राजापुर का तुलसीदास उपवन पार्क बदहाल, निर्माण के एक साल में ही दीवारों में टूट-फूट से उठे सवाल
लवलेश कुमार श्रीवास्तव
हिट एंड हॉट न्यूज़ संवाददाता चित्रकूट
राजापुर/चित्रकूट। चित्रकूट जनपद के राजापुर में संत कवि गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि से जुड़ा तुलसीदास उपवन पार्क इन दिनों अपनी बदहाल स्थिति को लेकर चर्चा में है। करीब तीन करोड़ रुपये की लागत से विकसित किए गए इस पार्क के निर्माण को अभी अधिक समय भी नहीं बीता है, लेकिन इसके कई हिस्सों में टूट-फूट दिखाई देने लगी है। पार्क की दीवारों के क्षतिग्रस्त होने और निर्माण सामग्री के बिखरे पड़े होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिस उद्देश्य से इस पार्क को विकसित किया गया था, उसके अनुरूप इसका रखरखाव और निर्माण गुणवत्ता दिखाई नहीं दे रही है। लोगों के मुताबिक पार्क के कुछ हिस्सों में दीवारें कमजोर होकर टूट गई हैं। प्रतिमा के आसपास बनाए गए संरचनात्मक हिस्सों में भी क्षति की शिकायत सामने आ रही है। इससे पार्क की सुंदरता प्रभावित होने के साथ-साथ इसकी निर्माण गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
करोड़ों की लागत से विकसित हुआ था पार्क
राजापुर को गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि के रूप में विशेष धार्मिक और साहित्यिक पहचान प्राप्त है। ऐसे में यहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को सामने लाने के उद्देश्य से विभिन्न विकास कार्य किए जाते रहे हैं। इसी क्रम में तुलसीदास उपवन पार्क का निर्माण भी कराया गया।
बताया जा रहा है कि पार्क के विकास पर लगभग तीन करोड़ रुपये की राशि खर्च की गई। इतने बड़े बजट से तैयार किए गए परिसर से स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि यह राजापुर की पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा। लेकिन निर्माण के कुछ समय बाद ही इसके विभिन्न हिस्सों में खराबी सामने आने से परियोजना की गुणवत्ता पर चर्चा शुरू हो गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सार्वजनिक धन से तैयार होने वाली ऐसी परियोजनाओं में निर्माण की गुणवत्ता और लंबे समय तक टिकाऊपन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यदि किसी निर्माण में थोड़े समय के भीतर ही टूट-फूट शुरू हो जाए तो उसकी तकनीकी गुणवत्ता की जांच किया जाना जरूरी हो जाता है।
एक साल में दीवारों की हालत खराब
स्थानीय नागरिकों के अनुसार पार्क के निर्माण के करीब एक वर्ष के भीतर ही कुछ दीवारों में टूट-फूट दिखाई देने लगी। कई स्थानों पर निर्माण सामग्री बिखरी नजर आती है। कुछ हिस्सों की स्थिति ऐसी बताई जा रही है कि वहां आने-जाने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता पैदा हो सकती है।
पार्क परिसर में बनी संरचनाओं की हालत को लेकर लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इनकी मरम्मत नहीं कराई गई तो नुकसान और बढ़ सकता है। उनका यह भी कहना है कि केवल ऊपर से मरम्मत कराने के बजाय निर्माण की वास्तविक समस्या का पता लगाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में दोबारा वही स्थिति उत्पन्न न हो।
निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल
पार्क की दीवारों और अन्य निर्माण कार्यों में आई खराबी को लेकर स्थानीय स्तर पर निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि निर्माण के दौरान मानकों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया होगा। हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी निर्माण कार्यों के लिए निर्धारित तकनीकी मानकों और स्वीकृत निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि जांच में मानकों के विपरीत सामग्री के इस्तेमाल या निर्माण प्रक्रिया में अनियमितता की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
वहीं, निर्माण कार्य से जुड़े ठेकेदार या संबंधित विभाग की ओर से इस मामले में आधिकारिक रूप से क्या स्थिति बताई जाती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। किसी भी पक्ष पर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
प्रतिमा परिसर भी प्रभावित
