कानपुर देहात में फैक्ट्री हादसे ने छीनी मजदूर की जिंदगी, परिवार ने शव रखकर किया प्रदर्शन; मुआवजे को लेकर बनी सहमति

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अमरेश त्रिपाठी

हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात

दिव्यांग पत्नी और दो मासूम बेटियों के सिर से उठा पिता का साया, पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी की पहल पर फैक्ट्री प्रबंधन ने 15 लाख रुपये की सहायता देने का किया वादा; सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का भी आश्वासन

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कानपुर देहात (उत्तर प्रदेश)। जनपद कानपुर देहात के रनिया थाना क्षेत्र में एक फैक्ट्री में काम करने के दौरान हुए दर्दनाक हादसे ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। मनटोरा ऑयल प्रोडक्ट फैक्ट्री में कार्यरत 35 वर्षीय मजदूर सत्येंद्र की दुर्घटना में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि बॉयलर में भूसी डालने के दौरान अचानक पैर फिसलने से वह लगभग 10 फीट गहरे गड्ढे में गिर गया था। गंभीर रूप से घायल मजदूर को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन रास्ते में ही उसकी सांसें थम गईं।

इस घटना के बाद मृतक के परिवार में मातम पसरा हुआ है। परिवार के सामने सबसे बड़ी समस्या अब रोजी-रोटी और बच्चों के भविष्य को लेकर खड़ी हो गई है। शुक्रवार सुबह परिजन मृतक का शव लेकर फैक्ट्री पहुंच गए और मुख्य परिसर के बाहर शव रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। परिजनों ने फैक्ट्री प्रबंधन से उचित आर्थिक सहायता, परिवार की सुरक्षा और हादसे की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई। काफी देर तक चले घटनाक्रम के बाद पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी की मध्यस्थता से फैक्ट्री प्रबंधन और परिजनों के बीच आर्थिक सहायता को लेकर सहमति बनी।

नौ वर्षों से फैक्ट्री में काम कर रहा था सत्येंद्र

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, रनिया थाना क्षेत्र के चिराना गांव निवासी श्रीराम का 35 वर्षीय पुत्र सत्येंद्र पिछले लगभग नौ वर्षों से मनटोरा ऑयल प्रोडक्ट फैक्ट्री में मजदूरी कर रहा था। वह अपने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए नियमित रूप से फैक्ट्री में काम करने जाता था।

गुरुवार को भी सत्येंद्र रोजाना की तरह सुबह करीब 6:30 बजे घर से काम के लिए निकला था। परिवार को अंदाजा भी नहीं था कि यह उसकी जिंदगी का आखिरी कार्यदिवस साबित होगा।

बताया गया कि दोपहर लगभग एक बजे सत्येंद्र फैक्ट्री परिसर में बॉयलर में भूसी डालने का काम कर रहा था। इसी दौरान अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया और पैर फिसलने के कारण वह कन्वेयर के नजदीक बने करीब 10 फीट गहरे गड्ढे में जा गिरा।

अचानक हुए इस हादसे से फैक्ट्री परिसर में हड़कंप मच गया। वहां मौजूद कर्मचारियों ने उसे बाहर निकालने की कोशिश शुरू की। मृतक का छोटा भाई राहुल भी मौके पर मौजूद था। काफी प्रयास के बाद सत्येंद्र को गड्ढे से बाहर निकाला गया। उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की गई, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।

परिवार का इकलौता सहारा था मृतक मजदूर

सत्येंद्र की मौत से उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। वह परिवार की आजीविका का प्रमुख आधार था। उसकी पत्नी रोशनी दिव्यांग हैं और परिवार में दो छोटी बेटियां खुशबू तथा मुस्कान हैं।

बड़ी बेटी खुशबू की उम्र लगभग छह वर्ष है, जबकि छोटी बेटी मुस्कान अभी पांच साल की है। दोनों बच्चियों को शायद अभी यह भी पूरी तरह समझ नहीं है कि उनके जीवन में कितनी बड़ी कमी आ गई है। पिता की असमय मौत से उनका भविष्य प्रभावित होने की आशंका है।

दिव्यांग पत्नी के सामने अब बच्चों की परवरिश, शिक्षा और घर का खर्च चलाने की कठिन चुनौती है। जिस व्यक्ति की कमाई से परिवार का दैनिक जीवन चलता था, उसके चले जाने के बाद परिवार आर्थिक और मानसिक संकट से गुजर रहा है।

इसी स्थिति को देखते हुए परिजनों ने फैक्ट्री प्रबंधन से मांग की कि परिवार को ऐसी आर्थिक सहायता दी जाए, जिससे पत्नी और दोनों बेटियों का जीवन आगे चल सके। उनकी मांग थी कि बच्चियों की पढ़ाई और पालन-पोषण की जिम्मेदारी को भी गंभीरता से लिया जाए।

शव फैक्ट्री के बाहर रखकर परिजनों ने जताया विरोध

शुक्रवार सुबह करीब नौ बजे मृतक के परिजन सत्येंद्र का शव लेकर मनटोरा ऑयल प्रोडक्ट फैक्ट्री पहुंच गए। उन्होंने फैक्ट्री के बाहर शव रखकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।

परिजनों का कहना था कि सत्येंद्र लंबे समय से फैक्ट्री में काम कर रहा था। ऐसे में उसकी मौत के बाद परिवार को अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने पर्याप्त मुआवजे के साथ-साथ दुर्घटना के कारणों की जांच और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई की मांग की।

