दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास छात्रों की सुरक्षा पर सवाल, महंगे पीजी में भी सुविधाओं का अभाव

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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास रहने वाले छात्रों के लिए किराए के निजी हॉस्टल और पीजी (पेइंग गेस्ट) आवास लंबे समय से मजबूरी का विकल्प बने हुए हैं। महंगी फीस और सीमित सुविधाओं के बावजूद बड़ी संख्या में विद्यार्थी ऐसे भवनों में रहने को मजबूर हैं, जहां सुरक्षा व्यवस्था, रहने की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सत्य निकेतन में इमारत ढहने जैसी घटना ने एक बार फिर छात्र आवासों की सुरक्षा और सरकारी निगरानी की व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है।

छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर के आसपास बड़ी संख्या में निजी हॉस्टल और पीजी संचालित होते हैं, लेकिन इन भवनों की नियमित जांच को लेकर उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं है। कई विद्यार्थियों ने दावा किया कि उन्होंने अपने रहने वाले इलाकों में नगर निगम के अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण होते हुए नहीं देखा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और अन्य आवश्यक मानकों की निगरानी किस स्तर पर हो रही है।

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महंगा किराया, लेकिन सुविधाएं सीमित

दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास रहने की सबसे बड़ी समस्या बढ़ता किराया है। छात्रों के अनुसार, कई निजी हॉस्टल और पीजी में एक बिस्तर के लिए लगभग 13 हजार से 15 हजार रुपये प्रति माह तक खर्च करना पड़ सकता है। यह रकम कई विद्यार्थियों और उनके परिवारों के लिए काफी अधिक है।

इसके बावजूद किराए के अनुरूप सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। छात्रों ने कमरे में पर्याप्त हवा का आवागमन नहीं होने, प्राकृतिक रोशनी की कमी और धूप नहीं आने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया है। कुछ जगहों पर कमरे छोटे होने के कारण कई विद्यार्थियों को सीमित जगह में रहना पड़ता है।

छात्रों का कहना है कि सिर्फ किराया अधिक होना ही समस्या नहीं है। असली चिंता तब बढ़ जाती है जब महंगे आवास में रहने के बाद भी सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की गारंटी स्पष्ट नहीं होती। विद्यार्थियों को उम्मीद होती है कि जिस भवन के लिए उनसे भारी रकम ली जा रही है, वह रहने के लिहाज से सुरक्षित और सुविधाजनक भी होगा।

विश्वविद्यालय हॉस्टल की भारी कमी

निजी पीजी पर छात्रों की निर्भरता का एक बड़ा कारण विश्वविद्यालय के हॉस्टल में पर्याप्त सीटों का उपलब्ध नहीं होना है। कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के अनुसार, बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की तुलना में विश्वविद्यालय आवास की क्षमता बेहद सीमित है।

छात्रों ने बताया कि लगभग 3,000 विद्यार्थियों में करीब 100 छात्रों को ही विश्वविद्यालय हॉस्टल में जगह मिल पाती है। इसका सीधा असर उन हजारों छात्रों पर पड़ता है जिन्हें निजी हॉस्टल, पीजी या किराए के कमरों का सहारा लेना पड़ता है।

यह अंतर केवल आवास की समस्या नहीं है। इससे छात्रों के मासिक खर्च में बढ़ोतरी होती है और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कई विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई के साथ-साथ रहने और आने-जाने का खर्च संभालना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

कैंपस से दूर रहने की मजबूरी

कैंपस के नजदीक किराए महंगे होने के कारण कुछ छात्रों को विश्वविद्यालय से काफी दूर रहना पड़ता है। विद्यार्थियों के मुताबिक, कुछ छात्र दिल्ली-गुरुग्राम सीमा के आसपास के क्षेत्रों तक रहने के लिए जाते हैं। इसका परिणाम लंबे दैनिक सफर के रूप में सामने आता है।

सुबह कॉलेज पहुंचने और शाम को वापस लौटने में काफी समय खर्च हो जाता है। लंबी यात्रा का असर पढ़ाई, आराम और अतिरिक्त शैक्षणिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। जिन छात्रों को रोजाना कई घंटे सार्वजनिक परिवहन में बिताने पड़ते हैं, उनके लिए यह स्थिति विशेष रूप से कठिन हो सकती है।

इस समस्या का दूसरा पहलू परिवहन खर्च है। कम किराए वाले इलाके में रहने से जहां आवास का खर्च कुछ कम हो सकता है, वहीं रोजाना आने-जाने का खर्च बढ़ जाता है। इस तरह छात्रों को आवास और परिवहन के बीच लगातार संतुलन बनाना पड़ता है।

