एल-नीनो के संभावित असर पर केंद्र सरकार सतर्क: कम वर्षा और सूखे की चुनौती से निपटने के लिए तैयार की व्यापक रणनीति

नई दिल्ली: देश के कई हिस्सों में मानसून की कमजोर प्रगति और सामान्य से कम वर्षा के बीच केंद्र सरकार ने संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। एल-नीनो के प्रभाव को देखते हुए केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर संबंधित मंत्रालयों और राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। बैठक का उद्देश्य जल उपलब्धता, कृषि उत्पादन, बिजली आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को संभावित संकट से सुरक्षित रखना था।
एल-नीनो क्या है और इसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
एल-नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। ऐसे वर्षों में वर्षा सामान्य से कम हो सकती है, जिससे खेती, जलाशयों का जलस्तर, पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।
इस वर्ष जून माह में देश के कई क्षेत्रों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई, जिससे खरीफ फसलों की बुआई और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ी है। विशेष रूप से मध्य भारत के अनेक हिस्सों में वर्षा की कमी अधिक देखने को मिली है।
सरकार ने दिए कई अहम निर्देश
समीक्षा बैठक में स्पष्ट किया गया कि केंद्र सरकार पूरे मानसून सीजन के दौरान मौसम की स्थिति और जल उपलब्धता पर लगातार निगरानी रखेगी। गृह मंत्री ने जल शक्ति मंत्रालय को सभी प्रमुख जलाशयों, बांधों और भूजल स्तर की नियमित समीक्षा करने तथा आवश्यकता पड़ने पर समय रहते आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।
कृषि मंत्रालय को राज्यों के साथ समन्वय बनाकर किसानों तक वैज्ञानिक सलाह पहुंचाने और मौसम के अनुरूप फसल चयन की जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है, ताकि कम वर्षा की स्थिति में भी कृषि उत्पादन पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
कम पानी वाली फसलों पर विशेष जोर
बैठक में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि जिन क्षेत्रों में वर्षा कम है, वहां किसानों को कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जाए। मोटे अनाज (मिलेट्स), दालें, तिलहन और चारा फसलों जैसी वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई जा रही है। इससे किसानों का जोखिम कम होगा और जल संसाधनों का भी बेहतर उपयोग हो सकेगा।
सिंचाई के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति
कम वर्षा के दौरान सिंचाई की आवश्यकता बढ़ जाती है। इसे देखते हुए बिजली मंत्रालय को निर्देश दिए गए हैं कि किसानों को पर्याप्त और निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जाए, ताकि सिंचाई कार्य प्रभावित न हो और फसलों को आवश्यक पानी समय पर मिल सके।
खाद्य सुरक्षा पर सरकार का भरोसा
समीक्षा बैठक में यह भी बताया गया कि देश में चावल और गेहूं का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। आवश्यक खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों की नियमित निगरानी की जा रही है, ताकि किसी भी स्थिति में आम नागरिकों पर खाद्य संकट या महंगाई का अतिरिक्त बोझ न पड़े।
प्रभावित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान
जहां एक ओर मध्य भारत के कई हिस्सों में कम वर्षा चिंता का कारण बनी हुई है, वहीं पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन जैसी समस्याएं सामने आई हैं। इन क्षेत्रों में नुकसान का आकलन करने और राहत कार्यों में सहायता के लिए अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम भेजने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।
दीर्घकालिक रणनीति पर भी फोकस
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते जलवायु परिदृश्य को देखते हुए केवल तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। इसलिए सरकार जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई, भूजल पुनर्भरण और फसल विविधीकरण जैसी दीर्घकालिक रणनीतियों पर भी विशेष जोर दे रही है। इसके साथ ही पशुपालन और चारा उत्पादन को बढ़ावा देकर किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।
निष्कर्ष
एल-नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने समय रहते व्यापक तैयारी शुरू कर दी है। जल संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन, किसानों को वैज्ञानिक सलाह, वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा, सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे कदम संभावित सूखे की चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि केंद्र और राज्य सरकारें समन्वय के साथ इन योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करती हैं, तो कृषि और आम जनजीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
