गौरव भाटिया मानहानि मामले में कॉकक्रोच जनता पार्टी के नेताओं ने पोस्ट हटाने का दिया आश्वासन, दिल्ली हाई कोर्ट ने 24 घंटे में कार्रवाई के दिए निर्देश
नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026। दिल्ली हाई कोर्ट में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया से जुड़े मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया पर डाले गए कथित आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। कोर्ट के समक्ष कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) के सदस्यों सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि वे विवादित सोशल मीडिया पोस्ट को हटा देंगे। अदालत ने उनके बयान को रिकॉर्ड करते हुए संबंधित पोस्ट को 24 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश दिया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ के समक्ष हुई। गौरव भाटिया की ओर से दायर याचिका में कथित तौर पर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली ऑनलाइन सामग्री को हटाने की मांग की गई है। यह मामला करीब 2 करोड़ रुपये की मानहानि याचिका से संबंधित बताया गया है। सुनवाई के दौरान भाटिया स्वयं अदालत में मौजूद रहे।

सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद
मामले का केंद्र सोशल मीडिया पर प्रकाशित कुछ ऐसी सामग्री है, जिसे गौरव भाटिया की ओर से कथित रूप से मानहानिकारक और गलत बताया गया है। भाटिया का पक्ष है कि कुछ पोस्ट में उनकी तस्वीर के साथ कथित रूप से मनगढ़ंत बयान जोड़े गए और एक समाचार संगठन के लोगो का इस्तेमाल भी किया गया। उनका कहना है कि इस तरह तैयार की गई सामग्री से आम लोगों के बीच पोस्ट को वास्तविक या विश्वसनीय समझे जाने की संभावना बढ़ गई।
भाटिया की ओर से अदालत को बताया गया कि कथित सामग्री को बड़ी संख्या में लोगों ने देखा है और इसके ऑनलाइन बने रहने से उनकी प्रतिष्ठा को लगातार नुकसान पहुंच सकता है। इसी आधार पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से ऐसी सामग्री को हटाने के लिए न्यायिक निर्देश की मांग की गई।
सौरव दास और आशुतोष रांका का अदालत में आश्वासन
सुनवाई के दौरान सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि विवादित पोस्ट को हटाने के लिए वे तैयार हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उनके आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया और संबंधित पोस्ट को 24 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश दिया।
दास के वकील की ओर से यह भी बताया गया कि जिस ट्वीट को लेकर विवाद उठाया गया था, उसे पहले ही डिलीट किया जा चुका है। हालांकि, अदालत ने ध्यान दिलाया कि इसके अलावा एक अन्य पोस्ट भी सोशल मीडिया पर मौजूद था। इस कारण अदालत ने विवादित सामग्री को हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट समयसीमा के साथ आगे बढ़ाया।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोर्ट की टिप्पणी
इस सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक टिप्पणी के तरीके से जुड़े महत्वपूर्ण पहलू पर भी बात की। अदालत ने पहले की कार्यवाही के संदर्भ में कहा था कि विरोध या असहमति दर्ज कराने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन कई बार उस बात को इस प्रकार और अधिक स्पष्ट एवं संयमित तरीके से प्रस्तुत करना जरूरी होता है, जिससे वास्तविक संदेश सही रूप में सामने आए।
यह टिप्पणी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, जहां राजनीतिक बहस और सोशल मीडिया गतिविधियों के बीच किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होने का आरोप लगाया जाता है। सोशल मीडिया पर प्रकाशित सामग्री तेजी से लोगों तक पहुंचती है, इसलिए किसी विवादित बयान या तस्वीर के व्यापक प्रसार से जुड़े कानूनी सवाल भी तेजी से सामने आते हैं।
अभिजीत दिपके की भूमिका पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने अभिजीत दिपके को मामले में प्रतिवादी बनाए जाने को लेकर भी सवाल उठाया। पीठ ने पूछा कि उनके द्वारा ऐसा कौन-सा कथित कंटेंट प्रकाशित किया गया था, जो विवाद का हिस्सा है।
दिपके की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि विवाद से संबंधित ऐसा कोई ट्वीट उनके द्वारा नहीं किया गया था। इस दलील के बाद मामले में अलग-अलग प्रतिवादियों की कथित भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता भी सामने आई।
मानहानि के मामलों में यह महत्वपूर्ण होता है कि किस व्यक्ति ने कथित सामग्री तैयार की, किसने उसे प्रकाशित किया और किसने उसे आगे प्रसारित किया। इसी वजह से अदालत द्वारा प्रत्येक प्रतिवादी की भूमिका को अलग-अलग देखना मामले की कानूनी दिशा के लिए अहम हो सकता है।
भाटिया ने बताई प्रतिष्ठा को नुकसान की बात
गौरव भाटिया की ओर से अदालत में कहा गया कि मामला गंभीर मानहानि से जुड़ा है। उनका आरोप है कि कथित रूप से तैयार की गई गलत सामग्री लंबे समय तक इंटरनेट पर उपलब्ध रहने से उनकी सार्वजनिक छवि और प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उनकी ओर से यह भी दावा किया गया कि उनकी तस्वीर के साथ एक कथित रूप से fabricated statement यानी मनगढ़ंत बयान जोड़ा गया। इसके अलावा समाचार संगठन के लोगो के कथित इस्तेमाल से पोस्ट को अतिरिक्त विश्वसनीयता मिलने की संभावना जताई गई। भाटिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर ऐसी सामग्री को हटाने के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की।
सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी का मुद्दा
सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी चर्चा का विषय बनी। भाटिया की ओर से X और Meta जैसे प्लेटफॉर्मों पर कथित रूप से गलत तस्वीर और समान सामग्री को हटाने के लिए निर्देश देने का आग्रह किया गया।
वहीं, Meta की ओर से पेश वकील ने अदालत के समक्ष यह तर्क रखा कि प्लेटफॉर्म किसी तस्वीर या सामग्री को बिना किसी विशिष्ट आधार अथवा कानूनी निर्देश के अपने स्तर पर सक्रिय रूप से नहीं हटा सकता। इससे डिजिटल प्लेटफॉर्मों की भूमिका और अदालत के निर्देशों के बीच संबंध का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आया।
आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर किसी सामग्री के प्रसार की गति बेहद तेज है। ऐसे में मानहानि से जुड़े मामलों में अदालतों के सामने एक ओर व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा का सवाल होता है, जबकि दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारियों पर भी विचार करना पड़ता है।
मामले का व्यापक महत्व
गौरव भाटिया से जुड़ा यह मामला केवल एक राजनीतिक विवाद तक सीमित नहीं है। इससे सोशल मीडिया पर सार्वजनिक व्यक्तियों के बारे में प्रकाशित सामग्री की जिम्मेदारी, तथ्यात्मकता और कानूनी सीमाओं से जुड़े कई सवाल भी सामने आते हैं।
अदालत की कार्यवाही यह संकेत देती है कि सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। यदि किसी व्यक्ति की तस्वीर या नाम का इस्तेमाल ऐसी सामग्री के साथ किया जाता है, जिसे वह गलत या मानहानिकारक बताता है, तो उसके कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
फिलहाल अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से दिए गए आश्वासन को रिकॉर्ड करते हुए संबंधित पोस्ट हटाने के लिए 24 घंटे की समयसीमा निर्धारित की है। वहीं, अन्य पक्षों की भूमिका और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े मुद्दों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया में स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
यह मामला आने वाले समय में ऑनलाइन मानहानि, सोशल मीडिया पर सामग्री हटाने और अभिव्यक्ति की सीमा से जुड़े कानूनी विवादों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो सकता है। कोर्ट के समक्ष रखे गए तर्कों से स्पष्ट है कि डिजिटल मंचों पर प्रकाशित सामग्री को लेकर प्रतिष्ठा की सुरक्षा और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना इस विवाद का प्रमुख पहलू है।
नोट: यह लेख आपके दिए गए समाचार-सcreenshot की जानकारी को आधार बनाकर नए शब्दों और स्वतंत्र संरचना में लिखा गया है।