भागीरथपुरा जल संकट पर हाईकोर्ट में सुनवाई, मौतों के आंकड़ों को लेकर बड़ा विवाद; मुआवजे और अफसरों की लापरवाही पर उठे सवाल
इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित भागीरथपुरा क्षेत्र में करीब आठ महीने पहले सामने आए जल प्रदूषण और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्या का मामला एक बार फिर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चर्चा के केंद्र में आ गया है। मामले की सुनवाई के दौरान जांच आयोग की रिपोर्ट के कई महत्वपूर्ण पहलुओं का उल्लेख हुआ। रिपोर्ट में मौतों की संख्या, पीड़ित परिवारों को मिलने वाले मुआवजे और जल आपूर्ति व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की कथित लापरवाही को लेकर गंभीर बातें सामने आने की बात कही गई है।
इस मामले में सबसे अहम विवाद मृतकों की संख्या को लेकर है। प्रशासन की ओर से जहां 36 लोगों की मौत की पुष्टि किए जाने की बात सामने आई है, वहीं जांच आयोग की रिपोर्ट में मृतकों की संख्या 22 बताई गई है। याचिकाकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता रितेश इनानी ने इस अंतर पर गंभीर आपत्ति जताते हुए वास्तविक मृतकों की संख्या इससे अधिक होने का दावा किया है। उन्होंने अदालत के समक्ष पूरे मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने की मांग रखी।

सीलबंद लिफाफे में अदालत पहुंची जांच रिपोर्ट
जानकारी के मुताबिक, भागीरथपुरा जल संकट की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय जांच आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट 25 अगस्त को हाईकोर्ट में सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की थी। सुनवाई के दौरान रिपोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों से याचिकाकर्ताओं को अवगत कराया गया।
जांच रिपोर्ट को सीलबंद तरीके से अदालत में पेश किए जाने के कारण पूरे मामले की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ सकी है। हालांकि सुनवाई के दौरान रिपोर्ट के जिन अंशों का उल्लेख हुआ, उनसे यह संकेत मिला कि आयोग ने जल आपूर्ति व्यवस्था, संबंधित विभागों की भूमिका और संकट से निपटने की प्रशासनिक तैयारियों पर सवाल उठाए हैं।
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि रिपोर्ट के सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना जरूरी है, ताकि पीड़ित परिवारों और आम नागरिकों को यह जानकारी मिल सके कि आखिर जल संकट की स्थिति पैदा कैसे हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई।
मौतों के आंकड़ों पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई में सबसे संवेदनशील मुद्दा मृतकों की संख्या का रहा। प्रशासन द्वारा 36 मौतों की पुष्टि किए जाने की बात सामने आई, जबकि आयोग की रिपोर्ट में 22 मृतकों का उल्लेख बताया गया है। आंकड़ों में इस अंतर ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता रितेश इनानी ने दावा किया कि वास्तविक मृतकों की संख्या 39 से अधिक हो सकती है। उनका तर्क है कि यदि सरकारी आंकड़ों और जांच आयोग की रिपोर्ट में ही अंतर है, तो पूरे मामले में आंकड़ों के सत्यापन की आवश्यकता है।
मौतों की संख्या से जुड़ा यह विवाद केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध पीड़ित परिवारों को मिलने वाली सहायता और मुआवजे से भी है। इसलिए याचिकाकर्ता पक्ष ने इस विषय पर स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी सामने लाने की आवश्यकता बताई है।
पीड़ित परिवारों के मुआवजे का मुद्दा भी गरमाया
सुनवाई के दौरान पीड़ित परिवारों को दिए जाने वाले मुआवजे का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। बताया गया कि जांच आयोग ने मृतकों के परिवारों के लिए करीब 20 लाख रुपये के मुआवजे की सिफारिश की है। दूसरी ओर, जिला प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराई गई आर्थिक सहायता इससे काफी कम होने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ता पक्ष ने इस अंतर पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि यदि जांच आयोग ने पीड़ित परिवारों के लिए एक निश्चित राशि की सिफारिश की है, तो उसके क्रियान्वयन पर भी स्पष्ट निर्णय होना चाहिए।
इसके अलावा जल संकट के दौरान प्रभावित और बीमार हुए लोगों के इलाज पर होने वाले खर्च को लेकर भी आर्थिक सहायता का विषय सामने आया। पीड़ितों का कहना है कि स्वास्थ्य संकट का असर केवल तत्काल उपचार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई लोगों को लंबे समय तक चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में इलाज संबंधी सहायता को भी गंभीरता से लिया जाना जरूरी है।
पानी की समस्या पहले से जानकारी में थी?
