दक्षिण अफ्रीका में ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने सतत विकास पर रखा भारत का दृष्टिकोण, CPA सम्मेलन में जलवायु चुनौतियों पर जोर
सुदाम चरण साहू हिट एंड हॉट न्यूज़ राज्य ब्यूरो चीफ ओडिशा भुवनेश्वर/केप टाउन, 17 सितंबर…
सुदाम चरण साहू
हिट एंड हॉट न्यूज़ राज्य ब्यूरो चीफ ओडिशा
भुवनेश्वर/केप टाउन, 17 सितंबर 2026।
ओडिशा विधानसभा की अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी इन दिनों दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर हैं। केप टाउन में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (Commonwealth Parliamentary Association-CPA) के 69वें सम्मेलन में उन्होंने भारत की विकास नीति, पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर अपने विचार रखे। सम्मेलन में विभिन्न देशों के संसद अध्यक्षों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और संसदीय अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
केप टाउन इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आयोजित यह सम्मेलन 14 सितंबर से शुरू हुआ और 17 सितंबर तक चला। चार दिवसीय इस आयोजन में 56 देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी रही। भारत की ओर से भी कई राज्यों के विधानसभा अध्यक्ष और अन्य जनप्रतिनिधि सम्मेलन में शामिल हुए।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुरमा पाढ़ी ने कहा कि भारत का दृष्टिकोण ऐसा विकास सुनिश्चित करना है जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा को भी समान महत्व मिले। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकास और जलवायु स्थिरता को अलग-अलग विषय मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा संबंध कृषि, जल संसाधन, ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवाओं, शहरी विकास, आधारभूत ढांचे, वनों, समुद्री एवं तटीय क्षेत्रों और आपदा प्रबंधन से जुड़ा है। ऐसे में जलवायु संबंधी नीतियों को व्यापक विकास योजनाओं का हिस्सा बनाया जाना आवश्यक है।
सुरमा पाढ़ी के अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए समाधान विकसित किए जाने चाहिए। इस प्रक्रिया में राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन पर साथ-साथ कार्रवाई
ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष ने प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को एक-दूसरे से जुड़े विषय बताते हुए इनके समाधान के लिए समन्वित प्रयासों की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, बेहतर कचरा प्रबंधन और टिकाऊ आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में प्रभावी कदम उठाने से केवल पर्यावरण की सुरक्षा ही नहीं होगी, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता और समाज की आपदा से निपटने की क्षमता में भी सुधार हो सकता है।
उनके संबोधन में यह संदेश प्रमुख रहा कि पर्यावरण संरक्षण को विकास के रास्ते में बाधा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय विकास की ऐसी व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हो और भविष्य में पर्यावरणीय जोखिम कम किए जा सकें।

आपदा प्रबंधन में ओडिशा के अनुभव का उल्लेख
सुरमा पाढ़ी ने जलवायु और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में ओडिशा के अनुभव को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर साझा किया। उन्होंने बताया कि राज्य ने विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए समय रहते चेतावनी जारी करने की व्यवस्था, चक्रवात आश्रय केंद्र, सुरक्षित निकासी, विभिन्न सरकारी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय और समुदाय की भागीदारी जैसे उपायों पर जोर दिया है।
ओडिशा लंबे समय से चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम वाले राज्यों में शामिल रहा है। ऐसे में आपदा के दौरान प्रशासनिक तैयारियों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
सुरमा पाढ़ी ने कहा कि किसी भी आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए केवल सरकारी मशीनरी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। लोगों को जागरूक करना, स्थानीय स्तर पर तैयारी विकसित करना और प्रशासन तथा समुदाय के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना भी आवश्यक है।
कानून और बजट के जरिए जलवायु कार्रवाई को मजबूती
अपने संबोधन में विधानसभा अध्यक्ष ने जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण या विज्ञान से संबंधित विषय मानने के बजाय इसे शासन और सार्वजनिक नीति से जुड़ा मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु संबंधी लक्ष्यों को प्रभावी बनाने के लिए सरकारों को उचित कानून और बजट प्रावधानों का समर्थन देना चाहिए।
उन्होंने निगरानी और जवाबदेही को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, किसी नीति या योजना की सफलता केवल उसके निर्माण से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उसके क्रियान्वयन, निगरानी और परिणामों का आकलन भी जरूरी है।
उन्होंने समुदायों की भागीदारी को जलवायु लचीलापन मजबूत करने का अहम माध्यम बताया। स्थानीय लोगों को योजनाओं से जोड़ने से क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
आने वाली पीढ़ियों के लिए जिम्मेदारी
सुरमा पाढ़ी ने संसदीय संस्थाओं की भूमिका पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि संसद और विधानसभाएं ऐसी नीतियों और विकास निर्णयों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिनका प्रभाव वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है।
उनके अनुसार, आज लिए जाने वाले विकास संबंधी फैसलों का उद्देश्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए जो भविष्य में अधिक सुरक्षित और सक्षम हो। इसके साथ ही लोगों के जीवन, आजीविका और समुदायों की सुरक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती लंबी अवधि से जुड़ी है। इसलिए इसके समाधान के लिए सरकार, विधायिका, स्थानीय संस्थाओं और आम नागरिकों के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक है।

महिला सांसदों और दिव्यांगजनों की भागीदारी पर चर्चा
CPA सम्मेलन के दौरान सुरमा पाढ़ी ने राष्ट्रमंडल महिला सांसद कार्यक्रम में भी भाग लिया। इस कार्यक्रम में संसदीय व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई।
इसके अलावा उन्होंने संसदीय प्रणालियों में दिव्यांग व्यक्तियों की भागीदारी से संबंधित विचार-विमर्श में भी हिस्सा लिया। इस दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक समावेशी बनाने और विभिन्न वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
भारत के कई राज्यों के प्रतिनिधि सम्मेलन में शामिल
केप टाउन में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संसदीय सम्मेलन में भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। सम्मेलन में 17 राज्यों के विधानसभा अध्यक्षों समेत 200 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह कर रहे हैं।
ओडिशा की ओर से विधानसभा के उपाध्यक्ष भवानी शंकर भोई और विधानसभा के सचिव सत्यब्रत राउत समेत अन्य प्रतिनिधि भी सम्मेलन में भाग ले रहे हैं।
69वें CPA सम्मेलन ने विभिन्न देशों और संसदीय संस्थाओं को जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, समावेशी लोकतंत्र तथा संसदीय प्रक्रियाओं से जुड़े विषयों पर विचार साझा करने का अवसर दिया। सम्मेलन में रखे गए विचारों के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि बदलते पर्यावरणीय और सामाजिक परिदृश्य में विधायिकाओं की भूमिका केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास के लिए नीतिगत दिशा तय करने में भी उनकी अहम जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष:
दक्षिण अफ्रीका में आयोजित CPA सम्मेलन में सुरमा पाढ़ी का संबोधन भारत और ओडिशा के अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय संसदीय मंच पर साझा करने का अवसर बना। सतत विकास, जलवायु लचीलापन, आपदा प्रबंधन, स्थानीय भागीदारी और संसदीय जवाबदेही पर उनका जोर इस बात को रेखांकित करता है कि विकास की नीतियों में पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा को साथ लेकर चलना आवश्यक है।