सत्य निकेतन की घटना के बाद बढ़ी चिंता

सत्य निकेतन में भवन ढहने की दुखद घटना ने दिल्ली में किराए के आवासों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी। ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर प्रशासन द्वारा निरीक्षण और कार्रवाई की प्रक्रिया तेज होती दिखाई देती है। लेकिन छात्रों का सवाल है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल किसी हादसे के बाद ही सक्रिय क्यों होनी चाहिए।

विद्यार्थियों के मुताबिक, किसी भी संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए नियमित जांच पहले से होनी चाहिए। भवन की स्थिति, बिजली की वायरिंग, आग से बचाव के साधन, आपातकालीन निकास और अन्य सुरक्षा मानकों की समय-समय पर जांच होने से जोखिम को कम किया जा सकता है।

छात्रों का यह भी मानना है कि केवल भवन मालिकों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय संबंधित सरकारी और स्थानीय निकायों को भी निगरानी की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।

निरीक्षण व्यवस्था पर उठते सवाल

निजी हॉस्टल और पीजी का संचालन कई इलाकों में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में यह जरूरी है कि संबंधित विभागों के पास इन भवनों का व्यवस्थित रिकॉर्ड हो और सुरक्षा मानकों के पालन की नियमित समीक्षा की जाए।

छात्रों की शिकायतों से यह सवाल सामने आता है कि क्या सभी आवासीय भवनों का नियमित निरीक्षण वास्तव में हो रहा है। यदि निरीक्षण होता है, तो उसकी जानकारी और कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? वहीं यदि किसी भवन में नियमों का उल्लंघन मिलता है तो उसके खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं, यह भी महत्वपूर्ण विषय है।

सुरक्षा नियमों का उद्देश्य केवल कागजी औपचारिकता पूरी करना नहीं होना चाहिए। उनका वास्तविक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि किसी छात्र को असुरक्षित भवन में रहने के लिए मजबूर न होना पड़े।

समस्या का समाधान केवल अस्थायी कार्रवाई नहीं

छात्रों के बीच सबसे बड़ी चिंता यह है कि किसी बड़ी घटना के बाद कुछ समय के लिए प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं, लेकिन मूल समस्या लंबे समय तक बनी रहती है। यदि निजी आवासों की मांग लगातार बढ़ रही है और विश्वविद्यालय हॉस्टल में सीटें सीमित हैं, तो केवल आकस्मिक निरीक्षण से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

इस दिशा में विश्वविद्यालयों को छात्र आवास की क्षमता बढ़ाने पर गंभीरता से विचार करना होगा। साथ ही निजी हॉस्टल और पीजी के लिए स्पष्ट सुरक्षा मानक, नियमित निरीक्षण और शिकायत निवारण व्यवस्था प्रभावी बनाना जरूरी है।

छात्रों के लिए सुरक्षित आवास क्यों जरूरी

छात्रों के लिए आवास केवल सोने की जगह नहीं है। वह उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक आराम से जुड़ा महत्वपूर्ण आधार है। जब किसी विद्यार्थी को हर महीने हजारों रुपये किराए के रूप में खर्च करने के बाद भी कमरे की हवा, रोशनी और सुरक्षा को लेकर चिंता करनी पड़े, तो यह व्यापक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे बड़े शैक्षणिक संस्थान के आसपास रहने वाले विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए छात्र आवास को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए। पर्याप्त हॉस्टल, किफायती निजी आवास और सुरक्षित भवन—इन तीनों पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

निष्कर्ष

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास पीजी और निजी हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की समस्याएं एक व्यापक आवास संकट की ओर संकेत करती हैं। सीमित विश्वविद्यालय हॉस्टल, ऊंचे किराए, कम सुविधाएं, लंबी यात्राएं और सुरक्षा निरीक्षण को लेकर उठ रहे सवाल विद्यार्थियों के लिए गंभीर चुनौती हैं।

सत्य निकेतन जैसी घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि सुरक्षा व्यवस्था हादसे के बाद सक्रिय होने के बजाय पहले से मजबूत होनी चाहिए। छात्रों को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना केवल निजी मकान मालिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित सरकारी एजेंसियों की भी साझा जिम्मेदारी है।

यदि इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशना है तो नियमित भवन निरीक्षण, पारदर्शी नियम, प्रभावी शिकायत प्रणाली और विश्वविद्यालय हॉस्टल की क्षमता बढ़ाने जैसे कदमों को प्राथमिकता देनी होगी। छात्रों की सुरक्षा और शिक्षा के बीच कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

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