एंटोनियो गुटेरेस का ‘बिग ऑयल’ पर निशाना, बोले- प्रदूषण से मुनाफा कमाने वालों को उठानी होगी नुकसान की जिम्मेदारी

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नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एक बार फिर जीवाश्म ईंधन उद्योग की भूमिका पर सवाल उठाया है। 23 सितंबर 2026 को साझा किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि दशकों से बड़े तेल उद्योग ने वातावरण को प्रदूषण का माध्यम बनाया और इसके परिणामों से आर्थिक लाभ कमाया। गुटेरेस ने यह भी कहा कि दूसरी ओर आम लोगों को ऊर्जा, भोजन और बीमा जैसी जरूरी चीजों की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है।

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गुटेरेस का यह संदेश ऐसे समय सामने आया है जब संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क में 23 सितंबर को Climate Summit 2026 आयोजित हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस सम्मेलन में जलवायु संकट, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु न्याय और वैश्विक स्तर पर तेज जलवायु कार्रवाई जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।

‘प्रदूषण करने वालों को भुगतान करना चाहिए’

अपने संदेश में गुटेरेस ने इस बात पर जोर दिया कि जिन संस्थाओं या उद्योगों ने प्रदूषण से सबसे अधिक लाभ कमाया है, उन्हें पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई में अधिक योगदान देना चाहिए। उन्होंने इस विचार को व्यापक रूप से ‘Polluters Must Pay’ यानी ‘प्रदूषण करने वालों को भुगतान करना चाहिए’ के सिद्धांत से जोड़ा है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव पहले भी जीवाश्म ईंधन कंपनियों, निवेशकों और उनसे जुड़े वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही की बात कर चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक आधिकारिक वक्तव्य में उन्होंने जीवाश्म ईंधन उद्योग से होने वाले मुनाफे और जलवायु संकट के प्रभावों के बीच असमानता का मुद्दा उठाया था।

गुटेरेस का तर्क रहा है कि जलवायु परिवर्तन का असर सभी लोगों पर समान रूप से नहीं पड़ता। कम आय वाले समुदाय और कमजोर देश अक्सर बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी और अन्य जलवायु घटनाओं के कारण गंभीर आर्थिक और सामाजिक नुकसान झेलते हैं। दूसरी तरफ ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाली बड़ी कंपनियों को तेल और गैस की कीमतों तथा बाजार परिस्थितियों से भारी राजस्व और मुनाफा मिल सकता है।

आम लोगों पर बढ़ता आर्थिक दबाव

गुटेरेस के हालिया संदेश का एक प्रमुख हिस्सा आम परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव से जुड़ा है। उन्होंने ऊर्जा, भोजन और बीमा की बढ़ती लागत का उल्लेख करते हुए कहा कि जलवायु संकट का आर्थिक बोझ केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है।

ऊर्जा की कीमतों में बदलाव का असर परिवहन, बिजली उत्पादन और घरेलू खर्च तक पहुंचता है। इसी तरह चरम मौसम की घटनाएं कृषि उत्पादन, बुनियादी ढांचे और संपत्तियों को प्रभावित कर सकती हैं। बीमा कंपनियों के लिए भी बाढ़, तूफान, जंगल की आग और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े जोखिम महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव लंबे समय से यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि जलवायु संकट से होने वाली क्षति का आर्थिक भार उन लोगों पर नहीं पड़ना चाहिए जिनकी भूमिका इसके कारणों में अपेक्षाकृत कम रही है। 2024 में भी उन्होंने कहा था कि जीवाश्म ईंधन उद्योग को मिलने वाले लाभ और सब्सिडी के बीच आम लोग जलवायु संकट की कीमत चुका रहे हैं।

जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव

जलवायु संकट से निपटने के लिए गुटेरेस लगातार कोयला, तेल और गैस पर निर्भरता कम करने तथा स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की वकालत करते रहे हैं। जून 2026 में लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के दौरान उन्होंने जीवाश्म ईंधन से दूर जाने और उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

उनका कहना है कि ऊर्जा परिवर्तन केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था, रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की विकास व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।

हालांकि, जीवाश्म ईंधन से पूरी तरह दूर जाना एक जटिल प्रक्रिया है। दुनिया के कई देशों में बिजली, परिवहन, उद्योग और अन्य क्षेत्रों में तेल, गैस और कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है। इसलिए ऊर्जा परिवर्तन के दौरान रोजगार, ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों को लेकर भी नीतिगत चुनौतियां सामने आती हैं।

