ई-अन्नदाता संस्था की फ्रेंचाइजी से जुड़े विवाद ने उठाए गंभीर सवाल, निकिता सिंह की मौत के बाद परिजनों ने कार्रवाई की उठाई मांग
अमरेश त्रिपाठी
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात
कानपुर देहात। सरकारी योजनाओं से जुड़कर किसानों, महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के दावे अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में नई उम्मीद जगाते हैं। लेकिन जब ऐसे दावों के बीच आर्थिक लेन-देन, छिपे हुए शुल्क और प्रशिक्षण की अनिवार्यता को लेकर सवाल खड़े होने लगें, तो लोगों का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है। कानपुर देहात के चित्तरिया गांव की निकिता सिंह की मौत के बाद ई-अन्नदाता संस्था की फ्रेंचाइजी व्यवस्था को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है। निकिता के परिजनों ने संस्था पर गंभीर आरोप लगाते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

परिजनों का कहना है कि निकिता ने लगभग 15 महीने पहले गाजीपुर, उत्तर प्रदेश स्थित ई-अन्नदाता संस्था का केयर सेंटर शुरू किया था। इस केंद्र के माध्यम से किसानों के कार्ड बनाने, महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने, युवाओं को प्रशिक्षण उपलब्ध कराने और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को विभिन्न योजनाओं से जोड़ने का उद्देश्य बताया गया था। इसके लिए निकिता ने निर्धारित फीस जमा की और संस्था की ओर से बताए गए केयर सेंटर के मानकों को भी पूरा किया।
निशुल्क किसान कार्ड के दावे पर उठे सवाल
निकिता सिंह के परिजनों के अनुसार, संस्था की ओर से किसानों के ई-अन्नदाता कार्ड निशुल्क बनाए जाने की बात प्रचारित की गई थी। इसी आधार पर निकिता ने किसानों के आवेदन और कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू की। हालांकि, जब वास्तविक रूप से कार्ड बनाने का काम आगे बढ़ा तो केवाईसी के नाम पर किसानों से पैसे लेने की बात सामने आई।
परिजनों का आरोप है कि संस्था के पदाधिकारियों ने कार्ड, प्रिंटिंग और लेमिनेशन के नाम पर किसानों से निर्धारित राशि लेने की जानकारी दी थी। इस पर निकिता ने संस्था के जिम्मेदार लोगों से सवाल किया कि जब प्रचार सामग्री में कार्ड निशुल्क बनाने का दावा किया गया है, तो फिर अतिरिक्त शुल्क लेने की व्यवस्था क्यों रखी गई है?
निकिता का कहना था कि यदि किसानों से अलग-अलग मदों में पैसे लिए जाएंगे तो ग्रामीणों के बीच केयर सेंटर की छवि खराब होगी। लोग यही समझेंगे कि केंद्र संचालक निशुल्क सेवा के नाम पर उनसे अतिरिक्त रकम वसूल रहा है। बताया जाता है कि इसी मुद्दे को लेकर निकिता और संस्था के पदाधिकारियों के बीच कई बार बातचीत हुई।
महिलाओं को ऋण दिलाने के लिए प्रशिक्षण की शर्त
मामले में महिला सशक्तिकरण से जुड़े दावों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। निकिता को बताया गया था कि महिलाओं को छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए ऋण की सुविधा उपलब्ध कराने में संस्था सहयोग करेगी। इसके लिए महिलाओं को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होने की बात कही गई थी।
परिजनों के मुताबिक, जब निकिता ने पहले से अन्य संस्थानों अथवा भारत सरकार की योजनाओं के तहत प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी महिलाओं के प्रमाणपत्रों की मान्यता के बारे में जानकारी मांगी, तो उन्हें कथित तौर पर बताया गया कि केवल ई-अन्नदाता संस्था से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली महिलाओं को ही संबंधित ऋण सुविधा का लाभ मिल सकेगा।
आरोप है कि इसके लिए प्रत्येक महिला से पांच हजार रुपये प्रशिक्षण शुल्क मांगा गया। इस व्यवस्था को लेकर भी निकिता ने सवाल उठाए थे। उनका मानना था कि यदि महिलाओं को स्वरोजगार और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का उद्देश्य है तो पहले से प्रशिक्षित महिलाओं को भी उचित मान्यता मिलनी चाहिए।
सरकारी तस्वीरों वाले विज्ञापनों से परिवार को हुआ भरोसा
निकिता की मां सरोज देवी ने बताया कि संस्था के विज्ञापन समाचार पत्रों में प्रकाशित होते थे। इन विज्ञापनों में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें भी दिखाई देती थीं। सरकारी पदों पर बैठे प्रमुख लोगों की तस्वीरें देखकर परिवार को लगा कि संस्था का काम केंद्र और प्रदेश सरकार की निगरानी अथवा सहयोग से संचालित हो रहा है।
सरोज देवी के अनुसार, इसी भरोसे के चलते परिवार ने निकिता को संस्था के साथ काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें उम्मीद थी कि बेटी किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए उपयोगी कार्य करेगी और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार तथा विकास की नई संभावनाएं पैदा होंगी।
