सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: रिश्तों में विवाद के बाद दुष्कर्म कानून के दुरुपयोग पर जताई चिंता, कहा- टूटे रिश्ते को अपराध का रंग देना उचित नहीं

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नई दिल्ली | 31 अक्टूबर 2026 | HIT AND HOT NEWS

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से बने रिश्तों के टूटने के बाद दुष्कर्म के मामलों में दर्ज होने वाली शिकायतों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को केवल रिश्ता खत्म होने या आपसी विवाद पैदा होने के कारण बाद में दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा कि व्यक्तिगत संबंधों में आई कड़वाहट के बाद कानून को बदला लेने या किसी व्यक्ति पर दबाव बनाने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आपसी सहमति और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनी विमर्श में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक यौन अपराधों की शिकायतों को गंभीरता से लेना और उनकी निष्पक्ष जांच करना न्याय व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

दो न्यायाधीशों की पीठ ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने 30 अक्टूबर 2026 को एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला केरल निवासी संतोष कुमार एन.पी. से जुड़ा था, जिनके खिलाफ दुष्कर्म और धोखाधड़ी सहित अन्य आरोपों के तहत आपराधिक कार्यवाही चल रही थी।

मामले में एक महिला ने आरोप लगाया था कि संबंधित व्यक्ति ने अपनी पहले से मौजूद शादी की जानकारी छिपाई और विवाह संबंधी परिस्थितियों को लेकर गलत जानकारी देकर उसके साथ संबंध बनाए। महिला के अनुसार, दोनों के बीच वर्ष 1996 से 2003 तक संबंध रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध परिस्थितियों पर विचार करने के बाद आरोपी को संबंधित आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने इस दौरान कहा कि किसी रिश्ते का अंत अपने आप में पहले से बने सहमति आधारित शारीरिक संबंधों को अपराध में परिवर्तित नहीं कर सकता।

रिश्ता टूटने के बाद पुराने संबंधों को अपराध मानना उचित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। अदालत के मुताबिक, यदि दो वयस्क अपनी स्वतंत्र इच्छा और आपसी सहमति से किसी रिश्ते में आगे बढ़ते हैं, तो बाद में उनके बीच मतभेद पैदा होने या रिश्ता समाप्त होने से पहले की सहमति अपने आप समाप्त नहीं मानी जा सकती।

पीठ ने चिंता व्यक्त की कि हाल के वर्षों में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें रिश्ते के समाप्त होने के बाद पुराने घटनाक्रमों को दोबारा परखकर उन्हें आपराधिक आरोपों का आधार बनाया जाता है।

अदालत का मानना था कि किसी संबंध के सफल नहीं होने, विवाह तक नहीं पहुंचने या व्यक्तिगत मतभेद पैदा होने को सीधे दुष्कर्म का आधार नहीं बनाया जा सकता। हर मामले में घटनाओं की वास्तविक परिस्थितियों, सहमति की प्रकृति और शुरुआत से मौजूद तथ्यों को समझना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा से रिश्ता समाप्त करने का अधिकार नहीं है? केवल संबंध खत्म करने के फैसले को धोखाधड़ी या आपराधिक कृत्य मान लेना उचित नहीं होगा।

झूठे वादे और शुरुआत से किए गए छल में अंतर जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि सभी मामलों को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। यदि किसी व्यक्ति ने शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा रखते हुए झूठे वादे किए और उसी आधार पर दूसरे व्यक्ति की सहमति प्राप्त की, तो मामला अलग हो सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में यह जांचना आवश्यक है कि क्या शुरुआत से ही विवाह या किसी अन्य महत्वपूर्ण तथ्य को लेकर जानबूझकर गलत जानकारी दी गई थी। क्या संबंधित व्यक्ति की सहमति किसी धोखे या गलत बयानी के कारण बनी थी? इन सवालों का जवाब मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

इसके विपरीत, यदि दो वयस्कों के बीच संबंध वास्तविक आपसी सहमति से शुरू हुआ और बाद में परिस्थितियों, पारिवारिक दबाव, विचारों में अंतर या अन्य कारणों से समाप्त हो गया, तो केवल इस आधार पर पहले के संबंधों को दुष्कर्म का अपराध नहीं कहा जा सकता।

