नेपाल में बाढ़ की तबाही के 14 दिन बाद भी संकट बरकरार, हजारों लोग लापता; भारतीय नर्सिंग कॉलेज में दाखिले के लिए छात्रा ने मांगी मदद

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काठमांडू। नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के 14 दिन बाद भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं। बाढ़ और उससे जुड़ी तबाही ने बड़ी संख्या में लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया है। कई इलाकों में घर, सड़कें और दूसरी जरूरी सुविधाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के कारण राहत एवं बचाव कार्य लगातार चुनौती बना हुआ है। वीडियो रिपोर्ट के मुताबिक, इस आपदा में अब तक 1,355 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5,000 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। करीब 32,000 लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं।

आपदा के दो सप्ताह बाद भी प्रभावित परिवार अपने परिजनों की तलाश, सुरक्षित ठिकाने और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। प्रशासन तथा सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचना और वहां फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना है।

Flood AI Generated syemboli photo

ऑपरेशन ‘जिंदगी’ के तहत जारी है बचाव अभियान

बाढ़ के बाद नेपाल में राहत और बचाव के लिए ‘ऑपरेशन जिंदगी’ चलाया जा रहा है। इस अभियान में सेना, पुलिस तथा अन्य राहत दलों के साथ अंतरराष्ट्रीय टीमें भी सहयोग कर रही हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और बाढ़ से क्षतिग्रस्त रास्तों के बावजूद बचावकर्मी लगातार प्रभावित इलाकों तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अभियान के तहत अब तक 13,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। यह अभियान केवल लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में जरूरी सहायता पहुंचाने की कोशिश भी की जा रही है।

हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों के अब भी लापता होने की खबर ने चिंता बढ़ा दी है। परिवार अपने प्रियजनों के बारे में जानकारी मिलने की उम्मीद लगाए हुए हैं। राहत दलों के लिए भी हर गुजरते दिन के साथ चुनौती बढ़ती जा रही है।

बाढ़ ने सिर्फ घर नहीं छीने, सपने भी उजाड़ दिए

नेपाल की इस त्रासदी का असर केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं है। आपदा ने कई विद्यार्थियों की शिक्षा और भविष्य की योजनाओं को भी प्रभावित किया है। वीडियो रिपोर्ट में ऐसी ही एक छात्रा ग्रिश्मा पुडासैनी की कहानी सामने आती है, जिसके लिए बाढ़ ने वर्षों की मेहनत के बाद हासिल किए गए अवसर को मुश्किल में डाल दिया है।

ग्रिश्मा ने लंबे समय तक मेहनत और तैयारी के बाद बेंगलुरु में नर्सिंग कार्यक्रम में प्रवेश के लिए योग्यता हासिल की थी। यह उपलब्धि उनके और उनके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। लेकिन जिस समय वह अपने शैक्षणिक भविष्य की ओर बढ़ने की तैयारी कर रही थीं, उसी दौरान आई बाढ़ ने उनके घर और जरूरी सामान को तबाह कर दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, बाढ़ के दौरान उनका घर मलबे में दब गया और उनके शैक्षणिक प्रमाणपत्र भी नष्ट हो गए। यही दस्तावेज उनके कॉलेज में प्रवेश की प्रक्रिया के लिए जरूरी थे।

ग्रिश्मा के सामने अब एक अजीब स्थिति है। एक तरफ उन्होंने मेहनत करके नर्सिंग पाठ्यक्रम में जगह बनाई है, वहीं दूसरी तरफ प्राकृतिक आपदा ने उन दस्तावेजों को उनसे छीन लिया है जिनके आधार पर उन्हें अपना दाखिला पूरा करना है।

मूल प्रमाणपत्र नहीं होने से दाखिले पर संकट

किसी भी शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश के दौरान विद्यार्थियों से उनके मूल प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज मांगे जाते हैं। सामान्य परिस्थितियों में दस्तावेज खो जाने की स्थिति में विद्यार्थी संबंधित विभाग से डुप्लीकेट प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन नेपाल में इस समय जिस स्तर की तबाही हुई है, वहां यह प्रक्रिया आसान नहीं रह गई है।

बाढ़ प्रभावित विद्यार्थियों के लिए सरकारी कार्यालयों तक पहुंचना, रिकॉर्ड प्राप्त करना और नए दस्तावेज बनवाना काफी कठिन हो सकता है। कई परिवारों के घर और जरूरी कागजात एक साथ नष्ट हो गए हैं। ऐसे में दस्तावेजों की व्यवस्था करने में लगने वाला समय विद्यार्थियों के शैक्षणिक सत्र को प्रभावित कर सकता है।