हालांकि, बाद में निकिता जब भी संस्था की कार्यप्रणाली को लेकर परिवार से बातचीत करती थी तो वह किसानों, महिलाओं और युवाओं से पैसे लेने की शर्तों को लेकर अपनी असहमति जाहिर करती थी। मां का कहना है कि निकिता को संस्था की ओर से अपेक्षित प्रशिक्षण और सहयोग भी नहीं मिला।
निवेश और खर्च का बढ़ता बोझ बना परेशानी
परिजनों के मुताबिक, केयर सेंटर शुरू करने के लिए निकिता ने अपनी क्षमता से अधिक आर्थिक निवेश किया था। कार्यालय के लिए किराया, बिजली का बिल, लैपटॉप, प्रिंटर, सजावट और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं पर काफी धन खर्च किया गया।
परिवार का आरोप है कि निकिता ने सेंटर को चलाने के लिए लोगों से कर्ज लिया और अपने जेवर तक गिरवी रख दिए थे। उसे उम्मीद थी कि संस्था की योजनाओं के माध्यम से काम आगे बढ़ेगा और धीरे-धीरे निवेश की भरपाई हो सकेगी।
परिजनों का दावा है कि निकिता ने कुछ किसान कार्ड भी बनाए थे, लेकिन इसके बावजूद उसके बैंक खाते से 170 रुपये काटे गए। परिवार का सवाल है कि जब संस्था की ओर से निशुल्क कार्ड बनाने की बात कही जा रही थी तो फिर खाते से यह रकम किस मद में काटी गई? इस लेन-देन का वास्तविक कारण संबंधित दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
मुख्यालय से संपर्क नहीं होने का भी आरोप
सरोज देवी का कहना है कि निकिता संस्था की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार चिंतित रहने लगी थी। एक ओर सेंटर का किराया और अन्य मासिक खर्च बढ़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर लगाए गए लाखों रुपये के निवेश की वापसी को लेकर कोई स्पष्ट रास्ता नजर नहीं आ रहा था।
परिवार के अनुसार, निकिता बार-बार कहती थी कि संस्था की व्यवस्था उसे ठीक नहीं लग रही है और उसकी मेहनत की कमाई फंस गई है। परिजनों का यह भी आरोप है कि समस्या को लेकर ई-अन्नदाता के मुख्यालय से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन वहां से फोन का जवाब नहीं मिल रहा था।
निकिता की मौत के बाद परिवार ने उठाई जांच की मांग
सरोज देवी ने आरोप लगाया कि संस्था से जुड़े विवाद, आर्थिक नुकसान और लगातार बनी चिंता के कारण निकिता की तबीयत प्रभावित हुई। परिवार का कहना है कि वह काफी परेशान रहने लगी थी और अंततः बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गई।
हालांकि, निकिता की मृत्यु के वास्तविक चिकित्सकीय कारण और संस्था से जुड़े विवाद के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि आधिकारिक जांच तथा चिकित्सा अभिलेखों के आधार पर ही हो सकती है। इस संबंध में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल आवश्यक है।
बेटी को खोने के गम से जूझ रही सरोज देवी अब इस मामले को प्रशासन और प्रदेश सरकार के सामने उठाने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि वह मुख्यमंत्री के समक्ष अपनी पूरी आपबीती रखेंगी और संस्था की कार्यप्रणाली की जांच कराकर दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करेंगी।
सरकारी योजनाओं के नाम पर काम करने वाली संस्थाओं की जांच जरूरी
इस प्रकरण ने ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं, किसान कार्ड, महिला प्रशिक्षण और स्वरोजगार के नाम पर संचालित होने वाले निजी संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेष रूप से ऐसी संस्थाओं के विज्ञापनों में सरकारी पदाधिकारियों अथवा जनप्रतिनिधियों की तस्वीरों के इस्तेमाल से आम लोगों के बीच सरकारी मान्यता होने का भ्रम पैदा हो सकता है।
ऐसे में यह जांच करना जरूरी है कि ई-अन्नदाता संस्था को वास्तव में किन योजनाओं के संचालन की अनुमति प्राप्त है, फ्रेंचाइजी संचालकों से कितनी फीस ली जाती है, किसानों से कार्ड बनाने के नाम पर वसूली जाने वाली रकम का आधार क्या है और महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए पांच हजार रुपये शुल्क निर्धारित करने का अधिकार किसके पास है।
इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संस्था की ओर से बताए गए ऋण और सरकारी योजनाओं का लाभ किन नियमों और पात्रता शर्तों के तहत दिया जाता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि निकिता सिंह ने जिस भरोसे के साथ अपना केयर सेंटर शुरू किया था, उस व्यवस्था में सामने आई कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी कौन लेगा? परिवार की मांग है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो, निवेश और शुल्क से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन किया जाए तथा यदि किसी प्रकार की धोखाधड़ी या वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाए।
निकिता की मौत के बाद परिवार चाहता है कि उसकी शिकायत केवल एक व्यक्तिगत विवाद बनकर न रह जाए, बल्कि इसकी जांच से ऐसी व्यवस्था सामने आए जिससे भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह की आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना न करना पड़े।