अदालत की इस टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य सहमति और धोखे से जुड़ी परिस्थितियों के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करना है।

आपराधिक कानून को व्यक्तिगत विवाद का हथियार न बनाया जाए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने, बदला लेने या किसी व्यक्ति को अनुचित दबाव में लाने के लिए नहीं होना चाहिए।

अदालत ने यह भी चिंता जताई कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप लगाए जाते हैं, तो उसका सामाजिक जीवन, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। कई बार मुकदमे की प्रक्रिया शुरू होने के बाद व्यक्ति को लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसी वजह से अदालतों को प्रत्येक मामले की पूरी पृष्ठभूमि समझकर निर्णय लेना चाहिए। केवल शिकायत में लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाओं के क्रम का कानूनी मूल्यांकन जरूरी है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिकायत करने वाले व्यक्ति की बात को नजरअंदाज किया जाए। न्याय व्यवस्था में शिकायतकर्ता और आरोपी, दोनों के कानूनी अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है।

महिलाओं की सुरक्षा और वास्तविक शिकायतों को गंभीरता से लेने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता के महत्व को भी रेखांकित किया। अदालत ने माना कि दुष्कर्म एक गंभीर अपराध है, जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मान और गरिमा को गहरी चोट पहुंचाता है।

पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि समाज में आज भी कई वास्तविक यौन अपराधों की शिकायतें सामने नहीं आ पातीं। सामाजिक दबाव, परिवार की प्रतिष्ठा, बदनामी का डर और अन्य परिस्थितियां पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने से रोक सकती हैं।

इसलिए जहां वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती, दबाव या सहमति प्राप्त करने के लिए धोखे के पर्याप्त संकेत मौजूद हों, वहां शिकायत की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है।

अदालत की चिंता दो अलग-अलग उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाने की है। एक तरफ वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ किसी व्यक्ति को निजी विवाद के कारण गलत तरीके से आपराधिक मुकदमे में नहीं फंसाया जाना चाहिए।

न्याय व्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कई स्तरों पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सबसे पहले यह स्पष्ट करती है कि आपसी सहमति से बने रिश्तों में दोनों वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।

दूसरा, यह फैसला जांच एजेंसियों और निचली अदालतों के सामने यह सवाल रखता है कि किसी रिश्ते के समाप्त होने के बाद दर्ज शिकायतों का मूल्यांकन करते समय पूरी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए।

तीसरा, यह निर्णय वास्तविक यौन अपराधों और आपसी सहमति से बने लेकिन बाद में समाप्त हुए रिश्तों के बीच कानूनी अंतर समझने में मदद करता है।

इससे यह भी संदेश मिलता है कि कानून का उद्देश्य किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर न्याय सुनिश्चित करना है।

समाज में बढ़ेगी कानूनी जागरूकता की जरूरत

आज के समय में व्यक्तिगत रिश्तों, विवाह, सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े विवादों को लेकर कानूनी जागरूकता बेहद जरूरी हो गई है। किसी भी रिश्ते में सहमति का महत्व है और किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

साथ ही, किसी भी व्यक्ति को धोखे, दबाव या जबरदस्ती के माध्यम से दूसरे की स्वतंत्रता का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है। इसलिए रिश्तों में पारदर्शिता, ईमानदारी और एक-दूसरे की इच्छा का सम्मान करना आवश्यक है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में किसी एक घटना या रिश्ते के अंतिम परिणाम के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: सहमति, स्वतंत्रता और न्याय के बीच संतुलन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल निजी विवादों को सुलझाने या बदला लेने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध केवल रिश्ता समाप्त होने के कारण पिछली तारीख से दुष्कर्म नहीं बन जाते।

हालांकि, जहां शुरुआत से धोखे, जबरदस्ती या वास्तविक यौन हिंसा के तथ्य मौजूद हों, वहां कानून के तहत उचित कार्रवाई होनी चाहिए।

इस फैसले का व्यापक संदेश यही है कि न्याय व्यवस्था को शिकायतकर्ता की गरिमा और आरोपी के कानूनी अधिकारों, दोनों की रक्षा करनी चाहिए। निष्पक्ष जांच, ठोस साक्ष्य और कानून की सही व्याख्या ही किसी भी मामले में न्याय सुनिश्चित करने का सबसे मजबूत आधार है।

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