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू नगर निगम के जल अभियांत्रिकी विभाग से जुड़ा बताया गया है। जांच रिपोर्ट में कथित तौर पर अधिकारियों की भूमिका और संभावित लापरवाही की ओर संकेत किया गया है।
रिपोर्ट से जुड़े विवरण के अनुसार, दूषित पानी की समस्या के बारे में संबंधित अधिकारियों को पहले से जानकारी होने की बात कही गई है। इतना ही नहीं, नई पाइपलाइन बिछाने के लिए लगभग दो वर्ष पहले ही टेंडर जारी किए जाने का भी उल्लेख सामने आया है।
यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है कि समस्या की जानकारी होने के बावजूद नई पाइपलाइन का काम समय पर पूरा नहीं हुआ, तो यह प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। सवाल यह है कि जब जलापूर्ति से जुड़ी समस्या पहले से सामने थी और उसके समाधान के लिए प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी, तब उसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया।
यही बिंदु इस पूरे मामले में संभावित लापरवाही की जांच को महत्वपूर्ण बनाता है।
जिम्मेदारी तय करने की मांग
याचिकाकर्ता पक्ष ने केवल मुआवजे तक मामला सीमित रखने के बजाय जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी विभाग या अधिकारी की लापरवाही के कारण लोगों को दूषित पानी की समस्या का सामना करना पड़ा और उससे गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हुआ, तो उसकी जवाबदेही भी निर्धारित होनी चाहिए।
अदालत के समक्ष उठाए गए मुद्दों में प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेने, पाइपलाइन परियोजना में हुई देरी और जल गुणवत्ता की निगरानी जैसे विषय महत्वपूर्ण बताए गए हैं।
ऐसे मामलों में केवल घटना के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए जल स्रोतों, पाइपलाइनों और वितरण व्यवस्था की नियमित निगरानी तथा शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई जरूरी है।
पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता रितेश इनानी की ओर से जांच आयोग की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई। उनका कहना है कि इस मामले में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। मृतकों की संख्या और मुआवजे जैसे मुद्दों पर अलग-अलग आंकड़े सामने आने के कारण जनता के सामने स्पष्ट तथ्य रखना आवश्यक हो गया है।
इसके साथ ही भविष्य में इस मामले की सुनवाई को लाइव-स्ट्रीम किए जाने की मांग भी रखी गई है। याचिकाकर्ता पक्ष का मानना है कि सार्वजनिक महत्व वाले इस मामले की न्यायिक कार्यवाही को अधिक पारदर्शी बनाने से लोगों का भरोसा मजबूत होगा।
अगली सुनवाई का इंतजार
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए बाद की तारीख निर्धारित की है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि अदालत जांच आयोग की रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों पर क्या रुख अपनाती है और मृतकों की संख्या से जुड़े विवाद पर किस तरह स्थिति स्पष्ट होती है।
भागीरथपुरा का यह मामला केवल एक इलाके में जल संकट की घटना नहीं है, बल्कि यह शहरी जल प्रबंधन, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार से जुड़े व्यापक सवाल खड़े करता है। यदि पहले से मौजूद समस्या के समाधान में वास्तव में देरी हुई थी, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना और भविष्य के लिए ठोस व्यवस्था बनाना बेहद जरूरी होगा।
फिलहाल जांच रिपोर्ट के पूर्ण सार्वजनिक होने और अदालत की आगे की सुनवाई के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी। पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा, प्रभावित लोगों के इलाज में सहायता और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर स्पष्ट निर्णय इस मामले की आगामी कानूनी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण बिंदु रहेंगे।