मार्च 30, 2026

दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: विदेश में बंद भारतीय नागरिक के अधिकारों पर बड़ा आदेश

0

दिल्ली हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त मेजर विक्रांत जेटली के मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया है। विक्रांत जेटली बीते लगभग डेढ़ वर्ष से अबू धाबी (यूएई) में हिरासत में हैं। अदालत ने मंत्रालय को निर्देशित किया है कि भारतीय दूतावास के माध्यम से उनसे संपर्क कर उन्हें पावर ऑफ अटॉर्नी पर हस्ताक्षर कराने की प्रक्रिया में सहायता दी जाए, जिससे वे अपनी पसंद की विधिक सहायता प्राप्त कर सकें।

याचिका की पृष्ठभूमि

इस मामले की सुनवाई तब शुरू हुई जब अभिनेत्री सेलीना जेटली ने अपने भाई के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना है कि विक्रांत को प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर, विक्रांत की पत्नी चारुल जेटली ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने दावा किया कि वैवाहिक संबंधों के आधार पर वही अधिकृत पक्ष हैं जिन्हें उनके पति के लिए वकील तय करने का अधिकार है।

अदालत ने इस दावे को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पक्ष को सीलबंद लिफाफे में विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई की तिथि निर्धारित की।

अदालत की स्पष्ट दृष्टि

न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने टिप्पणी की कि यह केवल पारिवारिक असहमति का मामला नहीं है, बल्कि विदेश में बंद एक भारतीय नागरिक के विधिक अधिकारों का प्रश्न है। अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर विक्रांत की कानूनी सहायता सुनिश्चित करने का आह्वान किया।

साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि विक्रांत नामित लॉ फर्म की सेवाएं नहीं लेना चाहते, तो उन्हें अन्य विधिक प्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। अदालत का यह रुख व्यक्ति की स्वायत्तता और न्याय तक पहुंच के सिद्धांत को रेखांकित करता है।

विदेश मंत्रालय की स्थिति

सुनवाई के दौरान विदेश मंत्रालय ने अवगत कराया कि भारत-यूएई के बीच मौजूद कानूनी सहायता संधि में इस प्रकार की परिस्थितियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। हालांकि, भारतीय मिशन ने स्थानीय प्रशासन से कांसुलर पहुंच देने का अनुरोध किया है।

हाईकोर्ट ने मंत्रालय को कानून एवं न्याय मंत्रालय के साथ परामर्श कर संबंधित संधि प्रावधानों की समीक्षा करने और आवश्यक वैधानिक कदम उठाने का निर्देश दिया है।

व्यापक परिप्रेक्ष्य

यह प्रकरण केवल एक व्यक्ति के मुकदमे तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न को सामने लाता है कि विदेशों में मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे भारतीय नागरिकों को किस स्तर की संस्थागत सहायता मिलनी चाहिए। न्यायालय का हस्तक्षेप इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है कि नागरिकों के अधिकार सीमाओं से परे भी संरक्षित रहने चाहिए।

यदि यह मामला स्पष्ट प्रक्रिया और प्रोटोकॉल के निर्माण की ओर ले जाता है, तो भविष्य में ऐसे मामलों में भारतीय नागरिकों को समयबद्ध और प्रभावी समर्थन मिल सकता है।


प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *