ईरान परमाणु समझौता, अमेरिकी सियासत और नैन्सी पेलेसी की तीखी प्रतिक्रिया

अमेरिका की घरेलू राजनीति में ईरान के साथ हुआ परमाणु समझौता लंबे समय से वैचारिक टकराव का केंद्र रहा है। इसी संदर्भ में अमेरिका की पूर्व हाउस स्पीकर ने हाल में एक बयान के जरिए इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति की कूटनीतिक पहल की प्रशंसा करते हुए के फैसले की आलोचना की।
ओबामा युग और कूटनीतिक समझौता
साल 2015 में अमेरिका, ईरान और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे (JCPOA) कहा जाता है। इस समझौते का लक्ष्य था ईरान की परमाणु गतिविधियों पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण सुनिश्चित करना, ताकि वह परमाणु हथियार विकसित न कर सके।
ओबामा प्रशासन ने इसे बहुपक्षीय कूटनीति की बड़ी सफलता बताया। समझौते में यूरोपीय देशों के साथ-साथ चीन और रूस का समर्थन भी शामिल था। इसके तहत ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई, बदले में उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करनी पड़ी।
ट्रम्प प्रशासन की नीति में बदलाव
साल 2018 में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिका को इस समझौते से अलग करने की घोषणा की। उनका तर्क था कि यह समझौता अधूरा और कमजोर है, क्योंकि यह ईरान की मिसाइल परियोजनाओं और क्षेत्रीय गतिविधियों पर पर्याप्त रोक नहीं लगाता।
समझौते से हटने के बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा और मध्य-पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता के संकेत तेज हो गए।
पेलेसी का बयान और राजनीतिक संदेश
नैन्सी पेलेसी ने अपने बयान में कहा कि ओबामा ने संवाद और सहयोग के माध्यम से एक संभावित खतरे को कूटनीति से नियंत्रित किया था। उनके अनुसार, ट्रम्प प्रशासन द्वारा समझौता समाप्त करने से संघर्ष की संभावनाएँ बढ़ीं और अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय साख को भी नुकसान पहुंचा।
पेलेसी का यह दृष्टिकोण डेमोक्रेटिक पार्टी की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग को प्राथमिकता दी जाती है। वहीं रिपब्लिकन नेतृत्व अक्सर सख्त रुख और दबाव की नीति को अधिक प्रभावी मानता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
JCPOA से अमेरिकी अलगाव के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम के कुछ प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा की। इससे पश्चिम एशिया में सुरक्षा चिंताएँ बढ़ीं। इज़राइल और खाड़ी देशों ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई।
यह विवाद केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के संतुलन से भी जुड़ा है।
निष्कर्ष
ईरान परमाणु समझौते को लेकर उठी बहस अमेरिकी राजनीति के भीतर मौजूद गहरी वैचारिक खाई को उजागर करती है। एक पक्ष संवाद और समझौतों के जरिए समाधान खोजने में विश्वास रखता है, जबकि दूसरा पक्ष कठोर रणनीति को अधिक प्रभावी मानता है।
नैन्सी पेलेसी की ताजा टिप्पणी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने में कूटनीति कितनी प्रभावी है और शक्ति-प्रदर्शन की नीति कितनी कारगर। आने वाले वर्षों में इस मुद्दे की दिशा अमेरिका की विदेश नीति और मध्य-पूर्व की स्थिरता दोनों पर असर डाल सकती है।
