14 साल तक इलाज की उम्मीद, फिर AIIMS में 15 वर्षीय तन्वी की मौत; परिवार ने लगाए लापरवाही के गंभीर आरोप
नई दिल्ली/कोटा। राजस्थान के कोटा की 15 वर्षीय तन्वी की मौत ने देश के प्रमुख…
नई दिल्ली/कोटा। राजस्थान के कोटा की 15 वर्षीय तन्वी की मौत ने देश के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था, मरीजों की लंबी प्रतीक्षा और चिकित्सा सेवाओं तक समय पर पहुंच को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तन्वी ने 1 सितंबर 2026 को दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में दम तोड़ दिया। उसके परिवार का आरोप है कि जन्मजात हृदय संबंधी बीमारी के इलाज के लिए उन्होंने करीब 14 वर्षों तक अस्पताल के चक्कर लगाए, लेकिन ऑपरेशन की प्रक्रिया बार-बार टलती रही।
परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों के बाद AIIMS दिल्ली ने मामले की परिस्थितियों की जांच के लिए एक समिति गठित की है। फिलहाल जांच के निष्कर्ष का इंतजार है। इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि परिवार द्वारा लगाए गए चिकित्सा लापरवाही के आरोप अभी जांच के दायरे में हैं और इन्हें अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।

दो साल की उम्र में सामने आई थी गंभीर बीमारी
परिवार के मुताबिक तन्वी को बचपन से ही जन्मजात हृदय संबंधी समस्या थी। वर्ष 2012 में जब वह लगभग दो वर्ष की थी, उसके पिता मुकेश कुमार उसे इलाज के लिए AIIMS दिल्ली लेकर पहुंचे थे। परिवार का कहना है कि चिकित्सकीय जांच में उसके हृदय में छेद और एक महत्वपूर्ण नस के न होने जैसी जटिल समस्या के बारे में जानकारी मिली थी।
बेटी की बीमारी को गंभीर मानते हुए परिवार ने इलाज के लिए अस्पताल में लगातार संपर्क बनाए रखा। उन्हें उम्मीद थी कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में आवश्यक जांच और सर्जरी के माध्यम से तन्वी की स्थिति में सुधार किया जा सकेगा।
लेकिन परिवार का दावा है कि शुरुआती इलाज के बाद भी बीमारी के लिए आवश्यक सर्जरी लंबे समय तक नहीं हो सकी।
अलग-अलग विभागों के चक्कर लगाने का दावा
तन्वी के परिवार का आरोप है कि इलाज के दौरान उन्हें अस्पताल के अलग-अलग विभागों और चिकित्सकों से संपर्क करना पड़ा। परिवार के अनुसार, मामले को संबंधित विशेषज्ञों तक भेजा गया और डॉ. सचिन तलवार का भी संदर्भ आया, लेकिन जिस सर्जरी की जरूरत बताई जा रही थी, वह निर्धारित समय में नहीं हो पाई।
परिजनों का कहना है कि वे बार-बार अस्पताल पहुंचते रहे और अपनी बेटी के ऑपरेशन की उम्मीद लगाए रहे। हर बार इलाज की प्रक्रिया आगे बढ़ने की आशा रहती थी, लेकिन कथित तौर पर किसी न किसी कारण से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
ऐसे मामलों में बीमारी की गंभीरता, मरीज की स्थिति, उपलब्ध संसाधन और चिकित्सकीय प्राथमिकताएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए किसी भी देरी को चिकित्सा लापरवाही मानने से पहले पूरी मेडिकल हिस्ट्री और अस्पताल के रिकॉर्ड की जांच आवश्यक होती है।
4 अप्रैल 2014 की सर्जरी भी नहीं हुई
परिवार द्वारा बताए गए घटनाक्रम में वर्ष 2014 की एक तारीख विशेष रूप से सामने आती है। उनके अनुसार, AIIMS के कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी यानी CTVS विभाग की ओर से तन्वी की सर्जरी के लिए 4 अप्रैल 2014 की तारीख निर्धारित की गई थी।
परिजनों का आरोप है कि तय तारीख पर ऑपरेशन नहीं हो सका। इसके बाद भी उन्होंने इलाज की उम्मीद नहीं छोड़ी और कई वर्षों तक अस्पताल से संपर्क करते रहे।
एक छोटी बच्ची के माता-पिता के लिए यह स्थिति बेहद कठिन रही होगी। परिवार के अनुसार, वर्षों तक अस्पताल की यात्राएं करने के बावजूद उनकी बेटी का उपचार उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया जिसकी उन्हें उम्मीद थी।
14 साल बाद भी जारी रही इलाज की जद्दोजहद
तन्वी की कहानी केवल एक परिवार के अस्पताल जाने तक सीमित नहीं रही। परिवार के मुताबिक, बीमारी की जानकारी मिलने के बाद से लेकर उसकी मृत्यु तक लगभग 14 वर्षों का लंबा समय इलाज की कोशिशों में बीता।
इस दौरान तन्वी बचपन से किशोरावस्था तक पहुंच गई। जन्मजात हृदय रोग जैसी स्थिति में लंबे समय तक चिकित्सा निगरानी और समय-समय पर विशेषज्ञ मूल्यांकन महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि तन्वी के मामले में वास्तव में किस स्तर का उपचार किया गया, कौन-कौन सी चिकित्सकीय सलाह दी गई और सर्जरी में देरी के वास्तविक कारण क्या थे—इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
1 सितंबर को AIIMS दिल्ली में हुई मौत
परिवार की वर्षों की कोशिशों के बीच तन्वी की जिंदगी का दुखद अंत 1 सितंबर 2026 को AIIMS दिल्ली में हुआ। 15 वर्ष की उम्र में उसकी मौत की खबर सामने आने के बाद परिवार ने इलाज की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कथित लापरवाही की जांच की मांग की।