ग्रिश्मा की चिंता भी इसी बात को लेकर है। उन्होंने वर्षों की मेहनत के बाद बेंगलुरु के नर्सिंग कार्यक्रम में प्रवेश का अवसर हासिल किया है, लेकिन प्रमाणपत्रों के नष्ट होने के कारण उनका भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।

भारतीय सरकार से विशेष राहत की अपील

वीडियो रिपोर्ट में ग्रिश्मा और उनके जैसे प्रभावित विद्यार्थियों की ओर से भारत सरकार से सहायता की अपील की गई है। उनकी मांग है कि प्राकृतिक आपदा की असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे विद्यार्थियों को मूल प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए बिना या वैकल्पिक दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया पूरी करने का अवसर दिया जाए।

प्रभावित विद्यार्थियों का तर्क है कि यदि सामान्य दस्तावेजी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उन्हें पहले नेपाल में डुप्लीकेट प्रमाणपत्र हासिल करने पड़ते हैं, तो इसमें काफी समय लग सकता है। इस देरी की वजह से उनका कॉलेज प्रवेश और शैक्षणिक वर्ष प्रभावित होने की आशंका है।

ऐसे मामलों में मानवीय आधार पर विशेष व्यवस्था विद्यार्थियों के लिए राहत का माध्यम बन सकती है। यदि संबंधित संस्थान वैकल्पिक सत्यापन व्यवस्था अपनाते हैं, तो आपदा के कारण दस्तावेज खो चुके विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई जारी रखने का मौका मिल सकता है।

आपदा के बीच शिक्षा बचाने की चुनौती

प्राकृतिक आपदाओं के बाद राहत और पुनर्वास की चर्चा आमतौर पर भोजन, आवास, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द होती है। लेकिन विद्यार्थियों की शिक्षा भी आपदा के बाद सामने आने वाली महत्वपूर्ण चुनौतियों में शामिल होती है।

कई विद्यार्थियों के प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, प्रवेश से जुड़े दस्तावेज और अन्य शैक्षणिक रिकॉर्ड आपदा में नष्ट हो सकते हैं। यदि इन दस्तावेजों के अभाव में उनकी पढ़ाई रुक जाती है, तो इसका असर उनके भविष्य पर लंबे समय तक पड़ सकता है।

ग्रिश्मा की कहानी इसी व्यापक समस्या को सामने लाती है। उन्होंने जिस अवसर को पाने के लिए वर्षों तक मेहनत की, वह अवसर अब केवल बाढ़ में नष्ट हुए दस्तावेजों की वजह से खतरे में पड़ गया है। इसलिए उनकी अपील केवल व्यक्तिगत मदद की मांग नहीं, बल्कि आपदा प्रभावित विद्यार्थियों के लिए संवेदनशील और व्यावहारिक व्यवस्था की जरूरत को भी रेखांकित करती है।

राहत के साथ पुनर्वास पर भी देना होगा जोर

नेपाल में बाढ़ के बाद तत्काल राहत और बचाव सबसे प्राथमिक आवश्यकता है। हजारों प्रभावित और लापता लोगों की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। लेकिन जैसे-जैसे आपातकालीन स्थिति कम होगी, पुनर्वास से जुड़े सवाल भी सामने आएंगे।

लोगों के घरों का पुनर्निर्माण, बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू कराना, जरूरी दस्तावेजों को पुनः उपलब्ध कराना और प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता देना लंबे पुनर्वास अभियान का हिस्सा होगा।

ग्रिश्मा जैसे विद्यार्थियों के लिए समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि कॉलेजों में प्रवेश की समयसीमा निर्धारित होती है। इसलिए आपदा के कारण दस्तावेज खोने वाले छात्रों के मामलों को अलग श्रेणी में रखकर शीघ्र समाधान तलाशना जरूरी हो सकता है।

नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर यह दिखाया है कि प्राकृतिक आपदा का प्रभाव केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रहता, जब बाढ़ या भूस्खलन होता है। इसका असर लोगों की आजीविका, शिक्षा, रोजगार और भविष्य की योजनाओं तक पहुंच सकता है।

फिलहाल बचाव अभियान जारी है और प्रभावित लोगों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की जा रही है। वहीं ग्रिश्मा जैसी छात्राओं की उम्मीद अब इस बात पर टिकी है कि आपदा के असाधारण हालात को देखते हुए उनकी शिक्षा को जारी रखने के लिए मानवीय और व्यावहारिक रास्ता निकाला जाएगा।

नेपाल में बाढ़ की तबाही के बीच हजारों परिवार जहां अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं ग्रिश्मा की कहानी यह याद दिलाती है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण सिर्फ मकानों और सड़कों का नहीं, बल्कि लोगों के सपनों और भविष्य का भी होना चाहिए।

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