चेन्नई में 17वें कथकली महोत्सव का भव्य शुभारंभ, ‘कथा रस संगम’ बनी तीन दिवसीय आयोजन की थीम

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चेन्नई। भारतीय शास्त्रीय और पारंपरिक कला की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से चेन्नई में 17वें कथकली महोत्सव का शुभारंभ हो गया है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में कलाक्षेत्र फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस तीन दिवसीय महोत्सव की शुरुआत तिरुवन्मियूर स्थित भरत कलाक्षेत्र ऑडिटोरियम में हुई। महोत्सव में कथकली की विविध शैलियों, अभिनय परंपराओं और कथा प्रस्तुति की विशिष्टता को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।

इस वर्ष महोत्सव की थीम “कथा रस संगम – Confluence of the Essence of Stories” रखी गई है। नाम से ही स्पष्ट है कि आयोजन का केंद्र भारतीय कथाओं में निहित भाव, रस और नाटकीय अभिव्यक्ति का संगम है। 18 से 20 सितंबर 2026 तक चलने वाले इस आयोजन में कथकली की दुनिया की तीन प्रमुख संस्थाएं अपनी विशिष्ट प्रस्तुतियां लेकर दर्शकों के बीच पहुंच रही हैं।

तीन प्रमुख संस्थाओं का संगम

17वें कथकली महोत्सव की खासियत यह है कि इसमें कथकली परंपरा से जुड़ी तीन प्रतिष्ठित संस्थाएं भाग ले रही हैं। इनमें सदानम अकादमी, केरल कलामंडलम और मार्गी थिएटर शामिल हैं। तीनों संस्थानों की अपनी अलग प्रशिक्षण परंपरा, प्रस्तुति शैली और कलात्मक पहचान है।

महोत्सव के दौरान इन संस्थाओं द्वारा तीन अलग-अलग प्रस्तुतियां पेश की जा रही हैं। इस तरह दर्शकों को एक ही मंच पर कथकली की विविध अभिव्यक्तियों को देखने का अवसर मिल रहा है। आयोजन का उद्देश्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और कथकली जैसी शास्त्रीय कला के संरक्षण एवं प्रसार को भी प्रोत्साहित करना है।

‘कथा रस संगम’ में कहानी और भाव की प्रधानता

कथकली को केवल नृत्य या नाटक के रूप में नहीं देखा जाता। इसमें अभिनय, संगीत, नृत्य, मुद्राओं, चेहरे के भाव और रंग-रूप के माध्यम से कथा को जीवंत किया जाता है। कलाकार बिना सामान्य संवाद पर निर्भर हुए अपने शारीरिक हावभाव और चेहरे के भावों के जरिए कहानी को दर्शकों तक पहुंचाते हैं।

इसी विशेषता को इस वर्ष की थीम ‘कथा रस संगम’ में प्रमुखता दी गई है। कथाओं में मौजूद विभिन्न भावों और रसों को मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। महोत्सव कथकली की उस परंपरा को रेखांकित करता है जिसमें कहानी केवल शब्दों से नहीं, बल्कि शरीर की गति, आंखों के भाव, हाथों की मुद्राओं और संगीत के तालमेल से आगे बढ़ती है।

केरल की सांस्कृतिक विरासत को चेन्नई के मंच पर स्थान

कथकली का विकास केरल की सांस्कृतिक भूमि में हुआ और समय के साथ यह भारत की प्रमुख पारंपरिक नाट्य कलाओं में अपनी अलग पहचान बना चुका है। इसके विस्तृत मेकअप, रंगीन वेशभूषा, विशिष्ट मुकुट और प्रभावशाली अभिनय शैली के कारण कथकली देश-विदेश के दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।

चेन्नई में आयोजित यह महोत्सव दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद का भी अवसर प्रदान करता है। तमिलनाडु की सांस्कृतिक राजधानी माने जाने वाले चेन्नई में केरल की इस महत्वपूर्ण कला परंपरा की प्रस्तुति दर्शकों को विभिन्न दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक धाराओं से परिचित कराने में योगदान देती है।

नई पीढ़ी को पारंपरिक कला से जोड़ने की कोशिश

आज के दौर में डिजिटल मनोरंजन और आधुनिक मंचीय प्रस्तुतियों के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक कलाओं के संरक्षण की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है। ऐसे में कथकली महोत्सव जैसे आयोजन युवा दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय एवं पारंपरिक कला रूपों से परिचित कराने का माध्यम बन सकते हैं।

