विश्वकर्मा पूजा पर सुजौली में सजा कुश्ती का अखाड़ा, पहलवानों ने दिखाया दमखम
कमलेश कुमार बहराइच
हिट एंड हॉट न्यूज़ रिपोर्टर
सुजौली, बहराइच | 17 सितंबर 2026।
विश्वकर्मा पूजा के पावन अवसर पर बहराइच जिले के सुजौली क्षेत्र में गुरुवार को पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिता यानी दंगल का आयोजन किया गया। ग्रामीण परिवेश में आयोजित इस खेल आयोजन ने क्षेत्र के लोगों को एक साथ आने और देशी कुश्ती की परंपरा से जुड़ने का अवसर दिया। दंगल में सुजौली सहित आसपास के कई गांवों से पहुंचे पहलवानों ने अखाड़े में अपनी शारीरिक क्षमता, तकनीक और कुश्ती कौशल का प्रदर्शन किया।
सुबह से ही आयोजन स्थल पर लोगों की आवाजाही शुरू हो गई थी। जैसे-जैसे मुकाबलों का समय नजदीक आया, अखाड़े के आसपास दर्शकों की भीड़ बढ़ती चली गई। ग्रामीणों के साथ बड़ी संख्या में कुश्ती प्रेमी भी प्रतियोगिता देखने पहुंचे। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों में दंगल को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक अंदाज में तैयार किए गए अखाड़े ने पूरे आयोजन को ग्रामीण खेल संस्कृति का रंग दे दिया।

अखाड़े में पहलवानों ने आजमाए दांव-पेंच
दंगल के दौरान अलग-अलग मुकाबलों में पहलवानों ने एक-दूसरे के सामने अपनी ताकत और कुश्ती की तकनीक का प्रदर्शन किया। अखाड़े में उतरने वाले पहलवानों ने प्रतिद्वंद्वी के दांव को समझते हुए उसे मात देने के लिए अलग-अलग कुश्ती तकनीकों का सहारा लिया। मुकाबलों के दौरान कई ऐसे क्षण आए, जब दोनों पहलवानों के बीच कड़ा संघर्ष देखने को मिला।
जैसे ही कोई पहलवान अपने प्रतिद्वंद्वी पर बढ़त बनाने में सफल होता, अखाड़े के चारों ओर मौजूद दर्शकों की आवाज तेज हो जाती। तालियों और उत्साहवर्धन से पहलवानों का हौसला बढ़ाया गया। दर्शकों की प्रतिक्रिया से पूरे आयोजन स्थल पर लगातार उत्साह का माहौल बना रहा।
कुश्ती के दौरान पहलवानों की फुर्ती और संतुलन ने लोगों का ध्यान खींचा। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पारंपरिक दंगल को केवल खेल प्रतियोगिता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह सामाजिक मेलजोल और स्थानीय खेल संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। सुजौली में आयोजित इस कार्यक्रम में भी यही भावना दिखाई दी।
ग्रामीण खेल संस्कृति को मिला मंच
विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर आयोजित दंगल ने धार्मिक आयोजन के साथ-साथ खेल गतिविधि को भी एक मंच प्रदान किया। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक कुश्ती का अपना अलग महत्व रहा है। पहले गांवों और कस्बों में दंगल नियमित रूप से आयोजित होते थे, जिनमें स्थानीय पहलवानों के साथ दूसरे क्षेत्रों से आने वाले खिलाड़ी भी हिस्सा लेते थे।
सुजौली क्षेत्र में आयोजित इस प्रतियोगिता ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। आयोजकों का कहना रहा कि ऐसे कार्यक्रमों से ग्रामीण प्रतिभाओं को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। कई युवा खेलों में रुचि रखते हैं, लेकिन उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए पर्याप्त मंच नहीं मिल पाता। स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली कुश्ती प्रतियोगिताएं ऐसे युवाओं के लिए प्रोत्साहन का माध्यम बन सकती हैं।
दंगल में पहुंचे लोगों का कहना था कि ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह के खेल आयोजन होने से युवाओं का ध्यान सकारात्मक गतिविधियों की ओर आकर्षित होता है। खेल के प्रति रुचि बढ़ने से युवाओं में अनुशासन, मेहनत और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।
दर्शकों में दिखा खास उत्साह
दंगल की सबसे बड़ी विशेषता दर्शकों का उत्साह रहा। मुकाबलों के दौरान अखाड़े के चारों ओर लोगों की भीड़ बनी रही। जैसे ही पहलवान आमने-सामने आते, दर्शक पूरे ध्यान से मुकाबला देखने लगते। किसी पहलवान के शानदार दांव लगाने पर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती।
ग्रामीणों के लिए दंगल मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक जुड़ाव का भी अवसर बना। अलग-अलग गांवों से आए लोग एक ही स्थान पर एकत्र हुए और उन्होंने प्रतियोगिता का आनंद लिया। युवाओं के बीच भी कुश्ती को लेकर चर्चा होती रही।