प्रदर्शन की जानकारी मिलने पर रनिया थाना प्रभारी सौरभ सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने परिजनों से बातचीत कर उन्हें समझाने का प्रयास किया। साथ ही फैक्ट्री प्रबंधन के साथ बातचीत के माध्यम से विवाद का समाधान निकालने की कोशिश की गई।

पुलिस की ओर से उचित कार्रवाई का भरोसा दिए जाने के बावजूद परिजन अपनी मांगों पर अड़े रहे। उनका कहना था कि केवल आश्वासन से परिवार का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता, बल्कि आर्थिक सहायता को लेकर ठोस निर्णय होना चाहिए।

पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी ने संभाली बातचीत की जिम्मेदारी

मामले की जानकारी मिलने के बाद पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी भी घटनास्थल पर पहुंचे। उन्होंने मृतक के परिजनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं और परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त की।

इसके बाद उन्होंने फैक्ट्री प्रबंधन से बातचीत की। चर्चा का मुख्य उद्देश्य मृतक के परिवार को उचित आर्थिक सहायता दिलाना और उसकी पत्नी तथा दोनों बेटियों के भविष्य के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना था।

पूर्व सांसद की पहल के बाद फैक्ट्री प्रबंधन और परिजनों के बीच मुआवजे को लेकर बातचीत आगे बढ़ी। इस दौरान परिवार की जरूरतों और भविष्य की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए सहायता राशि पर सहमति बनाने का प्रयास किया गया।

पूर्व सांसद के मुताबिक, फैक्ट्री प्रबंधन ने मृतक के परिवार को 15 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का वादा किया है। इस आश्वासन के बाद परिजनों की प्रमुख मांगों पर सहमति बनने का रास्ता साफ हुआ।

सरकारी सहायता के तहत 12.48 लाख रुपये का उल्लेख

पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी ने बताया कि सरकारी मुआवजे की गणना के अनुसार लगभग 12 लाख 48 हजार रुपये की राशि निर्धारित होने की जानकारी सामने आई है। इसके अतिरिक्त सरकार की ओर से पांच लाख रुपये की सहायता दिलाने के लिए भी संबंधित अधिकारियों से बातचीत की गई है।

इस संबंध में एसडीएम से संपर्क कर आवश्यक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। हालांकि, सरकारी सहायता का वास्तविक लाभ संबंधित नियमों, पात्रता और प्रशासनिक स्वीकृति के आधार पर ही मिल सकेगा।

परिवार को उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया जल्द पूरी कराएगा, ताकि आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार को राहत मिल सके।

दोनों बेटियों की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद का प्रयास

सत्येंद्र की मौत के बाद उसकी दोनों बेटियों की शिक्षा और परवरिश को लेकर भी चिंता जताई गई। पूर्व सांसद ने बताया कि मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के तहत दोनों बच्चियों को 18 वर्ष की उम्र तक आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

योजना के तहत पात्रता के अनुसार प्रत्येक बच्ची को प्रतिमाह ढाई हजार रुपये की सहायता दिलाने की व्यवस्था कराने की बात कही गई है। इस राशि से उनकी पढ़ाई और पालन-पोषण में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा दिव्यांग पत्नी रोशनी को विधवा पेंशन का लाभ दिलाने के लिए भी संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किए जाने की जानकारी दी गई।

इन प्रयासों का उद्देश्य केवल तत्काल मुआवजा दिलाना नहीं, बल्कि परिवार को लंबे समय तक आर्थिक सहारा उपलब्ध कराना है। खासकर दोनों छोटी बच्चियों की शिक्षा बाधित न हो और उनकी जरूरतें पूरी होती रहें, इस पर जोर दिया गया।

फैक्ट्री की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

इस दुर्घटना के बाद औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। बॉयलर जैसे संवेदनशील स्थानों पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम होना बेहद जरूरी है।

फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिकों को सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराना प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे स्थानों पर सुरक्षा मानकों का पालन, कर्मचारियों को प्रशिक्षण, जोखिम वाले क्षेत्रों में आवश्यक सुरक्षा इंतजाम और नियमित निरीक्षण दुर्घटनाओं की आशंका कम करने में सहायक हो सकते हैं।

सत्येंद्र की मौत के बाद यह भी जरूरी हो गया है कि संबंधित विभाग हादसे के वास्तविक कारणों की जांच करें। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि दुर्घटना किन परिस्थितियों में हुई और कार्यस्थल पर सुरक्षा संबंधी आवश्यक इंतजाम मौजूद थे या नहीं।

पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया शव, परिवार को सहायता मिलने का इंतजार

घटना के बाद पुलिस ने आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए सत्येंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस मामले से जुड़े तथ्यों की जानकारी जुटा रही है।

फिलहाल फैक्ट्री प्रबंधन की ओर से 15 लाख रुपये की सहायता देने के आश्वासन के साथ-साथ सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की पहल की गई है। अब मृतक के परिजनों की निगाहें इन वादों के वास्तविक क्रियान्वयन पर टिकी हैं।

यह हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि किसी मजदूर की मौत केवल एक व्यक्ति की जिंदगी का अंत नहीं होती, बल्कि उसके पीछे पूरे परिवार का भविष्य भी प्रभावित होता है। सत्येंद्र की दिव्यांग पत्नी और दो छोटी बेटियों के लिए अब आर्थिक सहायता, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है।

परिजनों की मांग है कि उन्हें दिया गया आश्वासन जल्द पूरा किया जाए और फैक्ट्री में सुरक्षा व्यवस्था की जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में किसी दूसरे परिवार को इस तरह का दर्द न सहना पड़े।

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