अहमद तिबी के बयान के बाद इजरायल की राजनीति में गठबंधन को लेकर नई चर्चा
यरुशलम | 20 सितंबर 2026
इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। विपक्षी दलों के बीच संभावित गठबंधन, अरब पार्टियों की भूमिका और अगली सरकार के गठन को लेकर बयानबाजी लगातार बढ़ रही है। इसी क्रम में हदाश-तआल के नेता और सांसद अहमद तिबी के हालिया बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
19 सितंबर को प्रसारित एक साक्षात्कार में तिबी ने चुनाव के बाद अरब दलों की संभावित राजनीतिक भूमिका के बारे में बात की। उन्होंने संकेत दिया कि यदि वर्तमान सरकार के विरोधी दल संसद में पर्याप्त संख्या हासिल करते हैं, तो अरब पार्टियां नई राजनीतिक व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया में भूमिका निभा सकती हैं। तिबी ने विशेष रूप से नई नेसेट के गठन के बाद स्पीकर को बदलने की संभावना का उल्लेख किया।
इसी बयान को लेकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने दावा किया कि गादी आइज़ेनकोट, याइर गोलान, एविग्डोर लिबरमैन और अरब दलों के बीच भविष्य की सरकार को लेकर एक राजनीतिक योजना बन रही है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लिकुड का यह निष्कर्ष एक राजनीतिक आरोप/दावा है; इसे आइज़ेनकोट की ओर से घोषित गठबंधन समझौते के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

तिबी के बयान का राजनीतिक अर्थ
अहमद तिबी लंबे समय से इजरायल की अरब राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। वर्तमान चुनावी समीकरण में अरब पार्टियों के पास सरकार बनाने या किसी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की संभावना पर चर्चा हो रही है।
तिबी ने अपने साक्षात्कार में विपक्षी खेमे की आंतरिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उनके अनुसार, यदि विपक्षी दल अलग-अलग दिशा में जाते हैं और किसी साझा प्रधानमंत्री उम्मीदवार पर सहमति नहीं बनती, तो सरकार बदलने की कोशिश मुश्किल हो सकती है। उन्होंने मजबूत अरब प्रतिनिधित्व को भी महत्वपूर्ण बताया।
इसी संदर्भ में नेसेट स्पीकर अमीर ओहाना और लिकुड के नेताओं ने तिबी के बयान को विपक्षी दलों तथा अरब पार्टियों के बीच संभावित सहयोग से जोड़कर पेश किया है। ओहाना ने दावा किया कि यह घटनाक्रम आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार की दिशा में पहला कदम हो सकता है। ये टिप्पणियां राजनीतिक पक्षों के दावे हैं और अंतिम चुनावी परिणाम या सरकार की संरचना का प्रमाण नहीं हैं।
आइज़ेनकोट की स्थिति क्या है?
पूर्व इजरायली सेना प्रमुख गादी आइज़ेनकोट इस चुनाव में एक प्रमुख विपक्षी राजनीतिक चेहरा बनकर उभरे हैं। उनकी पार्टी याशार केंद्र की राजनीति में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, याइर गोलान डेमोक्रेट्स पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और एविग्डोर लिबरमैन यिस्राएल बेतेनू के प्रमुख हैं।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में इन दलों के बीच चुनावी समन्वय और अतिरिक्त वोट समझौतों की चर्चा हुई है। इन समझौतों का उद्देश्य चुनावी प्रणाली में वोटों के विभाजन को कम करना और पार्टियों के संसदीय प्रतिनिधित्व को अधिकतम करना है।
हालांकि, चुनावी समझौता अपने आप में सरकार बनाने का अंतिम समझौता नहीं होता। इजरायल में चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद और गठबंधन सरकार को लेकर अलग-अलग दलों के बीच बातचीत होती है। इसलिए वर्तमान राजनीतिक समझौतों को सीधे भविष्य की मंत्रिमंडलीय संरचना के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
अरब पार्टियों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
इजरायल की 120 सदस्यीय नेसेट में सरकार बनाने के लिए आम तौर पर कम से कम 61 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। मौजूदा चुनावी परिदृश्य में किसी भी बड़े राजनीतिक खेमे के लिए यह संख्या हासिल करना आसान नहीं दिखाई दे रहा है।