दंगल में शामिल पहलवानों के प्रदर्शन को देखने के लिए स्थानीय लोगों में विशेष रुचि रही। कई दर्शक अपने क्षेत्र से आए पहलवानों का उत्साह बढ़ाते दिखाई दिए। इससे अखाड़े का माहौल लगातार जीवंत बना रहा।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और गणमान्य लोगों की मौजूदगी
कार्यक्रम में सुजौली प्रधान राजेश गुप्ता सहित क्षेत्र के कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। भाजपा जिला प्रतिनिधि समेत अन्य स्थानीय लोगों ने भी आयोजन में सहभागिता की। उनकी मौजूदगी से कार्यक्रम को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिला।
कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने पारंपरिक कुश्ती के संरक्षण और इसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद खेल प्रतिभाओं को पहचानने के लिए स्थानीय प्रतियोगिताओं का आयोजन जरूरी है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से नए पहलवानों को अपनी क्षमता साबित करने का अवसर मिल सकता है।
स्थानीय स्तर पर आयोजित खेल कार्यक्रमों से समुदाय के लोगों के बीच सहभागिता भी बढ़ती है। जब किसी गांव या क्षेत्र में सामूहिक रूप से खेल प्रतियोगिता आयोजित होती है तो बड़ी संख्या में लोग उसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ते हैं।
युवाओं को खेलों से जोड़ने पर जोर
आयोजकों ने कहा कि वर्तमान समय में युवाओं को खेलों से जोड़ना बेहद महत्वपूर्ण है। कुश्ती जैसे पारंपरिक खेल ग्रामीण क्षेत्रों की खेल विरासत का हिस्सा हैं। यदि इन्हें नियमित रूप से मंच मिलता रहे तो युवा पीढ़ी इनसे जुड़ सकती है।
कुश्ती में अभ्यास, अनुशासन और निरंतर मेहनत की आवश्यकता होती है। अखाड़े में उतरने वाले पहलवान लंबे समय तक प्रशिक्षण और अभ्यास के बाद मुकाबले के लिए तैयार होते हैं। इसलिए दंगल केवल कुछ मिनटों का मुकाबला नहीं होता, बल्कि इसके पीछे खिलाड़ी की मेहनत और तैयारी भी शामिल रहती है।
आयोजकों का मानना है कि गांवों में नियमित खेल प्रतियोगिताओं को बढ़ावा मिलने से स्थानीय स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान की जा सकती है। इसके साथ ही युवाओं को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा भी मिलेगी।
विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर अलग रंग
विश्वकर्मा पूजा आम तौर पर निर्माण, तकनीक, औजारों और श्रम से जुड़े क्षेत्रों में विशेष श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। सुजौली में इस अवसर पर आयोजित दंगल ने पर्व के माहौल में एक अलग रंग जोड़ दिया। पूजा और सामाजिक गतिविधियों के साथ खेल प्रतियोगिता ने लोगों को सामूहिक रूप से उत्सव मनाने का अवसर दिया।
ग्रामीण क्षेत्रों में धार्मिक पर्वों और स्थानीय खेल आयोजनों का आपसी संबंध पुराना रहा है। त्योहारों के दौरान मेलों, दंगलों और अन्य पारंपरिक गतिविधियों का आयोजन लोगों के बीच सामाजिक संपर्क को मजबूत करता है। सुजौली का यह दंगल भी इसी ग्रामीण परंपरा की झलक पेश करता नजर आया।
परंपरा और आधुनिक खेल भावना का मेल
सुजौली में हुआ दंगल यह दिखाता है कि पारंपरिक खेल आज भी ग्रामीण समाज में अपनी जगह बनाए हुए हैं। बदलते समय और आधुनिक खेलों के बढ़ते प्रभाव के बावजूद कुश्ती के प्रति लोगों की रुचि बनी हुई है।
स्थानीय स्तर पर ऐसे आयोजनों की निरंतरता से पारंपरिक खेलों को जीवित रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही युवा पहलवानों को प्रतियोगिता का अनुभव मिलता है और वे अपनी कमियों को समझकर आगे बेहतर तैयारी कर सकते हैं।
दंगल के दौरान खिलाड़ियों ने जिस तरह प्रतिस्पर्धा की, उससे खेल भावना भी देखने को मिली। दर्शकों ने मुकाबलों का आनंद लिया और पहलवानों का उत्साह बढ़ाया। इस तरह विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर आयोजित सुजौली का दंगल धार्मिक उत्सव के साथ खेल, परंपरा और सामुदायिक सहभागिता का संगम बन गया।
कुल मिलाकर, 17 सितंबर को सुजौली में आयोजित कुश्ती प्रतियोगिता ने स्थानीय लोगों को मनोरंजन के साथ पारंपरिक खेल से जुड़ने का अवसर दिया। अखाड़े में उतरे पहलवानों के प्रदर्शन ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया, वहीं आयोजकों और स्थानीय गणमान्य लोगों की सहभागिता ने कार्यक्रम को सामुदायिक स्वरूप प्रदान किया। ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को मंच देने और युवाओं को खेलों के प्रति प्रेरित करने की दिशा में ऐसे आयोजन आगे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।