प्रयागराज में आवारा कुत्तों को पकड़ने पहुंची नगर निगम की टीम का विरोध, पशु अधिकार कार्यकर्ता वंशिका गुप्ता से हुई तीखी बहस

0

अमरेश त्रिपाठी

हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आवारा कुत्तों को पकड़ने पहुंची नगर निगम की टीम को उस समय विरोध का सामना करना पड़ा, जब पशु अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता वंशिका गुप्ता मौके पर पहुंच गईं। कुत्तों को पकड़कर नगर निगम के वाहन में ले जाने की कार्रवाई को लेकर उनके और टीम के सदस्यों के बीच तीखी बहस हो गई। घटना का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। इस घटना ने एक बार फिर शहरों में आवारा कुत्तों के प्रबंधन, पशु कल्याण और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े सवालों को सुर्खियों में ला दिया है।

AI Generated photo

नगर निगम की कार्रवाई के दौरान हुआ विवाद

जानकारी के अनुसार, प्रयागराज में नगर निगम की टीम आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए एक क्षेत्र में पहुंची थी। टीम के सदस्य कुत्तों को पकड़कर अपने वाहन में ले जाने की प्रक्रिया में जुटे थे। इसी दौरान पशु अधिकार कार्यकर्ता वंशिका गुप्ता वहां पहुंच गईं और उन्होंने नगर निगम की कार्रवाई पर आपत्ति जताई।

वंशिका गुप्ता ने कुत्तों को पकड़ने के तरीके और इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। उनका विरोध शुरू होने के बाद मौके पर मौजूद नगर निगम कर्मचारियों और उनके बीच बातचीत तेज हो गई। कुछ ही देर में सामान्य बातचीत ने बहस का रूप ले लिया। घटनास्थल पर मौजूद लोगों की निगाहें भी इस विवाद पर टिक गईं।

इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें दोनों पक्षों के बीच बातचीत और असहमति दिखाई दे रही है। वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

पशु अधिकारों के लिए काम करती हैं वंशिका गुप्ता

वंशिका गुप्ता ‘रक्षा- मेक ए डिफरेंस ट्रस्ट’ की संस्थापक बताई जाती हैं। यह संस्था पशुओं के बचाव, उपचार और उनकी देखभाल से जुड़े कार्यों के लिए जानी जाती है। पशुओं के प्रति संवेदनशीलता और उनके संरक्षण को लेकर वंशिका गुप्ता सक्रिय रहती हैं।

उनका मानना है कि बेजुबान जानवरों के साथ किसी भी प्रकार की कार्रवाई करते समय मानवीय व्यवहार और निर्धारित नियमों का पालन किया जाना चाहिए। आवारा कुत्तों को पकड़ने के मामले में भी पशु कल्याण से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

हालांकि, नगर निगम की कार्रवाई का विरोध करने के दौरान जिस तरह से दोनों पक्षों के बीच बहस हुई, उसने इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला दिया है। पशु संरक्षण के समर्थकों और सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले लोगों के बीच इस विषय पर अलग-अलग विचार देखने को मिल रहे हैं।

प्रवर्तन दल ने लगाए अभद्र भाषा के आरोप

विवाद के दौरान नगर निगम के प्रवर्तन दल की ओर से वंशिका गुप्ता पर गाली-गलौज करने का आरोप लगाए जाने की बात सामने आई है। इस आरोप पर वंशिका ने आपत्ति जताई और कहा कि यदि उन्होंने किसी के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया है तो उसका वीडियो दिखाया जाए।

इस जवाब के बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद और चर्चा में आ गया। फिलहाल सामने आई जानकारी के आधार पर आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती है। ऐसे में पूरे मामले को समझने के लिए घटनास्थल का पूरा वीडियो, नगर निगम का पक्ष और संबंधित लोगों के बयान महत्वपूर्ण होंगे।

किसी भी विवाद में केवल अधूरे वीडियो या एक पक्ष के दावों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए सभी पक्षों की बात सामने आना आवश्यक है।

सोशल मीडिया पर बातचीत के अंदाज की चर्चा

घटना का वीडियो सामने आने के बाद लोगों के बीच केवल नगर निगम की कार्रवाई ही नहीं, बल्कि वंशिका गुप्ता और अधिकारियों के बीच बातचीत के तरीके को लेकर भी चर्चा हो रही है।

कुछ लोग पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के विरोध को जरूरी मान रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों को अपनी जिम्मेदारी निभाने के दौरान अनावश्यक विवादों का सामना नहीं करना चाहिए।

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि किसी सरकारी कार्रवाई से असहमति होने पर विरोध किस तरह दर्ज कराया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन संवाद के दौरान शालीनता और संयम बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

