‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ से ‘लैबोरेटरी ऑफ द वर्ल्ड’ बने भारत, AI और रिसर्च से बदलेगा स्वास्थ्य क्षेत्र: अनुप्रिया पटेल

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अहमदाबाद: भारत ने बीते वर्षों में वैश्विक दवा उद्योग में अपनी मजबूत जगह बनाई है।…

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अहमदाबाद: भारत ने बीते वर्षों में वैश्विक दवा उद्योग में अपनी मजबूत जगह बनाई है। सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं, वैक्सीन तथा विभिन्न चिकित्सा उत्पादों की आपूर्ति के कारण भारतीय फार्मास्युटिकल क्षेत्र को दुनिया में खास पहचान मिली है। अब देश की नजर केवल दवाओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन तक सीमित नहीं है। भारत स्वास्थ्य क्षेत्र में शोध, तकनीकी नवाचार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल के जरिए एक नई भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने इसी दिशा की ओर संकेत करते हुए कहा कि भारत को अपनी पहचान ‘दुनिया की फार्मेसी’ से आगे बढ़ाकर ‘दुनिया की प्रयोगशाला’ के रूप में विकसित करनी चाहिए। उनके मुताबिक स्वास्थ्य क्षेत्र का भविष्य रिसर्च, इनोवेशन और नई तकनीकों से जुड़ा है और भारत को इस बदलाव में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।

यह विचार अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM-A) में आयोजित IIMA Healthcare Summit 2026 के तीसरे संस्करण के दौरान सामने आया। सम्मेलन में इस बार ‘Advancing AI in Healthcare’ को केंद्रीय विषय बनाया गया। कार्यक्रम में स्वास्थ्य सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की संभावनाओं, चिकित्सा अनुसंधान, तकनीकी बदलाव और भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।

उत्पादन क्षमता से आगे बढ़ने की जरूरत

भारत की फार्मा इंडस्ट्री ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपयोगिता लंबे समय से साबित की है। बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का उत्पादन, वैक्सीन निर्माण और कई देशों को चिकित्सा सामग्री की आपूर्ति भारतीय उद्योग की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।

हालांकि, वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था अब तेजी से बदल रही है। नई बीमारियों से निपटने, बेहतर उपचार विकसित करने और मरीजों की जरूरत के अनुसार चिकित्सा समाधान तैयार करने के लिए केवल उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए अत्याधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी दक्षता की आवश्यकता होगी।

यही कारण है कि भारत के सामने अब अगली चुनौती अपनी रिसर्च क्षमता को वैश्विक स्तर तक ले जाने की है। दवा की खोज, बायोटेक्नोलॉजी, मेडिकल डिवाइस, जीन आधारित अनुसंधान, डेटा साइंस और AI जैसी तकनीकें आने वाले समय में स्वास्थ्य क्षेत्र की दिशा तय कर सकती हैं।

कोविड महामारी ने दिखाई भारतीय क्षमता

कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी उत्पादन और आपूर्ति क्षमता का प्रदर्शन किया था। दवाओं और वैक्सीन के निर्माण से लेकर आवश्यक चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता तक, देश के फार्मास्युटिकल और स्वास्थ्य क्षेत्र ने बड़े स्तर पर काम किया।

महामारी ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी देश के लिए मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ-साथ वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी आत्मनिर्भरता कितनी महत्वपूर्ण है। संकट के दौरान विकसित क्षमताओं को अब दीर्घकालिक शोध और नवाचार में बदलना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा सकता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में AI की बढ़ती भूमिका

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से अपनी जगह बना रहा है। बीमारी की पहचान, मेडिकल इमेज की जांच, मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण, दवाओं की खोज और उपचार संबंधी निर्णयों में AI आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

भविष्य में AI डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए एक सहायक तकनीक के रूप में काम कर सकता है। बड़ी मात्रा में मेडिकल डेटा को कम समय में समझने की क्षमता के कारण इसका उपयोग रिसर्च को गति देने में भी किया जा सकता है।

हालांकि, स्वास्थ्य क्षेत्र में AI का इस्तेमाल केवल तकनीकी उपलब्धि का विषय नहीं है। मरीजों की गोपनीयता, डेटा सुरक्षा, सटीकता और नैतिक मानकों को भी समान महत्व देना होगा। भारत के लिए चुनौती ऐसी तकनीक विकसित करने की है जो प्रभावी होने के साथ भरोसेमंद और जिम्मेदार भी हो।

