मनरेगा कार्य में जेसीबी के इस्तेमाल पर विवाद, मजदूरों के विरोध के बाद रुका काम; ग्राम प्रधान और सचिव आमने-सामने
देव पटेल
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ जालौन
उरई (जालौन)। विशेष समाचार रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के डकोर विकासखंड की ग्राम पंचायत मुहम्मदाबाद में मनरेगा योजना के तहत कराए जा रहे कार्य को लेकर विवाद सामने आया है। निर्माण कार्य में जेसीबी मशीन के इस्तेमाल की जानकारी मिलने के बाद ग्राम पंचायत में हंगामे की स्थिति बन गई। ग्राम प्रधान भगवानदास वर्मा ने ग्राम सचिव रोहित कुशवाहा पर मनरेगा के जॉबकार्ड धारक मजदूरों से काम कराने के बजाय मशीन का उपयोग कराने का आरोप लगाया। मामला बढ़ने पर गांव के कई मजदूर मौके पर पहुंच गए और उन्होंने इसका विरोध किया। विरोध के बाद संबंधित कार्य को रोक दिया गया। घटनास्थल पर पुलिस भी पहुंची।

इस प्रकरण ने एक बार फिर मनरेगा के अंतर्गत होने वाले कार्यों में मजदूरों की भागीदारी, योजना के नियमों के पालन और कार्यों की निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, ग्राम प्रधान और ग्राम सचिव की ओर से सामने आए बयानों में अंतर होने के कारण मामले की पूरी तस्वीर संबंधित जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
मनरेगा के काम में मशीन के इस्तेमाल को लेकर कैसे शुरू हुआ विवाद?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, डकोर विकासखंड की ग्राम पंचायत मुहम्मदाबाद में मनरेगा योजना के तहत एक कार्य कराया जा रहा था। इसी दौरान वहां जेसीबी मशीन का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई। ग्राम प्रधान भगवानदास वर्मा को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने मौके पर पहुंचकर आपत्ति जताई।
ग्राम प्रधान का आरोप है कि जिस कार्य को मनरेगा के तहत पंजीकृत जॉबकार्ड धारक मजदूरों से कराया जाना चाहिए था, उसे मशीन की मदद से कराया जा रहा था। उनका कहना है कि इस काम की जानकारी उन्हें पहले नहीं दी गई थी। जब उन्हें जेसीबी मशीन के इस्तेमाल की सूचना मिली, तब उन्होंने इसका विरोध किया।
विवाद की जानकारी फैलने के बाद गांव के कई मजदूर भी घटनास्थल पर पहुंच गए। मजदूरों ने मशीन से काम कराए जाने पर आपत्ति जताई। इसके बाद मौके पर विरोध की स्थिति बन गई और काम को रोकना पड़ा।
ग्राम प्रधान ने सचिव पर लगाए आरोप
ग्राम प्रधान भगवानदास वर्मा ने ग्राम सचिव रोहित कुशवाहा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि मजदूरों के लिए निर्धारित काम मशीनों से कराया जाता है, तो इससे योजना के मूल उद्देश्य पर असर पड़ सकता है।
ग्राम प्रधान के मुताबिक, संबंधित कार्य जॉबकार्ड धारक मजदूरों के माध्यम से कराया जाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सचिव की ओर से जेसीबी मशीन का उपयोग कराया जा रहा था और उन्हें इस संबंध में पहले से कोई जानकारी नहीं थी।
इस घटना के बाद पंचायत स्तर पर कार्यों की जानकारी साझा करने और निर्माण कार्यों की निगरानी को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, ग्राम प्रधान की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए मामले में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित अधिकारियों की जांच और उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक होगा।
ग्राम सचिव ने बताई अलग वजह
दूसरी ओर, ग्राम सचिव रोहित कुशवाहा ने जेसीबी मशीन के इस्तेमाल को लेकर अपनी अलग बात रखी है। उनका कहना है कि मशीन से पूरा निर्माण कार्य नहीं कराया जा रहा था, बल्कि केवल निशान लगाने के लिए जेसीबी का इस्तेमाल किया जा रहा था।
सचिव के अनुसार, मौके पर अधिकारी भी मौजूद थे। उनका पक्ष ग्राम प्रधान के आरोपों से अलग है। एक तरफ ग्राम प्रधान का दावा है कि मजदूरों के बजाय मशीन से काम कराया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ सचिव ने मशीन के इस्तेमाल को केवल निशान लगाने तक सीमित बताया है।
दोनों पक्षों के बयानों में अंतर होने के कारण यह पता लगाना जरूरी है कि मौके पर वास्तव में किस प्रकार का कार्य कराया जा रहा था। इसके लिए कार्यस्थल का निरीक्षण, स्वीकृत कार्य की प्रकृति, संबंधित अभिलेखों और मौके पर मौजूद लोगों के बयानों की जांच उपयोगी साबित हो सकती है।
मजदूरों के विरोध के बाद रोका गया काम
जेसीबी मशीन के इस्तेमाल को लेकर विवाद बढ़ने पर गांव के दर्जनों मजदूर घटनास्थल पर पहुंच गए। मजदूरों ने इस बात पर आपत्ति जताई कि मनरेगा के तहत होने वाले कार्य में मशीन का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है। विरोध के चलते मौके पर काम बंद कराना पड़ा।
घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस भी मौके पर पहुंची। पुलिस की मौजूदगी में स्थिति पर नजर रखी गई और विरोध के बीच कार्य रुक गया। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि संबंधित अधिकारियों ने मामले में कोई अंतिम निर्णय लिया है या जांच पूरी की है।
इस घटनाक्रम के बाद ग्रामीणों के बीच मनरेगा के कामकाज को लेकर चर्चा तेज हो गई है। मजदूरों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने वाली योजना में यदि किसी प्रकार की अनियमितता की शिकायत सामने आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और समय पर कार्रवाई महत्वपूर्ण हो जाती है।
मनरेगा में मजदूरों के रोजगार का क्या है महत्व?