तुलसीदास उपवन पार्क की पहचान से जुड़े प्रमुख हिस्सों में प्रतिमा और उसके आसपास विकसित क्षेत्र भी शामिल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रतिमा के आसपास बनाई गई दीवारों के कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। धार्मिक और साहित्यिक महत्व वाले इस स्थान की ऐसी स्थिति देखकर नागरिकों में असंतोष है।
लोगों का कहना है कि राजापुर आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इस परिसर को देखने पहुंचते हैं। इसलिए पार्क की साफ-सफाई, सुरक्षा, सौंदर्य और संरचनाओं की मजबूती पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। खराब दीवारें और बिखरी निर्माण सामग्री पूरे परिसर की छवि को प्रभावित करती हैं।
जांच की मांग तेज
मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने संबंधित अधिकारियों से निर्माण कार्य की तकनीकी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि पार्क की मौजूदा स्थिति का निरीक्षण कर यह पता लगाया जाए कि आखिर निर्माण के इतने कम समय में दीवारों और अन्य हिस्सों में क्षति क्यों आई।
लोगों ने निर्माण की गुणवत्ता, इस्तेमाल की गई सामग्री, कार्य की निगरानी और निर्माण प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड की जांच किए जाने की मांग की है। इसके अलावा यह भी पता लगाने की मांग की गई है कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर की गई थी।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या नियमों की अनदेखी सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
मरम्मत के साथ गुणवत्ता की भी हो जांच
क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत कराना फिलहाल सबसे जरूरी कदमों में से एक माना जा रहा है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल टूटे हिस्सों को दोबारा बना देना पर्याप्त नहीं होगा। पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि मौजूदा निर्माण क्यों खराब हुआ।
यदि मूल समस्या का समाधान किए बिना मरम्मत कर दी जाती है तो भविष्य में फिर से टूट-फूट होने की आशंका बनी रह सकती है। इसलिए विशेषज्ञों की निगरानी में तकनीकी परीक्षण कराकर आवश्यक सुधार कराने की मांग की जा रही है।
लोग चाहते हैं कि मरम्मत में भी वही स्थिति न दोहराई जाए और सरकारी धन का उपयोग निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार हो।
पर्यटन की संभावनाओं से जुड़ा है क्षेत्र
राजापुर का संबंध गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली से होने के कारण इसका धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु और साहित्य प्रेमी पहुंचते हैं। ऐसे में क्षेत्र में विकसित होने वाली पर्यटन सुविधाओं का मजबूत और आकर्षक होना स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
तुलसीदास उपवन जैसे स्थान यदि अच्छी तरह विकसित और व्यवस्थित रहें तो वे पर्यटकों के लिए उपयोगी पड़ाव बन सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और छोटे कारोबार को भी लाभ मिल सकता है। इसके विपरीत, निर्माण के कुछ समय बाद ही सार्वजनिक सुविधाओं का खराब होना विकास योजनाओं की उपयोगिता पर प्रश्न खड़े कर सकता है।
अधिकारियों की कार्रवाई पर नजर
अब स्थानीय लोगों की निगाहें संबंधित विभाग और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि अधिकारियों की ओर से स्थल का निरीक्षण कराया जाता है और तकनीकी जांच के आधार पर कमियां सामने आती हैं तो उसके बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
लोगों की मुख्य मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, निर्माण की गुणवत्ता का परीक्षण कराया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही पार्क के क्षतिग्रस्त हिस्सों को टिकाऊ तरीके से ठीक कराकर परिसर को दोबारा व्यवस्थित किया जाए।
करीब तीन करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस पार्क की मौजूदा स्थिति ने सरकारी निर्माण परियोजनाओं की निगरानी और रखरखाव को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा किया है। अब यह देखना अहम होगा कि संबंधित विभाग शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या तकनीकी जांच के बाद पार्क की समस्याओं का स्थायी समाधान कराया जाता है।