दवा अनुसंधान में नई संभावनाएं

नई दवाओं की खोज एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। किसी संभावित दवा को प्रयोगशाला से मरीज तक पहुंचने में काफी समय और संसाधन लगते हैं। AI और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकें इस प्रक्रिया के कुछ हिस्सों को अधिक तेज और व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकती हैं।

इन तकनीकों के माध्यम से वैज्ञानिक बड़ी मात्रा में जैविक और चिकित्सा डेटा का विश्लेषण कर संभावित दवा उम्मीदवारों की पहचान कर सकते हैं। इससे रिसर्च की दिशा तय करने और प्रयोगों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।

यदि भारत इस क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता विकसित करता है, तो देश की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री केवल वैश्विक मांग को पूरा करने वाला उत्पादन केंद्र नहीं रहेगी, बल्कि नई चिकित्सा खोजों और स्वास्थ्य तकनीकों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

IIM अहमदाबाद में स्वास्थ्य क्षेत्र के भविष्य पर मंथन

IIMA Healthcare Summit 2026 में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन का AI पर केंद्रित होना इस बात का संकेत है कि तकनीक और स्वास्थ्य सेवाओं का संबंध आने वाले वर्षों में और मजबूत होने वाला है।

स्वास्थ्य प्रबंधन, मेडिकल रिसर्च, डिजिटल हेल्थ और तकनीकी नवाचार के बीच बेहतर तालमेल भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। इसके लिए सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थानों, वैज्ञानिक समुदाय और स्टार्टअप कंपनियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना जरूरी होगा।

स्टार्टअप और युवा वैज्ञानिकों के लिए अवसर

स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीकी बदलाव भारत के युवा वैज्ञानिकों और स्टार्टअप्स के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकता है। हेल्थटेक, मेडिकल AI, डिजिटल डायग्नोस्टिक्स, बायोटेक्नोलॉजी और मेडिकल डिवाइस जैसे क्षेत्रों में नए विचारों को व्यावहारिक समाधान में बदलने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

यदि अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी विकसित होती है, तो प्रयोगशाला में तैयार तकनीक को वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचाना आसान हो सकता है। इससे भारत में नवाचार का पूरा इकोसिस्टम मजबूत होने की उम्मीद है।

‘लैबोरेटरी ऑफ द वर्ल्ड’ बनने की राह

भारत के लिए ‘लैबोरेटरी ऑफ द वर्ल्ड’ बनने का मतलब केवल अधिक शोध पत्र प्रकाशित करना या नई तकनीक विकसित करना नहीं होगा। इसका व्यापक अर्थ ऐसी वैज्ञानिक क्षमता तैयार करना है, जिसके जरिए दुनिया की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए नए और किफायती समाधान तैयार किए जा सकें।

भारत के पास बड़ी आबादी, विशाल स्वास्थ्य डेटा, मजबूत फार्मास्युटिकल उद्योग, तकनीकी प्रतिभा और तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम जैसी कई महत्वपूर्ण क्षमताएं हैं। इन संसाधनों को अनुसंधान और नवाचार से जोड़ना देश को वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान के प्रमुख केंद्रों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

आगे की राह में क्या होगी चुनौती?

भारत के सामने अवसरों के साथ कई चुनौतियां भी हैं। उच्च गुणवत्ता वाले शोध के लिए पर्याप्त निवेश, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, प्रशिक्षित वैज्ञानिक, मजबूत डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और उद्योग-अकादमिक सहयोग जरूरी होगा।

इसके अलावा AI आधारित स्वास्थ्य समाधानों के लिए स्पष्ट नैतिक और नियामकीय व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी। तकनीक का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

निष्कर्ष

अनुप्रिया पटेल का ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ से ‘लैबोरेटरी ऑफ द वर्ल्ड’ बनने का आह्वान भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की संभावित अगली दिशा को सामने रखता है। देश ने दवाओं और वैक्सीन के उत्पादन में अपनी क्षमता स्थापित की है। अब जरूरत इस क्षमता को वैज्ञानिक अनुसंधान, AI, जैव प्रौद्योगिकी और नवाचार के साथ जोड़ने की है।

अगर भारत उत्पादन के साथ-साथ नई दवाओं, चिकित्सा तकनीकों और स्वास्थ्य समाधानों के विकास में भी वैश्विक नेतृत्व हासिल करता है, तो उसकी भूमिका केवल दुनिया को दवाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगी। वह वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान तैयार करने वाले प्रमुख देशों में भी अपनी जगह बना सकता है।

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