परमाणु ऊर्जा से लेकर सौर शक्ति तक भारत का स्वच्छ ऊर्जा अभियान, पीएम मोदी ने पर्यावरण और विकास के संतुलन पर दिया जोर

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नई दिल्ली, 19 सितंबर 2026। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन को भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित “द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स” अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने स्वच्छ और कम-कार्बन ऊर्जा स्रोतों के विस्तार पर जोर दिया। यह दो दिवसीय सम्मेलन राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की ओर से 19 और 20 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है, जिसमें भारत के अलावा 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधि और पर्यावरण विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं।

प्रधानमंत्री के संबोधन में सौर ऊर्जा के साथ-साथ पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा को भी भारत के ऊर्जा परिवर्तन का हिस्सा बताया गया। उन्होंने कहा कि देश की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा केवल सौर ऊर्जा तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक पिछले वर्षों में पवन ऊर्जा की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जलविद्युत क्षेत्र में भी विस्तार हुआ है। परमाणु ऊर्जा को उन्होंने भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाले महत्वपूर्ण विकल्पों में शामिल किया।

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परमाणु ऊर्जा पर सरकार का बड़ा लक्ष्य

भारत ने वर्ष 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। केंद्र सरकार के अनुसार यह लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा, कम-कार्बन बिजली उत्पादन और दीर्घकालिक विकास की जरूरतों से जुड़ा है। इसके लिए सरकार ने न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के तहत कई कदमों की घोषणा की है।

सरकारी जानकारी के अनुसार भारत में वर्तमान में 24 परमाणु रिएक्टर संचालित हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 8.78 गीगावाट है। इसके अलावा 7.5 गीगावाट क्षमता वाली नौ रिएक्टर इकाइयां निर्माणाधीन हैं। सरकार ने स्वदेशी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टरों (PHWR) के विस्तार तथा छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) से जुड़ी तकनीक और अनुसंधान पर भी काम आगे बढ़ाने की बात कही है।

परमाणु ऊर्जा के विस्तार को लेकर प्रधानमंत्री ने पर्यावरण संबंधी बहस का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक ओर पर्यावरण संरक्षण की बात होती है, वहीं दूसरी ओर कुछ परमाणु परियोजनाओं को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह टिप्पणी परमाणु ऊर्जा के पर्यावरणीय और विकास संबंधी पहलुओं को लेकर जारी बहस के संदर्भ में सामने आई।

परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी का रास्ता

केंद्र सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक भागीदारी के लिए SHANTI Act से संबंधित व्यवस्था भी लागू की है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना और परमाणु ऊर्जा से जुड़े अनुसंधान, तकनीक तथा निवेश को गति देना है। साथ ही छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों और नई परमाणु तकनीकों के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है।

हालांकि परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ सुरक्षा, परियोजना स्थल, स्थानीय आजीविका और पुनर्वास जैसे विषय भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। सरकारी दस्तावेजों में कुछ परियोजना स्थलों पर स्थानीय लोगों की ओर से सुरक्षा तथा पारंपरिक आजीविका को लेकर व्यक्त की गई चिंताओं का उल्लेख किया गया है। सरकार का कहना है कि परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और नियामकीय स्तर पर लगातार समीक्षा की जाती है।

सौर ऊर्जा में तेजी से बढ़ी क्षमता

प्रधानमंत्री ने भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार को भी प्रमुख उपलब्धि के रूप में सामने रखा। उनके अनुसार पिछले करीब 12 वर्षों में देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 2 गीगावाट से बढ़कर 160 गीगावाट से अधिक हो गई है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के दौरान भी सौर क्षमता में इसी तरह की वृद्धि का उल्लेख किया था।

सौर ऊर्जा के विस्तार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा घरों की छतों पर लगाए जा रहे सोलर सिस्टम हैं। पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के तहत अगस्त 2026 तक 50 लाख से अधिक घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जाने की जानकारी सामने आई है। योजना का उद्देश्य घरेलू स्तर पर सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाना और बिजली की जरूरतों में लोगों की भागीदारी बढ़ाना है।

