अप्रैल 15, 2026

वर्ष 1932 भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण कालखंड का प्रतीक है, जब देश स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ सामाजिक और शैक्षिक जागरण के दौर से गुजर रहा था। इसी समय गोरखपुर की पावन धरती पर तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर, युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने “महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद” की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल की।

0

महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज केवल एक धार्मिक संत ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी समाज सुधारक और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने यह भली-भांति समझ लिया था कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति का मूल आधार शिक्षा होती है। उस समय पूर्वांचल क्षेत्र शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ था, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के संसाधनों की भारी कमी थी। ऐसे में उन्होंने समाज के हर वर्ग तक शिक्षा पहुंचाने के उद्देश्य से इस परिषद की स्थापना की।

सांकेतिक तस्वीर

“महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद” का नाम महान वीर योद्धा महाराणा प्रताप के नाम पर रखा गया, जो त्याग, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक हैं। इस नाम के पीछे उद्देश्य था कि विद्यार्थियों में भी वही साहस, आत्मसम्मान और देशभक्ति की भावना विकसित हो। परिषद ने प्रारंभ में छोटे स्तर से अपनी यात्रा शुरू की, लेकिन इसके उद्देश्यों की पवित्रता और समर्पण की भावना ने इसे जल्द ही एक विशाल शैक्षिक आंदोलन का रूप दे दिया।

समय के साथ परिषद के अंतर्गत अनेक विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए। इन संस्थानों ने न केवल गोरखपुर, बल्कि पूरे पूर्वांचल क्षेत्र में शिक्षा का व्यापक प्रसार किया। यहां विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रप्रेम की शिक्षा भी दी जाती रही है।

परिषद की विशेषता यह रही कि उसने समाज के हर वर्ग—गरीब, पिछड़े और वंचित लोगों—को शिक्षा का अवसर प्रदान किया। इससे हजारों-लाखों विद्यार्थियों का जीवन संवर गया और वे समाज में एक सशक्त और जागरूक नागरिक के रूप में उभरे। परिषद के संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर अनेक छात्र-छात्राएं विभिन्न क्षेत्रों में देश और समाज की सेवा कर रहे हैं।

आज “महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद” एक विशाल वटवृक्ष के रूप में स्थापित हो चुकी है, जिसके अंतर्गत दर्जनों शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं। यह परिषद न केवल शिक्षा प्रदान कर रही है, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य भी निरंतर कर रही है।

अंततः कहा जा सकता है कि महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज द्वारा वर्ष 1932 में स्थापित यह परिषद केवल एक शैक्षिक संस्था नहीं, बल्कि एक महान सामाजिक आंदोलन है, जिसने पूर्वांचल की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका यह योगदान सदैव स्मरणीय और प्रेरणादायक रहेगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *