बस्ती में महिला कांस्टेबल केसरी वर्मा की मौत से मचा हड़कंप, पति ने लगाया लापरवाही का आरोप, पुलिस ने दी सफाई
बस्ती, उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में महिला पुलिस कांस्टेबल केसरी वर्मा की मौत के बाद पुलिस महकमे में शोक के साथ-साथ गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं। केसरी वर्मा की मौत के बाद उनके पति और सहकर्मी कांस्टेबल नागेंद्र वर्मा ने विभागीय स्तर पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और एफआईआर की मांग की है। वहीं, पुलिस अधिकारियों की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि चिकित्सकीय अवकाश लेने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील बन गया है क्योंकि मृतका और उनके पति दोनों पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत बताए जा रहे हैं। पति का आरोप है कि यदि समय रहते उनकी पत्नी को बेहतर चिकित्सकीय उपचार के लिए छुट्टी मिल जाती और विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच बनाई जाती, तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

हादसे के बाद घायल हुई थीं केसरी वर्मा
जानकारी के अनुसार केसरी वर्मा छुट्टी से वापस लौटते समय एक हादसे का शिकार हो गई थीं। दुर्घटना में उनके सिर पर गंभीर चोट लगी थी। प्रारंभिक स्तर पर उनका इलाज कराया गया। उपचार के बाद उन्होंने दोबारा अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली।
परिवार की चिंता इस बात को लेकर बनी रही कि सिर की चोट सामान्य नहीं थी। बताया जा रहा है कि उनके पास चिकित्सकीय जांच से संबंधित दस्तावेज और सीटी स्कैन की रिपोर्ट भी थी। इसके बावजूद वह विभागीय जिम्मेदारी निभाने के लिए ड्यूटी पर लौट आईं।
बाद में उनकी तबीयत बिगड़ने की स्थिति ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। इसी दौरान उनके पति नागेंद्र वर्मा ने पत्नी के लिए आपातकालीन छुट्टी की मांग किए जाने का दावा किया।
पति ने 27 अगस्त की घटना को लेकर उठाए सवाल
नागेंद्र वर्मा के अनुसार उन्होंने 27 अगस्त को अपनी पत्नी की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए आपातकालीन अवकाश की मांग की थी। उनका कहना है कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों के समक्ष मेडिकल रिपोर्ट और सीटी स्कैन जैसी चिकित्सकीय जानकारी भी प्रस्तुत की थी।
पति का आरोप है कि उन्होंने अधिकारियों को यह समझाने की कोशिश की कि केसरी की स्थिति सामान्य नहीं है और उन्हें तत्काल बेहतर उपचार की आवश्यकता है। नागेंद्र के मुताबिक, इसके बावजूद उन्हें तत्काल छुट्टी देने के बजाय निर्धारित मेडिकल लीव प्रक्रिया अपनाने की बात कही गई।
यही वह बिंदु है जिसको लेकर अब सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। पति का दावा है कि बीमारी की गंभीरता को देखते हुए प्रक्रिया से अधिक प्राथमिकता तत्काल चिकित्सा सुविधा को मिलनी चाहिए थी।
विशेषज्ञ उपचार में देरी को लेकर पति का आरोप
नागेंद्र वर्मा का कहना है कि उनकी पत्नी को ऐसी चिकित्सा सहायता की आवश्यकता थी, जो स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध नहीं थी। उनका आरोप है कि छुट्टी और उपचार को लेकर हुई कथित देरी के कारण केसरी को समय पर विशेषज्ञ चिकित्सकीय देखभाल नहीं मिल सकी।
हालांकि, यह कहना कि कथित प्रशासनिक देरी ही मौत का प्रत्यक्ष कारण बनी, अभी जांच का विषय है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए चिकित्सकीय रिपोर्ट, अस्पताल के रिकॉर्ड, छुट्टी के आवेदन, अधिकारियों के निर्देश और घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि केसरी वर्मा की स्वास्थ्य स्थिति के बारे में विभाग को कितनी जानकारी थी और उन्हें चिकित्सा अवकाश देने अथवा उपचार के लिए भेजने के संबंध में क्या कदम उठाए गए थे।
अस्पताल में पति ने मांगा न्याय
