उदयपुर के आदिवासी इलाकों में सरकारी स्कूलों की बदहाली पर सवाल, CJP के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने उठाई आवाज

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उदयपुर, राजस्थान: राजस्थान के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता और सह-संयोजक आशुतोष रांका ने उदयपुर क्षेत्र के स्कूलों का निरीक्षण करने के बाद शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं पर गंभीर चिंता जताई है। उनके मुताबिक कई ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्कूल भवन, कक्षाओं, स्वच्छता, शिक्षकों तथा मध्याह्न भोजन जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में कमियां दिखाई दीं।

School AI Generated syemboli photo

रांका के नेतृत्व में CJP की टीम सरकारी विद्यालयों की जमीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए अलग-अलग इलाकों में पहुंच रही है। इस पहल को पार्टी ने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का नाम दिया है। अभियान का उद्देश्य केवल स्कूलों की समस्याओं को सामने लाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के माध्यम से प्रशासन और सरकार के सामने जवाबदेही का मुद्दा उठाना भी बताया गया है। अगस्त में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार यह अभियान कई राज्यों के सरकारी स्कूलों तक पहुंचा है और इसमें स्कूलों की स्थिति का दस्तावेजीकरण करने पर जोर दिया गया है।

आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों पर विशेष ध्यान

आशुतोष रांका का कहना है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूल बड़ी संख्या में बच्चों के लिए शिक्षा का प्रमुख माध्यम हैं। ऐसे में यदि स्कूल भवन सुरक्षित नहीं हैं, पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं या विद्यार्थियों को आवश्यक सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ सकता है।

20 सितंबर 2026 को खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के आदिवासी गांवों में CJP टीम के दौरे की रिपोर्ट भी सामने आई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार टीम ने कुछ विद्यालयों में जर्जर भवन, सीमित कक्षाओं और शिक्षकों की कमी जैसी समस्याओं का मुद्दा उठाया। एक स्कूल के बारे में रांका ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि वहां लगभग 70 बच्चों के लिए केवल एक शिक्षक उपलब्ध था। इन दावों की स्वतंत्र सरकारी ऑडिट रिपोर्ट से पुष्टि अलग से आवश्यक है।

रांका ने स्कूलों की स्थिति को केवल स्थानीय समस्या के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा के व्यापक ढांचे से जोड़कर देखा है। उनका कहना है कि जब किसी बच्चे के पास बेहतर शिक्षा के सीमित विकल्प हों, तब सरकारी विद्यालय की गुणवत्ता उसके भविष्य के अवसरों से सीधे जुड़ जाती है।

जर्जर भवन और बुनियादी सुविधाओं की कमी

स्कूल निरीक्षण के दौरान सामने आई समस्याओं में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भवनों की स्थिति बताया गया। कई ग्रामीण स्कूलों में पुराने भवन, खराब कमरों और आवश्यक मरम्मत की जरूरत का मुद्दा उठाया गया है।

राजस्थान के जयपुर जिले के एक अन्य स्कूल के निरीक्षण को लेकर अगस्त में CJP और स्थानीय लोगों के बीच विवाद की खबर भी सामने आई थी। उस मामले में CJP ने आरोप लगाया था कि टीम को स्कूल तक पहुंचने से रोका गया। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक रांका ने जिस विद्यालय का निरीक्षण करना चाहा था, उसके मुख्य भवन को असुरक्षित बताते हुए दावा किया था कि विद्यार्थियों को दूसरे स्थान पर पढ़ाया जा रहा था। इस मामले में अलग-अलग पक्षों के दावे सामने आए थे।

इन घटनाओं ने सरकारी स्कूलों की इमारतों की सुरक्षा और रखरखाव को लेकर चर्चा तेज कर दी है। हालांकि किसी भी विशेष स्कूल की वास्तविक स्थिति निर्धारित करने के लिए प्रशासनिक रिकॉर्ड, तकनीकी निरीक्षण और स्थानीय शिक्षा विभाग की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।

मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता भी चर्चा में

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन योजना भी शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है। CJP की टीम ने अपने दौरे के दौरान भोजन की गुणवत्ता और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए हैं।

मध्याह्न भोजन केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने की योजना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति और पोषण संबंधी जरूरतों को भी समर्थन देना है। इसलिए भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और नियमितता जैसे विषयों पर निगरानी आवश्यक मानी जाती है।

रांका ने वीडियो में जिन समस्याओं का उल्लेख किया, उनमें भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतें भी शामिल हैं। इन आरोपों की वास्तविक स्थिति का आकलन स्थानीय स्तर पर भोजन के नमूनों की जांच, निरीक्षण रिपोर्ट और संबंधित विभाग के रिकॉर्ड के आधार पर किया जा सकता है।

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का उद्देश्य

CJP ने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के जरिए सरकारी विद्यालयों की जमीनी स्थिति को सार्वजनिक बहस का विषय बनाने की कोशिश की है। संगठन के अनुसार अभियान के दौरान कार्यकर्ता स्कूलों का दौरा करते हैं, वहां की समस्याओं को दर्ज करते हैं और संबंधित अधिकारियों के सामने उन्हें उठाते हैं।