हालिया सर्वेक्षणों के बारे में रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया है कि सरकार विरोधी दलों को संयुक्त रूप से बहुमत के करीब सीटें मिल सकती हैं, लेकिन अलग-अलग दलों के बीच राजनीतिक मतभेदों के कारण बहुमत वाली स्थिर सरकार बनाना फिर भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसी कारण अरब दलों की संभावित सीटें चुनाव के बाद बनने वाले समीकरणों में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। रिपोर्टों में जॉइंट लिस्ट और राअम जैसी अरब-बहुल पार्टियों के संभावित संसदीय प्रतिनिधित्व को निर्णायक तत्व के रूप में चर्चा में रखा गया है।
लिबरमैन की स्थिति भी चर्चा में
एविग्डोर लिबरमैन का नाम संभावित विपक्षी गठबंधन की चर्चाओं में लगातार सामने आ रहा है। हालांकि, अरब पार्टियों के साथ सहयोग का प्रश्न उनके लिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।
ले मोंद की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, लिबरमैन अरब पार्टियों के साथ प्रत्यक्ष गठबंधन को लेकर विरोधी रुख रखते हैं और उन्होंने आइज़ेनकोट से चुनाव के बाद संभावित सहयोगियों के बारे में स्पष्टता की मांग की है।
इससे पता चलता है कि विपक्षी खेमे में सरकार बदलने के लक्ष्य पर संभावित समानता होने के बावजूद सरकार की संरचना और सहयोगियों को लेकर सभी दलों की स्थिति समान नहीं है।
नेतन्याहू और लिकुड का पलटवार
अहमद तिबी के बयान के बाद लिकुड ने इसे आइज़ेनकोट और उनके संभावित सहयोगियों के खिलाफ राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया। नेतन्याहू और लिकुड नेताओं ने बार-बार यह दावा किया है कि आइज़ेनकोट के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए याइर गोलान, लिबरमैन और अरब पार्टियों का सहयोग लिया जा सकता है।
लिकुड की ओर से लगाए गए इस राजनीतिक आरोप के जवाब में आइज़ेनकोट की पार्टी ने अलग तस्वीर पेश की है। याशार ने कहा है कि सरकार में सहयोग केवल उन दलों के साथ संभव होगा जो इजरायल की स्वतंत्रता घोषणा के मूल्यों, इजरायल को यहूदी और लोकतांत्रिक राज्य के रूप में मान्यता तथा नागरिक एवं राष्ट्रीय सेवा से जुड़े सिद्धांतों को स्वीकार करते हों। पार्टी ने हमास के संबंध में भी एक स्पष्ट शर्त बताई है।
इसलिए यह कहना कि अरब दलों के साथ सरकार बनाने का अंतिम समझौता हो चुका है, उपलब्ध सार्वजनिक बयानों से पुष्ट नहीं होता।
चुनावी समीकरण पर असर
इजरायल में 2026 का चुनाव प्रधानमंत्री नेतन्याहू और उनके विरोधी दलों के बीच कड़े राजनीतिक मुकाबले के रूप में देखा जा रहा है। चुनाव 27 अक्टूबर को प्रस्तावित है और राजनीतिक दल अभी से संभावित गठबंधन की गणना कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव के बाद कौन-सा राजनीतिक समूह 61 सीटों के समर्थन तक पहुंच पाता है। यदि किसी एक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो छोटे दलों और अरब प्रतिनिधित्व वाली पार्टियों की भूमिका बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में अहमद तिबी जैसे नेताओं के बयान चुनाव के बाद की राजनीतिक बातचीत का संकेत दे सकते हैं, लेकिन वे अपने आप में सरकार गठन का अंतिम निर्णय नहीं हैं।
आगे क्या होगा?
अब राजनीतिक दलों का ध्यान चुनाव प्रचार, सीटों के अनुमान और संभावित गठबंधन रणनीति पर है। चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कौन-से दल एक साथ सरकार बनाने की स्थिति में हैं।
अहमद तिबी के हालिया बयान ने इस बहस को जरूर तेज कर दिया है कि यदि वर्तमान सरकार विरोधी दल पर्याप्त सीटें हासिल करते हैं तो अरब पार्टियां किस प्रकार की भूमिका निभा सकती हैं। दूसरी तरफ आइज़ेनकोट की पार्टी ने संभावित सहयोग के लिए कुछ सार्वजनिक शर्तें सामने रखी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का अंतिम स्वरूप चुनाव परिणाम और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं पर निर्भर करेगा। इसलिए फिलहाल “आइज़ेनकोट सरकार और अरब पार्टियों के बीच अंतिम समझौता हो गया है” कहना उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर सही नहीं होगा। वर्तमान स्थिति को संभावित गठबंधन और राजनीतिक दावों के दौर के रूप में देखना अधिक सटीक है।
इजरायल की राजनीति में आने वाले सप्ताह इसलिए महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि चुनाव से पहले गठबंधन संबंधी बयान, सीटों के अनुमान और दलों की शर्तें लगातार बदल सकती हैं। 27 अक्टूबर के मतदान और उसके बाद शुरू होने वाली सरकार गठन की प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि तिबी के संकेत किस हद तक वास्तविक राजनीतिक सहयोग में बदलते हैं।