प्रशांत देशों ने चीन के मिसाइल परीक्षण पर जताई चिंता, पारदर्शिता और पूर्व सूचना की मांग
कोरॉर/पलाऊ। प्रशांत महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और रणनीतिक स्थिरता को लेकर चिंता एक बार फिर सामने आई है। पैसिफिक आइलैंड्स फोरम (PIF) की 2026 की बैठक में अधिकांश सदस्य देशों ने चीन के जुलाई में किए गए अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण को लेकर अपनी चिंता दर्ज कराई। हालांकि फोरम ने चीन का नाम लेकर सीधे निंदा नहीं की, लेकिन नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि भविष्य में ऐसे परीक्षण करने वाले देशों को क्षेत्रीय देशों को पर्याप्त जानकारी देनी चाहिए और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
पलाऊ में आयोजित नेताओं की बैठक में सामने आए रुख के अनुसार, प्रशांत क्षेत्र के देशों ने अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों के लिए कम से कम 24 घंटे पहले सूचना देने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह मांग अंतरराष्ट्रीय व्यवहार और क्षेत्रीय सुरक्षा की भावना से जुड़ी बताई गई। फोरम की चर्चा में इस बात पर विशेष ध्यान रहा कि प्रशांत महासागर में होने वाली सैन्य गतिविधियों का प्रभाव केवल परीक्षण करने वाले देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के छोटे द्वीपीय देशों की सुरक्षा और संप्रभुता से भी जुड़ सकता है।

लाई के मिसाइल परीक्षण से क्यों बढ़ी चिंता
जुलाई में चीन द्वारा किए गए मिसाइल परीक्षण ने प्रशांत क्षेत्र में नई बहस को जन्म दिया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, परीक्षण के दौरान मिसाइल का मार्ग कई प्रशांत देशों और उनके आसपास के हवाई क्षेत्र से जुड़ा था। कुछ देशों ने शिकायत की कि उन्हें इस गतिविधि के बारे में पर्याप्त समय पहले जानकारी नहीं दी गई थी।
यही कारण है कि पैसिफिक आइलैंड्स फोरम में चर्चा केवल एक सैन्य परीक्षण तक सीमित नहीं रही। इसके केंद्र में यह सवाल रहा कि प्रशांत महासागर में बड़े देशों की सैन्य गतिविधियों के दौरान छोटे द्वीपीय देशों को किस स्तर की जानकारी और आश्वासन मिलना चाहिए।
फोरम नेताओं के अनुसार, इस तरह की गतिविधियों में पारदर्शिता क्षेत्रीय विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है। उनका मानना है कि पर्याप्त पूर्व सूचना मिलने से संबंधित देश अपनी सुरक्षा व्यवस्था और नागरिक उड्डयन तथा समुद्री गतिविधियों के लिए आवश्यक सावधानियां बेहतर ढंग से अपना सकते हैं।
24 घंटे पहले सूचना देने पर जोर
पैसिफिक आइलैंड्स फोरम के नेताओं ने भविष्य में अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण करने वाले सभी देशों से कम से कम 24 घंटे पहले सूचना देने की अपील की। यह प्रावधान किसी एक देश को निशाना बनाने के बजाय सभी देशों पर समान रूप से लागू करने की भावना के साथ रखा गया है।
फोरम की भाषा में यह महत्वपूर्ण था कि बयान में चीन का नाम नहीं लिया गया। इसके बजाय सभी ऐसे देशों से पारदर्शिता और आश्वासन सुनिश्चित करने को कहा गया जो इस प्रकार के परीक्षण करते हैं। इस तरह नेताओं ने एक ओर क्षेत्रीय चिंता दर्ज की, वहीं दूसरी ओर बयान को व्यापक और सामान्य सिद्धांतों पर आधारित रखा।
यह तरीका प्रशांत द्वीपीय देशों की उस कूटनीतिक शैली को भी दर्शाता है जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक सहमति बनाने की कोशिश की जाती है, भले ही सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक हित हों।
नाउरू की असहमति ने खींचा ध्यान
बैठक में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू नाउरू का अलग रुख रहा। फोरम अध्यक्ष और पलाऊ के राष्ट्रपति सुरांगेल व्हिप्स जूनियर ने बताया कि नाउरू ने मिसाइल परीक्षण से संबंधित सामूहिक प्रावधान पर असहमति जताई।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पैसिफिक आइलैंड्स फोरम में आम तौर पर सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया को विशेष महत्व दिया जाता है। नाउरू की असहमति ने दिखाया कि चीन और प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर सभी सदस्य देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
नाउरू ने 2024 में ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध समाप्त कर चीन के साथ संबंध स्थापित किए थे। इसके बाद से उसके और बीजिंग के बीच संबंधों को लेकर क्षेत्रीय राजनीति में काफी चर्चा रही है। ऐसे में मिसाइल परीक्षण पर नाउरू का अलग रुख इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक महत्व देता है।
पहले भी बनी थी सहमति की मुश्किल स्थिति
चीन के मिसाइल परीक्षण को लेकर प्रशांत देशों के बीच मतभेद अचानक सामने नहीं आए। अगस्त में पैसिफिक आइलैंड्स फोरम के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी इस मुद्दे पर संयुक्त बयान को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी। उस समय नाउरू और किरिबाती के रुख को लेकर बातचीत आगे बढ़ाने में कठिनाई हुई थी।
इसके बाद सितंबर में नेताओं की बैठक से पहले ऑस्ट्रेलिया और पलाऊ की ओर से अधिक स्पष्ट और मजबूत बयान की मांग सामने आई। हालांकि अंतिम दस्तावेज में चीन की सीधी निंदा नहीं की गई, लेकिन परीक्षण को लेकर चिंता दर्ज करना और 24 घंटे की पूर्व सूचना की मांग करना पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट क्षेत्रीय संदेश माना गया।