आवारा कुत्तों की समस्या से जूझ रहे हैं शहर

प्रयागराज सहित देश के कई शहरों में आवारा कुत्तों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। कई इलाकों में कुत्तों के झुंड सड़कों, बाजारों, गलियों और आवासीय कॉलोनियों में दिखाई देते हैं। कभी-कभी इनके आक्रामक व्यवहार या काटने की घटनाओं से स्थानीय लोगों में डर पैदा हो जाता है।

विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और सुबह-शाम पैदल चलने वाले लोगों को लेकर नागरिक अपनी चिंता जाहिर करते हैं। वहीं दूसरी ओर पशु प्रेमियों का कहना है कि हर आवारा कुत्ता खतरनाक नहीं होता और सभी जानवरों को एक जैसा मानना उचित नहीं है।

कई बार कुत्तों के व्यवहार में बदलाव बीमारी, डर, भूख या आसपास के वातावरण के कारण भी आ सकता है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल कुत्तों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

कानून के दायरे में होनी चाहिए कार्रवाई

आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर देश में पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control-ABC) नियम, 2023 लागू हैं। इन नियमों के तहत स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाएं।

नियमों के अनुसार, कुत्तों की नसबंदी और एंटी-रेबीज टीकाकरण जैसे उपायों को प्राथमिकता दी जाती है। इसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और अधिकृत पशु चिकित्सा सुविधाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

सामान्य परिस्थितियों में नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उसी क्षेत्र में वापस छोड़े जाने का प्रावधान है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। हालांकि, बीमार, घायल, रेबीज से संदिग्ध या आक्रामक व्यवहार करने वाले कुत्तों के मामले में निर्धारित नियमों के अनुसार अलग व्यवस्था हो सकती है।

इसलिए नगर निगम की किसी भी कार्रवाई में पारदर्शिता, उचित रिकॉर्ड और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की भागीदारी आवश्यक है।

सार्वजनिक सुरक्षा और पशु संरक्षण में संतुलन जरूरी

प्रयागराज की यह घटना एक बड़े सामाजिक सवाल की ओर ध्यान आकर्षित करती है। आखिर आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान किस तरह किया जाए, जिससे आम नागरिकों की सुरक्षा भी बनी रहे और बेजुबान जानवरों के साथ अन्याय भी न हो?

नगर निगम का दायित्व है कि वह शहरवासियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराए। यदि किसी क्षेत्र में कुत्तों के हमले, काटने की घटनाएं या रेबीज का खतरा सामने आता है तो संबंधित विभाग को नियमानुसार कदम उठाने चाहिए।

दूसरी तरफ पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे पशुओं के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार पर आवाज उठाएं और प्रशासन को नियमों का पालन करने के लिए जागरूक करें।

इन दोनों उद्देश्यों को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय मिलकर काम करने की जरूरत है। नगर निगम और पशु कल्याण संगठनों के बीच बेहतर समन्वय से इस समस्या का अधिक प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है।

प्रशासन और पशु अधिकार संगठनों के बीच संवाद जरूरी

ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए नगर निगम को पशु अधिकार संगठनों के साथ नियमित संवाद स्थापित करना चाहिए। कुत्तों को पकड़ने से पहले संबंधित क्षेत्र में कार्रवाई की जानकारी, निर्धारित प्रक्रिया और पशुओं को ले जाने के उद्देश्य के बारे में स्पष्टता होनी चाहिए।

इसके अलावा स्थानीय नागरिकों को भी जागरूक करना जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि आवारा कुत्तों को परेशान करना, उन पर पत्थर फेंकना या उनके साथ हिंसक व्यवहार करना समस्या को और बढ़ा सकता है।

प्रशासन को भी शिकायतों पर समय से कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि किसी अप्रिय घटना के बाद ही व्यवस्था सक्रिय न हो।

निष्कर्ष: टकराव नहीं, समाधान की जरूरत

प्रयागराज में नगर निगम की टीम और पशु अधिकार कार्यकर्ता वंशिका गुप्ता के बीच हुआ विवाद केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह पशु संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को भी सामने लाता है।

आवारा कुत्तों की समस्या का स्थायी समाधान संवेदनशीलता, वैज्ञानिक प्रबंधन, टीकाकरण, नसबंदी और प्रशासनिक जवाबदेही से ही संभव है। अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आपसी बहस के बजाय संवाद और सहयोग का रास्ता अपनाना चाहिए।

अब देखना होगा कि इस मामले में नगर निगम और संबंधित पक्षों की ओर से आगे क्या जानकारी सामने आती है।

आपकी राय क्या है? क्या आवारा कुत्तों को पकड़ने की कार्रवाई के दौरान पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और निगरानी जरूरी है? या नगर निगम को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए बिना किसी बाधा के नियमानुसार कार्रवाई करने का अधिकार मिलना चाहिए? अपनी राय जरूर साझा करें।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

इन्हे भी देखें