‘नुकसान और क्षति’ का मुद्दा

जलवायु संकट की चर्चा में Loss and Damage यानी ‘हानि और क्षति’ का विषय भी महत्वपूर्ण बन चुका है। इसका संबंध उन नुकसान से है जिन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण कमजोर और संवेदनशील देश झेलते हैं।

संयुक्त राष्ट्र लंबे समय से विकसित देशों से जलवायु वित्त और अनुकूलन के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की अपील करता रहा है। गुटेरेस ने भी पहले जलवायु संकट से प्रभावित देशों के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने और जीवाश्म ईंधन से जुड़े अतिरिक्त मुनाफे के इस्तेमाल पर चर्चा की है।

इस बहस का एक प्रमुख सवाल यह है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति की आर्थिक जिम्मेदारी किस तरह तय की जाए। अलग-अलग देशों की ऐतिहासिक उत्सर्जन हिस्सेदारी, वर्तमान उत्सर्जन, आर्थिक क्षमता और विकास की जरूरतों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं।

प्रदूषण और स्वास्थ्य का संबंध

वायु प्रदूषण का मुद्दा केवल जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं है। सितंबर 2026 में अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ वायु दिवस के अवसर पर गुटेरेस ने वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों का उल्लेख किया था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण से हर साल बड़ी संख्या में समयपूर्व मौतें और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जुड़ी हैं। उन्होंने स्वच्छ हवा के उपायों में निवेश को स्वास्थ्य और आर्थिक लाभ से जोड़ते हुए सरकारों, कारोबार और निवेशकों से कार्रवाई का आह्वान किया।

इससे स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु बहस में कार्बन उत्सर्जन के साथ-साथ वायु गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता को भी महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में देखा जा रहा है।

1.5 डिग्री लक्ष्य पर भी जोर

जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का एक महत्वपूर्ण केंद्र वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करना है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2015 के पेरिस समझौते में देशों ने औद्योगिक-पूर्व स्तर की तुलना में तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करने पर सहमति जताई थी।

सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी कि रिकॉर्ड गर्मी, बाढ़ और अन्य चरम मौसम की घटनाएं जलवायु कार्रवाई में तेजी की आवश्यकता को दर्शाती हैं। संगठन ने उत्सर्जन में कटौती, मीथेन प्रदूषण कम करने, जंगलों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा तथा जीवाश्म ईंधन से संक्रमण को महत्वपूर्ण कदम बताया है।

जलवायु न्याय पर केंद्रित संदेश

गुटेरेस के हालिया संदेश का केंद्र केवल तेल कंपनियों की आलोचना नहीं, बल्कि जलवायु न्याय का प्रश्न भी है। उनका कहना है कि जलवायु संकट के प्रभावों और उसके लिए जिम्मेदारी के बीच असमानता को ध्यान में रखना जरूरी है।

इस बहस में सरकारों, ऊर्जा कंपनियों, निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। एक ओर दुनिया को ऊर्जा की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते उत्सर्जन को नियंत्रित करना भी आवश्यक है। ऐसे में नीतियों का लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना है।

23 सितंबर को न्यूयॉर्क में आयोजित Climate Summit 2026 इसी व्यापक चर्चा का हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक सम्मेलन का उद्देश्य देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना, ऊर्जा परिवर्तन को गति देना और जलवायु संकट से प्रभावित लोगों की सुरक्षा के लिए प्रयास तेज करना है।

निष्कर्ष

एंटोनियो गुटेरेस का ताजा संदेश जलवायु परिवर्तन के आर्थिक और सामाजिक पहलुओं को सामने लाता है। उनका जोर इस बात पर है कि प्रदूषण से होने वाले नुकसान का बोझ केवल आम नागरिकों और कमजोर समुदायों पर नहीं पड़ना चाहिए। जीवाश्म ईंधन उद्योग की भूमिका, जलवायु वित्त, स्वच्छ ऊर्जा में निवेश और ‘प्रदूषण करने वालों से लागत वसूलने’ की अवधारणा आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीति की बहस के महत्वपूर्ण विषय बने रहेंगे।

साथ ही, वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को बदलना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। इसलिए जलवायु कार्रवाई के साथ ऊर्जा की उपलब्धता, रोजगार, विकास और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा। संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा पहल इसी व्यापक चुनौती के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तेज जलवायु कार्रवाई पर केंद्रित है।

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