प्रधानमंत्री ने किसानों के लिए सौर पंपों से जुड़ी पीएम-कुसुम योजना का भी उल्लेख किया। इससे कृषि क्षेत्र में सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। इसका उद्देश्य ऊर्जा लागत और पारंपरिक बिजली स्रोतों पर निर्भरता से जुड़े मुद्दों को कम करने के साथ कृषि क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना है।

पवन और जलविद्युत पर भी फोकस

भारत की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति में सौर ऊर्जा के अलावा पवन और जलविद्युत को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में देश की पवन ऊर्जा क्षमता तीन गुना हुई है। जलविद्युत क्षमता में भी वृद्धि दर्ज की गई है। इस तरह सरकार की ऊर्जा रणनीति में अलग-अलग स्रोतों को मिलाकर बिजली व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिखाई देता है।

नीति आयोग की हालिया सामग्री में भी बताया गया है कि भारत में सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार तेजी से हुआ है। हालांकि बड़े स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि और पानी जैसे संसाधनों की उपलब्धता तथा स्थानीय पारिस्थितिकी से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई गई है।

हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर जोर

प्रधानमंत्री ने स्वच्छ ऊर्जा की चर्चा को परिवहन क्षेत्र से भी जोड़ा। उन्होंने हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहनों और अन्य कम-प्रदूषण वाली तकनीकों को भविष्य की गतिशीलता से संबंधित विकल्पों के रूप में रेखांकित किया।

भारत में हाइड्रोजन आधारित परिवहन तकनीक पर काम चल रहा है। प्रधानमंत्री ने देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन के संचालन का भी उल्लेख किया। इसके साथ इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल को भी स्वच्छ परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में पेश किया गया।

कोयला गैसीकरण जैसी तकनीक पर भी ध्यान

भारत की ऊर्जा व्यवस्था में पारंपरिक ईंधनों की भूमिका को देखते हुए सरकार केवल नवीकरणीय स्रोतों पर निर्भर रणनीति के बजाय कई तकनीकी रास्तों पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने कोयला गैसीकरण जैसी तकनीकों का भी उल्लेख किया, जिनका उद्देश्य मौजूदा ऊर्जा संसाधनों के अधिक स्वच्छ उपयोग से जुड़ा है।

इससे स्पष्ट है कि भारत की ऊर्जा नीति में एक साथ कई क्षेत्रों को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है—सौर, पवन, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इसके प्रमुख हिस्से हैं।

पर्यावरणीय शासन पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा

जिस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने संबोधन किया, उसका उद्देश्य केवल ऊर्जा नीति पर चर्चा करना नहीं है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी नीतियों, उनके क्रियान्वयन और पर्यावरणीय कानूनों के प्रभावी पालन पर भी विचार-विमर्श हो रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार सम्मेलन में न्यायिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक जानकारी, पर्यावरणीय शासन और अलग-अलग देशों के संस्थागत अनुभवों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर को कम करने तथा पर्यावरणीय शासन को मजबूत करने के उपायों पर भी चर्चा होनी है।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती

भारत के सामने एक ओर बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े लक्ष्यों को ध्यान में रखना भी जरूरी है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को साथ लेकर चलने की बात कही।

आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा क्षेत्र में सौर और पवन परियोजनाओं के साथ परमाणु ऊर्जा, भंडारण तकनीक, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक परिवहन का विस्तार देखने को मिल सकता है। इन क्षेत्रों के विकास के साथ भूमि उपयोग, जल संसाधन, जैव विविधता, परियोजना सुरक्षा और स्थानीय समुदायों से जुड़े मुद्दे भी नीति निर्माण में महत्वपूर्ण रहेंगे।

कुल मिलाकर, 19 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री का संबोधन भारत की बहु-आयामी ऊर्जा रणनीति पर केंद्रित रहा। 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य, 160 गीगावाट से अधिक सौर क्षमता, पवन और जलविद्युत का विस्तार तथा हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे विकल्प भारत के ऊर्जा परिवर्तन के प्रमुख हिस्से के रूप में सामने आए हैं। इन पहलों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के साथ पर्यावरणीय संरक्षण, सुरक्षा मानकों और स्थानीय हितों का संतुलन किस तरह कायम किया जाता है।

स्रोत: प्रधानमंत्री कार्यालय, प्रेस सूचना ब्यूरो और 19 सितंबर 2026 की प्रकाशित रिपोर्टें।

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