यूएन महासभा का यूक्रेन शांति प्रस्ताव: समर्थन की गूंज, मतभेदों की तस्वीर

24 फरवरी 2026 को में रूस-यूक्रेन युद्ध की चौथी वर्षगांठ के अवसर पर “Support for Lasting Peace in Ukraine” शीर्षक से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुआ। यह पहल वैश्विक स्तर पर शांति की अपील और कूटनीतिक ध्रुवीकरण—दोनों का संकेत देती है।
मतदान का आँकड़ा
- समर्थन में: 107 देश
- विरोध में: 12 देश
- मतदान से विरत (Abstain): 51 देश
रूस और उसके करीबी सहयोगियों ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि यूरोप और कई एशिया-प्रशांत देशों ने इसका समर्थन किया। कुछ प्रमुख देशों ने तटस्थ रुख अपनाया, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलता को उजागर किया।
प्रस्ताव में क्या कहा गया?
इस प्रस्ताव का केंद्र बिंदु युद्ध को तुरंत रोकने और स्थायी समाधान की दिशा में बढ़ने की अपील है। मुख्य बिंदु निम्न रहे:
- तत्काल, व्यापक और बिना शर्त संघर्षविराम की मांग
- यूक्रेन की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर जोर
- युद्धबंदियों की सुरक्षित अदला-बदली
- हिरासत में लिए गए नागरिकों की रिहाई
- अंतरराष्ट्रीय कानून और यूएन चार्टर के अनुरूप शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना
वैश्विक परिप्रेक्ष्य: समर्थन और संकोच
107 देशों का समर्थन इस बात का संकेत है कि विश्व समुदाय का एक बड़ा हिस्सा युद्ध को समाप्त करने के पक्ष में है। वहीं 51 देशों का मतदान से दूर रहना यह दर्शाता है कि कई राष्ट्र प्रत्यक्ष पक्ष लेने से बचना चाहते हैं।
कुछ देशों का तर्क है कि संवाद और संतुलित कूटनीति ही दीर्घकालीन समाधान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। दूसरी ओर, प्रस्ताव के समर्थक इसे नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम मानते हैं।
भारत का रुख
ने इस प्रस्ताव पर मतदान से दूरी बनाई। यह रुख उसकी बहुपक्षीय, संतुलित विदेश नीति के अनुरूप माना जा रहा है। भारत लगातार वार्ता, कूटनीतिक समाधान और शांति प्रयासों का समर्थन करता रहा है, जबकि किसी एक पक्ष के साथ औपचारिक रूप से खड़े होने से बचता है।
व्यापक प्रभाव
यह प्रस्ताव प्रतीकात्मक रूप से यूक्रेन के लिए एक कूटनीतिक उपलब्धि माना जा सकता है। हालांकि, वास्तविक युद्धविराम और स्थायी शांति का मार्ग केवल प्रस्ताव पारित होने से नहीं, बल्कि जमीन पर उठाए जाने वाले ठोस कदमों से तय होगा।
समर्थन, विरोध और तटस्थता—तीनों का यह मिश्रण बताता है कि वैश्विक राजनीति अभी भी जटिल समीकरणों से संचालित हो रही है। फिर भी, महासभा में उठी शांति की आवाज़ इस संघर्ष के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश अवश्य देती है।
