हैदराबाद में बुजुर्ग दंपती के साथ 1.50 करोड़ रुपये की डिजिटल अरेस्ट ठगी, जीवनभर की जमा पूंजी गंवाई
हैदराबाद, 31 अक्टूबर 2026।
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से साइबर अपराध का एक बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है। यहां साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर एक बुजुर्ग दंपती को अपना निशाना बनाया और उनकी जीवनभर की जमा पूंजी में से 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की रकम कथित तौर पर ठग ली। पीड़ितों में 80 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी और उनकी पत्नी शामिल हैं। यह घटना हैदराबाद के बोवेनपल्ली इलाके की बताई जा रही है।

इस घटना ने एक बार फिर देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट के मामलों और साइबर अपराधियों के नए तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन बैंकिंग व्यवस्था और वित्तीय लेन-देन को समझने में बिताया, वह भी साइबर अपराधियों की सुनियोजित साजिश का शिकार बन गया। ठगी की सबसे दुखद बात यह है कि आरोपियों ने दंपती की उम्र, मानसिक स्थिति और कानून के प्रति उनके सम्मान का फायदा उठाकर उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्गों को बनाया निशाना
प्राप्त जानकारी के अनुसार, साइबर अपराधियों ने बुजुर्ग दंपती से संपर्क करके उन्हें कथित कानूनी कार्रवाई का भय दिखाया। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगों ने ऐसा माहौल तैयार किया, जिससे पीड़ितों को लगा कि वे किसी गंभीर कानूनी परेशानी में फंस गए हैं।
डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का एक ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी स्वयं को पुलिस अधिकारी, जांच एजेंसी का कर्मचारी या सरकारी विभाग का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं। वे फोन कॉल, वीडियो कॉल और फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक जांच चल रही है।
इसके बाद पीड़ितों पर लगातार निगरानी, पूछताछ और गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई का डर बनाया जाता है। कई मामलों में अपराधी लोगों को किसी से बातचीत नहीं करने देते और उन्हें मानसिक दबाव में रखकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।
हैदराबाद के बुजुर्ग दंपती के साथ भी इसी प्रकार की साइबर ठगी होने की जानकारी सामने आई है।
1.50 करोड़ रुपये से अधिक की रकम गंवाई
इस मामले में सबसे बड़ा नुकसान आर्थिक है। रिपोर्ट के मुताबिक, दंपती को 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की चपत लगी है। यह रकम उनकी जीवनभर की बचत बताई जा रही है।
एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी के लिए यह राशि केवल बैंक खाते में जमा धन नहीं होती, बल्कि वर्षों की मेहनत, नौकरी के दौरान की गई बचत और बुढ़ापे की आर्थिक सुरक्षा का आधार होती है। सेवानिवृत्ति के बाद आमतौर पर लोग अपनी जमा पूंजी का इस्तेमाल स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों, घरेलू खर्च और भविष्य की आर्थिक स्थिरता के लिए करते हैं।
ऐसे में इतनी बड़ी रकम का साइबर ठगी में चले जाना किसी भी परिवार के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
हालांकि, इस मामले में रकम किन-किन बैंक खातों में भेजी गई, कितने लेन-देन हुए और पुलिस ने अब तक कितनी धनराशि को रोकने में सफलता हासिल की है, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
क्या होती है डिजिटल अरेस्ट की ठगी?
डिजिटल अरेस्ट वास्तव में कोई वैध कानूनी गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। भारत में पुलिस या कोई अन्य जांच एजेंसी केवल वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को गिरफ्तार या घर में डिजिटल तरीके से कैद नहीं कर सकती।
साइबर अपराधी इस शब्द का इस्तेमाल लोगों को भ्रमित करने और उन पर दबाव बनाने के लिए करते हैं। वे फर्जी पहचान, सरकारी विभागों के नाम और मनगढ़ंत आरोपों का सहारा लेते हैं।
इस तरह की ठगी में अपराधी अक्सर लोगों को बताते हैं कि उनके नाम से कोई संदिग्ध बैंक खाता खुला है, उनके दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल हुआ है या वे किसी वित्तीय अपराध की जांच में शामिल हैं।
इसके बाद कथित जांच पूरी होने तक पैसे की जांच या सत्यापन के नाम पर रकम ट्रांसफर करने के लिए कहा जाता है। कई बार इसे सुरक्षा जमा या रकम के सत्यापन की प्रक्रिया बताया जाता है।
लोग जब डर और भ्रम में आकर उनकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, तो ठग आर्थिक नुकसान पहुंचा देते हैं।
बुजुर्ग और सेवानिवृत्त लोग क्यों बन रहे हैं निशाना?
