फ़रवरी 18, 2026

10 वर्ष: किसानों के विश्वास और सुरक्षा की मजबूत ढाल

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भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि केवल एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की जीवनरेखा है। लेकिन यह क्षेत्र हमेशा मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों की अनिश्चितता से प्रभावित रहा है। कभी सूखे की मार, तो कभी बाढ़ और ओलावृष्टि—ऐसी चुनौतियाँ किसानों की महीनों की मेहनत को क्षणभर में नष्ट कर देती हैं। इन्हीं जोखिमों से किसानों को सुरक्षा देने के उद्देश्य से 18 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की गई थी। आज इस महत्वाकांक्षी योजना को दस वर्ष पूरे हो चुके हैं और यह देश के कृषि क्षेत्र में स्थिरता का आधार स्तंभ बनकर उभरी है।


योजना की मूल भावना

इस योजना का केंद्रीय लक्ष्य किसानों को सुलभ और किफायती फसल बीमा उपलब्ध कराना है, ताकि प्राकृतिक आपदाओं या अन्य जोखिमों से होने वाली क्षति की भरपाई की जा सके। इसके माध्यम से सरकार ने कृषि को कम जोखिम वाला और अधिक सुरक्षित व्यवसाय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

मुख्य उद्देश्यों में शामिल हैं:

  • न्यूनतम प्रीमियम पर व्यापक बीमा कवरेज देना।
  • फसल हानि की स्थिति में त्वरित आर्थिक सहायता सुनिश्चित करना।
  • किसानों की आय को स्थिर रखने में मदद करना।
  • कृषि क्षेत्र में निवेश और आधुनिक तकनीकों को प्रोत्साहित करना।

व्यापक कवरेज और राहत

योजना के तहत किसानों को कई प्रकार के जोखिमों से सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसमें बुवाई से लेकर कटाई के बाद तक की अवधि शामिल है।

जोखिमों का दायरा

  • प्रतिकूल मौसम के कारण बुवाई न हो पाना।
  • खड़ी फसल को प्राकृतिक आपदा, कीट या रोग से नुकसान।
  • कटाई के बाद अचानक आई आपदा से हानि।
  • स्थानीय आपदाएँ जैसे ओलावृष्टि या जलभराव।

किसानों के लिए प्रीमियम दरें बेहद कम और निश्चित रखी गई हैं, जबकि शेष राशि केंद्र और राज्य सरकारें साझा रूप से वहन करती हैं। इससे छोटे और सीमांत किसानों पर आर्थिक बोझ कम होता है।


दस वर्षों की प्रमुख उपलब्धियाँ (2016–2025)

पिछले एक दशक में इस योजना ने उल्लेखनीय प्रभाव डाला है:

  • लगभग 78.41 करोड़ किसान आवेदनों को बीमा संरक्षण मिला।
  • किसानों को ₹1.83 लाख करोड़ से अधिक का दावा भुगतान किया गया।
  • किसान नामांकन में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई—
    • 2022–23 में 3.17 करोड़ किसान
    • 2024–25 में 4.19 करोड़ किसान
  • गैर-ऋणी किसानों की भागीदारी में बड़ी बढ़ोतरी—
    • 2014–15 में लगभग 20 लाख
    • 2024–25 में 522 लाख से अधिक

ये आँकड़े दर्शाते हैं कि योजना पर किसानों का भरोसा लगातार बढ़ा है।


ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

इस पहल ने न केवल किसानों को आपदा के समय राहत दी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की। जब नुकसान की भरपाई समय पर होती है, तो किसान अगली फसल के लिए तैयार हो पाते हैं। इससे कर्ज पर निर्भरता घटती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

छोटे और सीमांत किसानों को भी बराबरी का अवसर मिला है, जिससे सामाजिक-आर्थिक संतुलन बेहतर हुआ है। इसके अलावा, बीमा सुरक्षा से कृषि में निवेश की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई है।


सुधार की संभावनाएँ

हालाँकि योजना ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, फिर भी कुछ क्षेत्रों में सुधार की जरूरत महसूस की जाती है:

  • ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान को और सशक्त करना।
  • दावा निपटान प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी व त्वरित बनाना।
  • ड्रोन, सैटेलाइट डेटा और डिजिटल तकनीकों का व्यापक उपयोग कर नुकसान आकलन को सटीक बनाना।

यदि इन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो योजना की प्रभावशीलता और बढ़ सकती है।


समापन विचार

दस वर्षों का सफर तय कर चुकी यह योजना अब केवल बीमा कार्यक्रम नहीं, बल्कि किसानों के लिए भरोसे का प्रतीक बन गई है। प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी खेती को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने में इसका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। भविष्य में पारदर्शिता, तकनीकी नवाचार और व्यापक जन-जागरूकता के साथ यह योजना भारतीय कृषि को और सशक्त बनाने की दिशा में नए आयाम स्थापित कर सकती है।

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