परिवार का मुख्य सवाल यही है कि यदि बीमारी का पता बचपन में चल गया था और सर्जरी की तारीख भी निर्धारित हुई थी, तो आखिर उपचार समय पर क्यों नहीं हो पाया।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जन्मजात हृदय संबंधी बीमारी से जुड़े प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं। किसी मरीज के लिए तत्काल सर्जरी जरूरी हो सकती है, जबकि किसी दूसरे मरीज में डॉक्टर पहले निगरानी या अन्य उपचार को प्राथमिकता दे सकते हैं। इसलिए तन्वी के मामले में निर्णयों का मूल्यांकन उसकी पूरी मेडिकल रिपोर्ट और चिकित्सकीय रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए।
AIIMS ने गठित की जांच समिति
तन्वी की मौत के बाद AIIMS दिल्ली की ओर से मामले की जांच के लिए समिति गठित किए जाने की जानकारी सामने आई है। समिति का उद्देश्य उपचार के दौरान हुई घटनाओं और परिस्थितियों की समीक्षा करना बताया गया है।
जांच में कई महत्वपूर्ण सवालों पर ध्यान दिया जा सकता है—तन्वी की बीमारी की प्रकृति क्या थी, अलग-अलग समय पर चिकित्सकों ने क्या सलाह दी, सर्जरी के लिए वास्तव में कौन-कौन सी तारीखें निर्धारित हुईं, किसी प्रक्रिया के स्थगित होने के पीछे क्या कारण थे और अस्पताल के रिकॉर्ड में इन घटनाओं का क्या विवरण दर्ज है।
यदि जांच में किसी स्तर पर प्रोटोकॉल या उपचार प्रक्रिया में गंभीर कमी पाई जाती है, तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। वहीं यदि रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि उपचार संबंधी निर्णय चिकित्सकीय परिस्थितियों के अनुरूप लिए गए थे, तो मामले की वास्तविक तस्वीर भी सामने आ सकेगी।
बड़े सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का दबाव
AIIMS दिल्ली देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शामिल है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से मरीज गंभीर और जटिल बीमारियों के उपचार के लिए पहुंचते हैं। मरीजों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण विशेषज्ञ विभागों और सर्जिकल सेवाओं पर दबाव बना रहना एक व्यापक चुनौती है।
विशेष रूप से जटिल और गैर-आपातकालीन सर्जरी के लिए प्रतीक्षा अवधि कई बार लंबी हो सकती है। हालांकि प्रतीक्षा का कारण हर मरीज और हर बीमारी में अलग होता है। आपात स्थिति, ऑपरेशन की प्राथमिकता, अस्पताल की क्षमता, उपलब्ध बेड, चिकित्सकीय तैयारी और मरीज की स्थिति जैसे कई कारक सर्जरी की तारीख को प्रभावित कर सकते हैं।
यही कारण है कि तन्वी के मामले की जांच केवल परिवार के आरोपों तक सीमित न रहकर अस्पताल के दस्तावेजों और उपचार रिकॉर्ड के आधार पर की जानी महत्वपूर्ण है।
परिवार के सवालों का जवाब जांच से मिलने की उम्मीद
तन्वी की मौत ने उसके परिवार को गहरे दुख में डाल दिया है। परिवार का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक अपनी बेटी के इलाज के लिए प्रयास किया और उन्हें उम्मीद थी कि विशेषज्ञ चिकित्सा से उसकी स्थिति बेहतर हो सकेगी।
अब उनकी मांग है कि यह स्पष्ट किया जाए कि उपचार के दौरान क्या हुआ और यदि कहीं कोई चूक हुई थी तो उसके लिए कौन जिम्मेदार था।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात निष्पक्ष जांच है। चिकित्सा लापरवाही जैसे गंभीर आरोपों पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन संबंधी दस्तावेज, चिकित्सकों की राय, अस्पताल की प्रक्रियाओं और मरीज की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति का विस्तृत अध्ययन जरूरी है।
क्या सामने आएगा जांच का निष्कर्ष?
तन्वी की मौत के बाद गठित समिति की जांच से कई अनुत्तरित सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है। क्या 2014 में प्रस्तावित सर्जरी किन्हीं चिकित्सकीय कारणों से स्थगित हुई थी? क्या बाद के वर्षों में उपचार की योजना बदली गई? क्या परिवार को समय-समय पर बीमारी और उपचार के विकल्पों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई? और क्या इलाज की प्रक्रिया में ऐसी कोई प्रशासनिक या चिकित्सकीय कमी थी जिसने स्थिति को प्रभावित किया?
इन सवालों के जवाब आधिकारिक जांच के बाद ही विश्वसनीय रूप से सामने आ सकेंगे।
तन्वी की कहानी फिलहाल एक परिवार के दर्द और वर्षों की उम्मीद की कहानी है। साथ ही यह स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने मौजूद उस बड़ी चुनौती की ओर भी ध्यान खींचती है, जिसमें गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को समय पर विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराना जरूरी है। जांच का निष्कर्ष न केवल तन्वी के परिवार के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को बेहतर तरीके से संभालने के लिए भी अहम साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: तन्वी की मौत के मामले में परिवार ने चिकित्सा लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं और AIIMS दिल्ली ने जांच समिति गठित की है। जब तक समिति की रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक किसी व्यक्ति या विभाग को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। अब सभी की नजर जांच के निष्कर्ष पर है, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि 14 वर्षों के लंबे इलाज के दौरान वास्तव में क्या परिस्थितियां रहीं और तन्वी को समय पर आवश्यक उपचार क्यों नहीं मिल पाया।