मार्च 11, 2026

लंबित मुकदमे के शीघ्र निपटारे पर हाईकोर्ट का रुख: अनुच्छेद 227 के तहत याचिका खारिज

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प्रस्तावना

न्यायालयों में मामलों की लंबित संख्या को देखते हुए कई बार पक्षकार उच्च न्यायालय से अपने मुकदमे के त्वरित निपटारे के लिए आदेश की मांग करते हैं। इसी संदर्भ में नवी हसन बनाम श्रीमती विनेश देवी एवं अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया, जिसमें अदालत ने निचली अदालत को निश्चित समय में मुकदमे का फैसला करने का निर्देश देने से इंकार कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उस याचिका से संबंधित था जिसे याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दाखिल किया था। याचिका में यह प्रार्थना की गई थी कि एटा स्थित अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन) की अदालत में लंबित मूल वाद संख्या 235/2020 का निर्णय एक निर्धारित अवधि के भीतर किया जाए।

रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि उक्त दीवानी मुकदमा वर्ष 2020 से लंबित है और इस दौरान कई बार सुनवाई की तिथियां निर्धारित की जा चुकी हैं।

याचिकाकर्ता की मांग

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत से अनुरोध किया गया कि वह निचली अदालत को आदेश दे कि वह इस मामले का निस्तारण एक तय समयसीमा के भीतर कर दे, ताकि लंबित मुकदमे का शीघ्र समाधान हो सके।

हाईकोर्ट का विचार

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने पूर्व में दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला दिया। अदालत ने अली शाद उस्मानी बनाम अली इस्तबा (2015) मामले में डिवीजन बेंच के निर्णय को आधार बनाया।

उस निर्णय में स्पष्ट किया गया था कि केवल मुकदमे की सुनवाई को तेज करने के उद्देश्य से उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका दाखिल करना उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि हर मामले में इस प्रकार के आदेश दिए जाने लगें, तो इससे न्यायालयों में आने वाले कुछ पक्षकारों को विशेष प्राथमिकता मिल जाएगी। इससे अन्य पुराने और गंभीर मामलों की अनदेखी होने की संभावना पैदा हो सकती है।

अदालत ने यह भी कहा कि सभी वादी उच्च न्यायालय तक पहुंचने में सक्षम नहीं होते। इसलिए ऐसे आदेशों से न्यायिक व्यवस्था में असमानता पैदा हो सकती है।

साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले की त्वरित सुनवाई की आवश्यकता है या नहीं, यह निर्णय संबंधित ट्रायल कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है।

विशेष परिस्थितियों पर टिप्पणी

न्यायालय ने यह भी कहा कि कई मामलों में वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांग व्यक्तियों या सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे मामलों में सुनवाई की गति बढ़ाने का निर्णय ट्रायल जज स्वयं परिस्थितियों को देखकर ले सकते हैं।

न्यायालय का अंतिम आदेश

इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और उसे इस स्तर पर निस्तारित कर दिया।

हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह अपने मुकदमे के शीघ्र निपटारे के लिए संबंधित निचली अदालत में उचित आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। यदि ऐसा आवेदन किया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार उस पर विचार करते हुए उचित आदेश पारित करेगा।

निष्कर्ष

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि उच्च न्यायालय सामान्य परिस्थितियों में निचली अदालतों को किसी मुकदमे के निपटारे के लिए निश्चित समय सीमा तय करने का निर्देश नहीं देता। न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन और समानता बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया जाता है।


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