कथकली की प्रस्तुति में कलाकारों को लंबे समय तक प्रशिक्षण लेना पड़ता है। अभिनय की बारीकियों के साथ-साथ मुद्राओं, ताल, संगीत, चेहरे के भाव और पारंपरिक वेशभूषा की समझ भी आवश्यक होती है। इसलिए ऐसे महोत्सव कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने के साथ-साथ इस कला की प्रशिक्षण परंपरा को आगे बढ़ाने में भी भूमिका निभाते हैं।

तीन दिन तक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला

17वां कथकली महोत्सव 18 से 20 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। तीन दिनों के दौरान तीन प्रमुख संस्थाओं की प्रस्तुतियां महोत्सव का मुख्य आकर्षण हैं। अलग-अलग संस्थानों द्वारा पेश की जाने वाली प्रस्तुतियों से दर्शकों को कथकली के विभिन्न कलात्मक पक्षों को समझने और अनुभव करने का अवसर मिल रहा है।

महोत्सव में मंच, संगीत, अभिनय और पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र का ऐसा मेल देखने को मिलता है जो कथकली को अन्य नाट्य शैलियों से अलग पहचान देता है। कलाकारों की तैयारी और मंच पर उनकी प्रस्तुति इस कला की जटिलता और अनुशासन को सामने लाती है।

कलाक्षेत्र फाउंडेशन की भूमिका

इस आयोजन का संचालन कलाक्षेत्र फाउंडेशन द्वारा किया जा रहा है। भारतीय कला और संस्कृति के संरक्षण, प्रशिक्षण तथा प्रस्तुति के क्षेत्र में कलाक्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संस्था द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न भारतीय कला परंपराओं को मंच मिलता रहा है।

कथकली महोत्सव इसी व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। एक ही आयोजन में अलग-अलग कथकली संस्थानों को शामिल करके कलाकारों और दर्शकों के बीच संवाद का अवसर तैयार किया गया है।

परंपरा और आधुनिक दर्शक के बीच सेतु

कथकली जैसी कला परंपराओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ऐतिहासिक निरंतरता है। कई पीढ़ियों से कलाकार इस कला को सीखते और आगे बढ़ाते आए हैं। हालांकि बदलते समय के साथ दर्शकों की रुचियां और प्रस्तुति के तरीके भी बदल रहे हैं। ऐसे में पारंपरिक कला को उसके मूल स्वरूप और अनुशासन के साथ आधुनिक दर्शकों तक पहुंचाना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्य है।

‘कथा रस संगम’ इसी दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। यह महोत्सव कथाओं के माध्यम से भारतीय रंगमंच की उस परंपरा को सामने लाता है जिसमें भाव और अभिनय कहानी के केंद्र में रहते हैं।

भारतीय सांस्कृतिक विविधता की झलक

भारत की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविध कला परंपराओं से बनती है। कथकली इस विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। चेन्नई में आयोजित 17वां कथकली महोत्सव यह दिखाता है कि अलग-अलग क्षेत्रों की कलाएं एक-दूसरे के साथ मंच साझा करके भारतीय सांस्कृतिक विरासत को और व्यापक बना सकती हैं।

सदानम अकादमी, केरल कलामंडलम और मार्गी थिएटर की भागीदारी इस आयोजन को विशेष बनाती है। तीनों संस्थानों की प्रस्तुतियों के जरिए दर्शकों को कथकली के अलग-अलग रंग और कथा-अभिव्यक्ति के आयाम देखने को मिल रहे हैं।

निष्कर्ष

चेन्नई में शुरू हुआ 17वां कथकली महोत्सव भारतीय पारंपरिक रंगमंच और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित महत्वपूर्ण आयोजन है। ‘कथा रस संगम – Confluence of the Essence of Stories’ की थीम के साथ आयोजित यह महोत्सव कथा, अभिनय, संगीत और भावों के माध्यम से कथकली की विशिष्ट दुनिया को दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर रहा है।

18 से 20 सितंबर तक चलने वाले इस आयोजन में सदानम अकादमी, केरल कलामंडलम और मार्गी थिएटर की प्रस्तुतियां कथकली की विविधता को सामने ला रही हैं। संस्कृति मंत्रालय के सहयोग और कलाक्षेत्र फाउंडेशन के आयोजन से यह महोत्सव पारंपरिक भारतीय कला को मंच देने, कलाकारों को प्रोत्साहित करने और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल के रूप में सामने आया है।

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