आशुतोष रांका ने पहले बताया था कि अभियान के तहत बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों का ऑडिट किया गया। सितंबर में प्रकाशित एक इंटरव्यू के अनुसार उन्होंने पहले बताए गए आंकड़े को संशोधित करते हुए लगभग 15,000 स्कूलों का आंकड़ा दिया था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि उनके दौरे में करीब 80 से 90 प्रतिशत स्कूल खराब स्थिति में मिले। यह प्रतिशत CJP का आकलन है; उपलब्ध रिपोर्ट में इसके लिए स्वतंत्र, स्कूल-वार ऑडिट डेटा प्रकाशित नहीं किया गया है।

इस अभियान का एक दूसरा पहलू नागरिक भागीदारी से जुड़ा है। CJP का कहना है कि गांव और स्थानीय समुदाय के लोग अपने स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठाएं तथा संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगें। इस दृष्टिकोण में स्कूल को केवल सरकारी विभाग की जिम्मेदारी न मानकर समुदाय से जुड़ी सार्वजनिक संस्था के रूप में देखने पर जोर दिया जा रहा है।

सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल

रांका ने अलग-अलग राज्यों में अभियान के दौरान प्रशासन की प्रतिक्रिया में अंतर का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार कुछ स्थानों पर टीम को विरोध या प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जबकि अन्य जगहों पर अधिकारियों ने शिकायतों और सुझावों को सुना।

राजस्थान में CJP की टीम के स्कूल निरीक्षण को लेकर पहले विवाद भी सामने आ चुके हैं। अगस्त 2026 में जयपुर के पास एक स्कूल दौरे के दौरान CJP ने अपनी टीम पर हमले का आरोप लगाया था। उस घटना को लेकर अलग-अलग पक्षों के बयान सामने आए थे, इसलिए इसे किसी एक पक्ष के दावे के आधार पर अंतिम रूप से देखना उचित नहीं होगा।

हालिया रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राजस्थान सरकार ने 472 स्कूलों के नवीनीकरण के लिए 4,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की घोषणा की। CJP की ओर से इस समय को लेकर सवाल उठाए गए, जबकि सरकारी स्तर पर स्कूलों के सुधार को अलग प्रशासनिक निर्णय के रूप में देखा जा सकता है।

शिक्षा के साथ रोजगार और परीक्षा व्यवस्था भी एजेंडे में

आशुतोष रांका ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को शिक्षा से जुड़े बड़े सवालों का हिस्सा बताया है। उनके अनुसार शिक्षा के साथ-साथ रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे विषय भी सार्वजनिक चर्चा में प्रमुख होने चाहिए।

सितंबर में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि CJP शिक्षा के मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए आगे चलकर बेरोजगारी और संस्थागत जवाबदेही जैसे विषयों पर भी ध्यान देना चाहता है।

स्थानीय चुनावों को लेकर भी रांका ने स्वतंत्र उम्मीदवारों की सफलता का उल्लेख करते हुए इसे पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए जनता की ओर से संदेश के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि किसी चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवारों की संख्या या सफलता को लेकर व्यापक निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों की आवश्यकता होगी।

आदिवासी बच्चों की शिक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता का सवाल सामाजिक और आर्थिक अवसरों से जुड़ा हुआ है। यदि स्कूल तक पहुंच है लेकिन भवन सुरक्षित नहीं, शिक्षक पर्याप्त नहीं या अन्य बुनियादी सुविधाएं कमजोर हैं, तो केवल स्कूल का अस्तित्व बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी नहीं देता।

इसी कारण स्कूलों की नियमित मरम्मत, पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बिजली, सुरक्षित कक्षाएं और पौष्टिक भोजन जैसी सुविधाएं शिक्षा व्यवस्था के आवश्यक हिस्से मानी जाती हैं।

CJP के अभियान ने इन मुद्दों को सार्वजनिक चर्चा में लाने की कोशिश की है। दूसरी ओर, किसी अभियान में लगाए गए आरोपों को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय सरकारी निरीक्षण, स्कूल रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के जरिए उनकी पुष्टि करना भी जरूरी है।

आगे क्या?

उदयपुर और राजस्थान के अन्य आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति पर उठी बहस आने वाले समय में प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण होगी। यदि किसी विद्यालय में भवन वास्तव में असुरक्षित है या शिक्षकों तथा अन्य सुविधाओं की कमी है, तो उसका समाधान संबंधित विभाग की जिम्मेदारी होगी।

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने यह सवाल जरूर सामने रखा है कि सरकारी स्कूलों की निगरानी केवल कागजी रिपोर्टों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी है। आशुतोष रांका और CJP का कहना है कि नागरिकों को अपने आसपास के स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठाना चाहिए।

फिलहाल उदयपुर के आदिवासी क्षेत्रों में सामने आई शिकायतों का अगला चरण सरकारी प्रतिक्रिया, आधिकारिक निरीक्षण और सुधारात्मक कार्रवाई पर निर्भर करेगा। यदि समस्याओं की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होती है, तो सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक, बेहतर भोजन और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना विद्यार्थियों के हित में महत्वपूर्ण कदम होगा।

सरकारी स्कूल किसी भी क्षेत्र में केवल पढ़ाई का स्थान नहीं होते। वे ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के बच्चों के लिए आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसलिए स्कूलों की वास्तविक स्थिति पर तथ्य आधारित निगरानी और समयबद्ध सुधार की जरूरत पर उठी यह बहस शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही के व्यापक प्रश्न से जुड़ती है।

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