पलाऊ ने अपनाया कड़ा रुख
फोरम की मेजबानी करने वाले पलाऊ ने चीन के मिसाइल परीक्षण पर सबसे मुखर प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रपति सुरांगेल व्हिप्स जूनियर ने कहा कि प्रशांत क्षेत्र को अपनी संप्रभुता, पारदर्शिता और सुरक्षा के संबंध में एकजुट आवाज रखने की आवश्यकता है।
पलाऊ उन प्रशांत देशों में शामिल है जो ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध बनाए हुए हैं। यही वजह है कि चीन और पलाऊ के बीच पहले से ही राजनीतिक मतभेद मौजूद हैं। फोरम की बैठक के दौरान चीन की ओर से ताइवान की भागीदारी पर भी आपत्ति जताई गई, जिससे सम्मेलन में क्षेत्रीय कूटनीति का मुद्दा और संवेदनशील हो गया।
चीन की प्रतिक्रिया
चीन ने मिसाइल परीक्षण को लेकर पलाऊ द्वारा उठाई गई चिंताओं पर असहमति जताई। बीजिंग ने पलाऊ पर मामले को जरूरत से ज्यादा तूल देने का आरोप लगाया और कहा कि इस तरह की कोशिशें क्षेत्रीय देशों के बीच संबंधों को प्रभावित करने में सफल नहीं होंगी।
चीन का कहना रहा है कि वह दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने तथा विकास को बढ़ावा देने के लिए संबंधित देशों के साथ सहयोग करने को तैयार है। दूसरी ओर, प्रशांत देशों की चिंता मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रही कि बड़े सैन्य परीक्षणों के दौरान उन्हें पर्याप्त जानकारी और सुरक्षा आश्वासन मिलना चाहिए।
प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
प्रशांत महासागर पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है। चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और अन्य शक्तियां इस क्षेत्र में आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।
प्रशांत द्वीपीय देशों के लिए यह स्थिति अवसरों और चुनौतियों दोनों को लेकर आती है। एक तरफ उन्हें आर्थिक सहायता, बुनियादी ढांचे, जलवायु सहयोग और विकास परियोजनाओं की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर वे नहीं चाहते कि उनका क्षेत्र बड़ी शक्तियों के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा का मैदान बने।
यही कारण है कि मिसाइल परीक्षण जैसे मामलों में छोटे देशों की प्रतिक्रिया केवल सैन्य सुरक्षा से जुड़ी नहीं होती। इसमें उनकी संप्रभुता, समुद्री अधिकार, पर्यावरण, नागरिक सुरक्षा और स्वतंत्र विदेश नीति जैसे विषय भी शामिल होते हैं।
क्षेत्रीय एकता के लिए चुनौती
नाउरू की असहमति ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या पैसिफिक आइलैंड्स फोरम भविष्य में सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दों पर एक मजबूत और सर्वसम्मत रुख कायम रख पाएगा। हालांकि अधिकांश देशों ने चिंता दर्ज कराई है, लेकिन अलग-अलग देशों के चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य साझेदारों के साथ संबंधों में अंतर मौजूद है।
इसके बावजूद, 2026 की बैठक से एक महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है—प्रशांत क्षेत्र के देश चाहते हैं कि उनकी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मामलों में उन्हें नजरअंदाज न किया जाए। 24 घंटे पहले सूचना देने की मांग इसी व्यापक सोच का हिस्सा है।
आगे क्या होगा?
भविष्य में प्रशांत क्षेत्र में बड़े सैन्य परीक्षण होने पर पूर्व सूचना और पारदर्शिता का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि क्षेत्रीय देश इस सिद्धांत को लगातार आगे बढ़ाते हैं, तो इससे सैन्य गतिविधियों को लेकर गलतफहमी और तनाव कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि बड़े देश ऐसी क्षेत्रीय मांगों को किस हद तक स्वीकार करते हैं। साथ ही पैसिफिक आइलैंड्स फोरम को अपने सदस्य देशों के बीच मौजूद मतभेदों को भी संभालना होगा।
2026 की बैठक का परिणाम इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि फोरम ने चीन का नाम लिए बिना मिसाइल परीक्षण को लेकर सामूहिक चिंता दर्ज की और भविष्य में पूर्व सूचना तथा पारदर्शिता की आवश्यकता को स्पष्ट किया। नाउरू की असहमति ने यह जरूर दिखाया कि क्षेत्रीय एकता के बावजूद प्रशांत देशों की विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर मौजूद है।
निष्कर्ष
चीन के मिसाइल परीक्षण पर पैसिफिक आइलैंड्स फोरम की प्रतिक्रिया प्रशांत क्षेत्र में बदलते सुरक्षा माहौल का संकेत देती है। अधिकांश देशों ने सीधे टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय पारदर्शिता, पूर्व सूचना और क्षेत्रीय संप्रभुता पर जोर दिया। कम से कम 24 घंटे पहले सूचना देने की मांग को भविष्य की सैन्य गतिविधियों में विश्वास बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
वहीं, नाउरू की असहमति बताती है कि प्रशांत क्षेत्र की राजनीति में चीन के बढ़ते प्रभाव और अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय हितों के कारण सामूहिक निर्णय लेना आसान नहीं होगा। आने वाले समय में यह मुद्दा इस बात की परीक्षा भी होगा कि पैसिफिक आइलैंड्स फोरम क्षेत्रीय सुरक्षा और बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी स्वतंत्र और सामूहिक आवाज को कितना मजबूत रख पाता है।