केसरी वर्मा की मौत के बाद अस्पताल में उनके पति नागेंद्र वर्मा बेहद भावुक नजर आए। उन्होंने कथित तौर पर उन अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की, जिन्हें वह अपनी पत्नी की स्थिति के लिए जिम्मेदार मानते हैं।
नागेंद्र का कहना था कि जब तक उनकी शिकायत पर उचित कार्रवाई नहीं होती, तब तक वह पोस्टमार्टम की प्रक्रिया को लेकर सहमति नहीं देंगे। उनकी मांग थी कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
एक पुलिसकर्मी की मौत के बाद उसके ही सहकर्मी पति द्वारा विभाग के भीतर कथित लापरवाही का आरोप लगाए जाने से मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।
पुलिस विभाग ने आरोपों से किया इनकार
दूसरी ओर, पुलिस अधिकारियों ने नागेंद्र वर्मा के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि केसरी वर्मा के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार चिकित्सकीय अवकाश नहीं लिया गया था।
अधिकारियों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी को स्वास्थ्य संबंधी समस्या है तो उसे नियमानुसार मेडिकल लीव की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। पुलिस पक्ष के अनुसार, दंपती के पास स्थानीय जिला अस्पताल में उपचार कराने का विकल्प भी मौजूद था।
पुलिस अधिकारियों का यह भी दावा है कि समय पर जिला अस्पताल में उपचार की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन उसका उपयोग समय रहते नहीं किया गया। विभाग के मुताबिक, इसलिए पूरी घटना के लिए पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
जांच से ही सामने आएगी सच्चाई
फिलहाल केसरी वर्मा की मौत को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। एक तरफ उनके पति का कहना है कि उन्होंने समय रहते चिकित्सा अवकाश और उपचार की आवश्यकता बताई थी, लेकिन कथित तौर पर उन्हें प्रक्रिया के नाम पर राहत नहीं मिली। दूसरी तरफ पुलिस विभाग का कहना है कि निर्धारित मेडिकल लीव प्रक्रिया पूरी नहीं की गई और उपचार के लिए उपलब्ध सरकारी चिकित्सा सुविधा का समय पर इस्तेमाल नहीं हुआ।
ऐसे में निष्पक्ष जांच इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन गई है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि छुट्टी के लिए वास्तव में कौन-सा आवेदन दिया गया था, उसमें कौन-कौन से मेडिकल दस्तावेज संलग्न थे, संबंधित अधिकारियों ने उस पर क्या कार्रवाई की, केसरी वर्मा की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति क्या थी और उपचार में किसी स्तर पर देरी हुई या नहीं।
इसके अलावा अस्पताल के रिकॉर्ड और चिकित्सकों की राय भी महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने के लिए विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट हो सकेगी।
पुलिस महकमे में उठे संवेदनशील सवाल
केसरी वर्मा की मौत ने पुलिस कर्मचारियों के स्वास्थ्य और आपातकालीन चिकित्सा अवकाश से जुड़े मुद्दों को भी चर्चा में ला दिया है। पुलिसकर्मी अक्सर कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक ड्यूटी करते हैं। ऐसे में गंभीर बीमारी या चोट की स्थिति में समय पर चिकित्सा सुविधा और आवश्यक अवकाश उपलब्ध होना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस घटना के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे किसी पुलिसकर्मी के मामले में आपात स्थिति की पहचान करने और तत्काल चिकित्सकीय सहायता सुनिश्चित करने के लिए विभागीय व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
फिलहाल केसरी वर्मा के परिवार के लिए यह बेहद दुखद समय है। उनकी मौत ने परिवार और पुलिस विभाग दोनों को झकझोर दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी तय होती है।
नोट: इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोप संबंधित पक्ष के दावे के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। उनकी स्वतंत्र पुष्टि जांच और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही मानी जानी चाहिए।