्रोन जितना भारी होगा और जितनी अधिक शक्ति मोटरों को चाहिए होगी, उतनी ही तेजी से बैटरी की ऊर्जा खर्च हो सकती है।

रिमोट कंट्रोल से ड्रोन तक आदेश कैसे पहुंचता है?

ड्रोन को उड़ाने वाला व्यक्ति रिमोट कंट्रोल के माध्यम से आदेश भेजता है। रिमोट पर मौजूद नियंत्रणों से ऊंचाई, दिशा और गति से जुड़े निर्देश ड्रोन के रिसीवर तक पहुंचते हैं।

इसके बाद रिसीवर इन आदेशों को फ्लाइट कंट्रोलर तक पहुंचाता है। फ्लाइट कंट्रोलर सेंसरों की जानकारी के साथ इन आदेशों को मिलाकर मोटरों को आवश्यक निर्देश देता है।

इस पूरी प्रक्रिया में बहुत कम समय लगता है, इसलिए ड्रोन नियंत्रित करने वाले व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है कि ड्रोन उसके निर्देश पर तुरंत प्रतिक्रिया दे रहा है।

ड्रोन हवा में स्थिर कैसे रहता है?

ड्रोन का स्थिर रहना केवल मोटरों की समान गति पर निर्भर नहीं करता। हवा, वजन, झुकाव और अन्य परिस्थितियों में लगातार बदलाव होते रहते हैं।

फ्लाइट कंट्रोलर इन बदलावों को सेंसरों के माध्यम से पहचानता है और मोटरों की गति में छोटे-छोटे सुधार करता रहता है। यही फीडबैक कंट्रोल ड्रोन को संतुलित उड़ान बनाए रखने में मदद करता है।

यानी ड्रोन एक बार मोटर चालू करके बस हवा में नहीं टिक जाता, बल्कि उसका कंप्यूटर लगातार स्थिति को मापता और सुधार करता रहता है।

कैमरा और सेंसर का इस्तेमाल

कैमरा ड्रोन का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, लेकिन कई आधुनिक ड्रोन में कैमरे लगाए जाते हैं। इनका इस्तेमाल फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, सर्वेक्षण और निरीक्षण जैसे कामों में किया जाता है।

कुछ विशेष ड्रोन में अतिरिक्त सेंसर भी लगाए जा सकते हैं, जो ऊंचाई, दूरी या आसपास की परिस्थितियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने में सहायता करते हैं।

इस तरह ड्रोन केवल उड़ने वाली मशीन नहीं रह गया है, बल्कि वह एक उड़ता हुआ सेंसर प्लेटफॉर्म भी बन गया है।

ड्रोन का इस्तेमाल कहां होता है?

आज ड्रोन का उपयोग कई क्षेत्रों में हो रहा है। उदाहरण के तौर पर—

  • हवाई फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी
  • कृषि क्षेत्र का निरीक्षण
  • जमीन और इमारतों का सर्वेक्षण
  • आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण
  • पर्यावरण और वन क्षेत्र का अध्ययन
  • निर्माण परियोजनाओं की निगरानी
  • वैज्ञानिक अनुसंधान
  • कुछ स्थानों पर सामान की डिलीवरी

इन कामों में ड्रोन ऐसे स्थानों तक पहुंचने में मदद कर सकता है जहां इंसान के लिए पहुंचना कठिन या समय लेने वाला हो सकता है।

ड्रोन उड़ाते समय सुरक्षा क्यों जरूरी है?

ड्रोन तकनीक उपयोगी होने के साथ जिम्मेदारी भी मांगती है। घूमते हुए प्रोपेलर चोट पहुंचा सकते हैं और ड्रोन को लोगों, इमारतों, पेड़ों या बिजली की लाइनों के बहुत पास उड़ाना जोखिमपूर्ण हो सकता है। FAA की सुरक्षा सामग्री भी उड़ान से पहले प्रोपेलर, बैटरी और अन्य हिस्सों की जांच तथा लोगों और बाधाओं से सुरक्षित दूरी रखने पर जोर देती है।

इसके अलावा ड्रोन उड़ाने से पहले अपने देश और क्षेत्र के लागू नियमों को जानना आवश्यक है। अलग-अलग देशों में पंजीकरण, उड़ान क्षेत्र, ऊंचाई और अन्य नियम अलग हो सकते हैं।

निष्कर्ष

ड्रोन के उड़ने का विज्ञान देखने में जितना सरल लगता है, उसके पीछे उतनी ही जटिल तकनीक काम करती है। मोटर और प्रोपेलर ड्रोन को हवा में उठाते हैं, बैटरी उसे ऊर्जा देती है, ESC मोटरों की गति नियंत्रित करता है, IMU जैसे सेंसर उसकी स्थिति में बदलाव पहचानते हैं और फ्लाइट कंट्रोलर इन सभी जानकारियों को मिलाकर ड्रोन को संतुलित रखने में मदद करता है। GPS जैसी तकनीक स्थिति निर्धारण और कुछ स्वचालित उड़ान सुविधाओं में सहायता करती है।

यही सभी तकनीकें मिलकर एक ऐसी उड़ने वाली मशीन तैयार करती हैं जिसे जमीन से नियंत्रित किया जा सकता है और जो अनेक क्षेत्रों में मानव के लिए उपयोगी साबित हो रही है। आने वाले समय में सेंसर, कंप्यूटिंग और स्वचालन तकनीक के विकास के साथ ड्रोन के उपयोग और क्षमताओं में और विस्तार देखने को मिल सकता है।

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