साइबर अपराधियों के निशाने पर बुजुर्ग और सेवानिवृत्त लोग तेजी से आ रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कई वरिष्ठ नागरिकों के पास वर्षों की मेहनत से जुटाई गई बचत होती है।
इसके अलावा, सरकारी अधिकारियों और कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति सम्मान के कारण कुछ लोग किसी व्यक्ति के पुलिस अधिकारी होने का दावा करने पर तुरंत सवाल नहीं उठा पाते।
अपराधी इसी भरोसे का गलत फायदा उठाते हैं। वे फोन पर गंभीर आवाज में बात करते हैं, फर्जी पहचान पत्र दिखाते हैं और कभी-कभी वीडियो कॉल के जरिए पुलिस कार्यालय जैसा दृश्य तैयार करते हैं।
इससे सामने बैठे व्यक्ति को लगता है कि वास्तव में कोई सरकारी जांच चल रही है।
हैदराबाद की घटना इस बात का उदाहरण है कि साइबर अपराधियों की साजिश से बचने के लिए केवल तकनीकी जानकारी पर्याप्त नहीं है। लोगों को यह समझना भी जरूरी है कि कानून के नाम पर फोन पर पैसे मांगने वाला व्यक्ति धोखेबाज हो सकता है।
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में सतर्कता जरूरी
देश के अलग-अलग हिस्सों से डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी की घटनाएं सामने आती रही हैं। इन मामलों में अपराधी लोगों को इतना मानसिक दबाव देते हैं कि वे अपने परिवार के सदस्यों से भी घटना की जानकारी साझा नहीं कर पाते।
कई बार पीड़ितों को यह कहकर चुप रहने के लिए कहा जाता है कि जांच की गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है। यही चुप्पी ठगों के लिए फायदेमंद साबित होती है।
इसलिए जरूरी है कि किसी भी अनजान व्यक्ति के फोन पर बताए गए आरोपों को सच न माना जाए। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को पुलिस अधिकारी, सीबीआई, ईडी या अन्य जांच एजेंसी का कर्मचारी बताकर डराता है, तो उसकी पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए।
किसी भी परिस्थिति में बैंक खाते की जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड या गोपनीय वित्तीय विवरण साझा नहीं करना चाहिए। इसी तरह किसी कथित जांच के नाम पर किसी अनजान खाते में पैसे भेजने से बचना चाहिए।
ठगी होने पर तुरंत क्या करें?
यदि कोई व्यक्ति डिजिटल अरेस्ट या किसी अन्य साइबर ठगी का शिकार हो जाता है, तो उसे बिना देरी किए कार्रवाई करनी चाहिए।
सबसे पहले संबंधित बैंक को सूचना देकर संदिग्ध लेन-देन की जानकारी देनी चाहिए। इसके बाद राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करना चाहिए और आधिकारिक वेबसाइट cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए।
शिकायत करते समय बैंक लेन-देन का विवरण, संदिग्ध मोबाइल नंबर, कॉल रिकॉर्ड, संदेश और उपलब्ध अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखना उपयोगी होता है।
जल्दी शिकायत करने से संबंधित एजेंसियों को संदिग्ध लेन-देन पर रोक लगाने या धनराशि का पता लगाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, रकम वापस मिलने की कोई गारंटी नहीं होती।
परिवार के सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
बुजुर्गों को साइबर ठगी से बचाने में परिवार के सदस्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चों और अन्य परिजनों को समय-समय पर वरिष्ठ नागरिकों को डिजिटल अपराधों के नए तरीकों के बारे में जानकारी देनी चाहिए।
उन्हें स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि कोई भी वास्तविक सरकारी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे जमा करने का आदेश नहीं देती।
यदि किसी बुजुर्ग को ऐसा फोन आता है, तो उन्हें घबराने के बजाय अपने परिवार के विश्वसनीय सदस्य से बात करनी चाहिए। किसी भी संदिग्ध कॉल पर तुरंत पैसे भेजने का फैसला नहीं करना चाहिए।
साइबर सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता
हैदराबाद के बोवेनपल्ली में सामने आया यह मामला केवल एक परिवार की आर्थिक क्षति तक सीमित नहीं है। यह देश में बढ़ती डिजिटल ठगी और लोगों के बीच साइबर सुरक्षा जागरूकता की आवश्यकता को भी उजागर करता है।
विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा के लिए बैंकों, पुलिस विभागों और संबंधित एजेंसियों को जागरूकता अभियान मजबूत करने की जरूरत है।
डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन सेवाओं ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, लेकिन इनके साथ साइबर अपराध के खतरे भी बढ़े हैं। इसलिए तकनीक का इस्तेमाल करते समय सावधानी और सतर्कता बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष
हैदराबाद में 80 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी और उनकी पत्नी के साथ 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की कथित डिजिटल अरेस्ट ठगी ने समाज को सतर्क रहने का संदेश दिया है। यह घटना बताती है कि साइबर अपराधी किसी भी उम्र और पेशे के व्यक्ति को अपना निशाना बना सकते हैं।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर मिलने वाली धमकियों से डरने के बजाय उनकी सत्यता की जांच करना जरूरी है। लोगों को याद रखना चाहिए कि फोन या वीडियो कॉल पर कोई भी व्यक्ति उन्हें कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं कर सकता और न ही जांच के नाम पर निजी बैंक खाते में रकम जमा कराने का अधिकार रखता है।