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की एक महत्वपूर्ण सरकारी योजना है। इसका उद्देश्य पात्र ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को मांग के आधार पर अकुशल शारीरिक श्रम वाला रोजगार उपलब्ध कराना और गांवों में उपयोगी परिसंपत्तियों का निर्माण करना है।
योजना के तहत कराए जाने वाले कार्यों में लागू नियमों, स्वीकृत कार्ययोजना और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। मनरेगा के कार्यों में मजदूरों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए किसी भी निर्माण कार्य में मशीन के इस्तेमाल को लेकर शिकायत सामने आने पर यह देखना आवश्यक है कि संबंधित कार्य के लिए कौन-से नियम लागू होते हैं और मौके पर उनका पालन हुआ या नहीं।
हर परिस्थिति में मशीन के उपयोग को लेकर एक जैसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। इसकी वैधता और औचित्य संबंधित कार्य की प्रकृति तथा लागू दिशा-निर्देशों पर निर्भर कर सकते हैं। मुहम्मदाबाद की घटना में भी वास्तविक स्थिति जानने के लिए संबंधित कार्य की स्वीकृति और तकनीकी विवरण की जांच आवश्यक होगी।
मजदूरों के अधिकार और पारदर्शिता पर उठे सवाल
ग्राम पंचायत मुहम्मदाबाद में सामने आए विवाद ने ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की आवश्यकता को फिर रेखांकित किया है। मनरेगा के तहत काम कराने वाली व्यवस्था में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कार्य स्वीकृत योजना के अनुसार हो, मजदूरों की उपस्थिति और कार्य का विवरण सही दर्ज किया जाए तथा सरकारी धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जाए।
यदि किसी कार्य में अनियमितता की शिकायत मिलती है, तो संबंधित अधिकारियों को शिकायत की जांच कर तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। साथ ही, मजदूरों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि किस काम को स्वीकृति मिली है, उसका कार्यस्थल कहां है और रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया क्या है।
इस तरह की शिकायतों का समय पर निस्तारण होने से न केवल योजना के प्रति लोगों का भरोसा बना रहता है, बल्कि पंचायत स्तर पर जवाबदेही भी मजबूत होती है।
जांच से स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति
मुहम्मदाबाद ग्राम पंचायत में जेसीबी मशीन के इस्तेमाल को लेकर फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने आए हैं। ग्राम प्रधान भगवानदास वर्मा ने मजदूरों के बजाय मशीन से काम कराने का आरोप लगाया है, जबकि ग्राम सचिव रोहित कुशवाहा ने कहा है कि जेसीबी का उपयोग केवल निशान लगाने के लिए किया गया था।
ऐसे में निष्पक्ष जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि मशीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया, कार्य की स्वीकृत योजना में क्या प्रावधान थे और मौके पर निर्धारित नियमों का पालन हुआ या नहीं।
जांच में संबंधित अधिकारियों को कार्यस्थल की स्थिति, उपलब्ध दस्तावेजों और मजदूरों के बयानों का परीक्षण करना चाहिए। यदि किसी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती है, तो वास्तविक तथ्यों को सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
निष्कर्ष: जालौन के डकोर विकासखंड की ग्राम पंचायत मुहम्मदाबाद में मनरेगा कार्य के दौरान जेसीबी मशीन के इस्तेमाल को लेकर उठा विवाद ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। मजदूरों के विरोध के बाद कार्य रुकने और ग्राम प्रधान तथा सचिव के अलग-अलग बयान सामने आने के बीच अब संबंधित अधिकारियों की जांच महत्वपूर्ण होगी। वास्तविक स्थिति सामने आने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मशीन का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुरूप था या मामले में किसी प्रकार की अनियमितता हुई।
