केप टाउन में कॉमनवेल्थ संसदीय कार्यक्रम में सुरमा पाढ़ी ने उठाई दिव्यांगजनों की समान भागीदारी की आवाज

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सुदाम बाबू स्टेट ब्यूरो ओडिशा

हिट एंड हॉट न्यूज़

भुवनेश्वर/केप टाउन | 19 सितंबर 2026

दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में आयोजित कॉमनवेल्थ पार्लियामेंटरी एसोसिएशन (CPA) के सम्मेलन में ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक समावेशी और सुलभ बनाने की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण विचार रखे। सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि दुनिया में तेजी से बदलते राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी परिदृश्य के बीच लोकतंत्र के सामने नई चुनौतियां जरूर सामने आ रही हैं, लेकिन प्रत्येक नागरिक को समान अवसर और अधिकार उपलब्ध कराने का मूल सिद्धांत किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।

सुरमा पाढ़ी ने यह बात सम्मेलन के उस सत्र में कही, जिसका विषय “Accessible Parliament: Inclusion of Persons with Disabilities” यानी “सुलभ संसद : दिव्यांगजनों का समावेश” था। इस सत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं में दिव्यांग व्यक्तियों की भागीदारी बढ़ाने, संसदीय प्रक्रियाओं को उनके लिए सुगम बनाने और आधुनिक तकनीक के माध्यम से राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

बदलते दौर में लोकतंत्र के सामने नई चुनौतियां

ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में दुनिया तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। तकनीक के विकास ने संचार, प्रशासन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के स्वरूप को बदल दिया है। संसद और विधानसभाओं में भी डिजिटल माध्यमों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि तकनीकी बदलावों का उद्देश्य केवल संस्थागत कामकाज को तेज करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचना भी जरूरी है। लोकतंत्र तभी प्रभावी माना जा सकता है, जब उसमें समाज के सभी वर्गों को अपनी बात रखने और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिले।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समानता का सिद्धांत लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार है और इसे किसी भी तकनीकी या संस्थागत परिवर्तन के बीच नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ऋषि अष्टावक्र का उदाहरण देकर रखी भारतीय दृष्टि

सुरमा पाढ़ी ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के संदर्भ में ऋषि अष्टावक्र का उदाहरण भी प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में व्यक्ति की शारीरिक स्थिति के बजाय उसके ज्ञान, क्षमता और योगदान को महत्व देने की दृष्टि लंबे समय से मौजूद रही है।

उन्होंने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी भूमिका को केवल सामाजिक सहायता प्राप्त करने वाले वर्ग के रूप में देखना उचित नहीं है, बल्कि उन्हें समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने वाले नागरिकों के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है।

अध्यक्ष ने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में दिव्यांगजन विभिन्न स्तरों पर जनता का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि शारीरिक अक्षमता किसी व्यक्ति की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी की क्षमता को निर्धारित नहीं करती।

लोकतंत्र में दिव्यांग मतदाताओं की बड़ी भूमिका

सुरमा पाढ़ी ने 2024 के आम चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उस चुनाव के दौरान 90 लाख से अधिक दिव्यांग मतदाता पंजीकृत थे। यह संख्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दिव्यांग नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में केवल मतदान का अधिकार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। मतदान केंद्रों तक पहुंच, सूचना की उपलब्धता, चुनावी प्रक्रियाओं की समझ और राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व जैसे पहलू भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

उनके अनुसार, जैसे-जैसे संसद और विधानसभाएं डिजिटल माध्यमों को अपना रही हैं, वैसे-वैसे इन तकनीकों का इस्तेमाल दिव्यांग नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी को और आसान बनाने में किया जा सकता है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म, सुलभ सूचना प्रणाली और तकनीकी सहायता ऐसे माध्यम बन सकते हैं, जिनसे लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुंच अधिक व्यापक हो सके।

दिव्यांगजन अधिकार कानून का उल्लेख

सुरमा पाढ़ी ने अपने संबोधन में भारत के दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस कानून ने दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समानता, सुगमता और सामाजिक भागीदारी के अवसरों को मजबूत करने के लिए कानूनी आधार प्रदान किया है।

कानूनी अधिकारों के साथ-साथ वास्तविक जीवन में उनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया। उन्होंने संकेत दिया कि सार्वजनिक संस्थानों, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी सहित विभिन्न क्षेत्रों में सुलभ वातावरण तैयार करना समावेशी लोकतंत्र की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

ओडिशा की योजनाओं और पहलों का किया उल्लेख

अध्यक्ष ने सम्मेलन में ओडिशा सरकार द्वारा दिव्यांग विद्यार्थियों और नागरिकों के लिए संचालित विभिन्न पहलों की जानकारी भी साझा की। उन्होंने विशेष रूप से बानिश्री छात्रवृत्ति और भीम भोई भिन्नक्षम सामर्थ्य अभियान का उल्लेख किया।

इन पहलों के माध्यम से दिव्यांग विद्यार्थियों और नागरिकों को शिक्षा तथा सामाजिक सशक्तीकरण से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों के विकास के लिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है। उन्हें शिक्षा, कौशल, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के अवसर भी उपलब्ध कराने की जरूरत है।

ओडिशा में दिव्यांगजनों के लिए सहायक उपकरण, कौशल विकास, पुनर्वास, विशेष शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, खेल गतिविधियों और आजीविका से संबंधित विभिन्न प्रकार के सहयोग का भी उन्होंने उल्लेख किया।

सहायता से आगे बढ़कर भागीदारी पर जोर

सम्मेलन में सुरमा पाढ़ी के वक्तव्य का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने दिव्यांगजनों को केवल सहायता की आवश्यकता वाले वर्ग के रूप में देखने के बजाय उन्हें लोकतांत्रिक और सामाजिक व्यवस्था के सक्रिय भागीदार के रूप में देखने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि समावेशी लोकतंत्र का लक्ष्य केवल सुविधाएं उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि लोगों को निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी का अवसर देना भी है। संसद और विधानसभाओं की इमारतों से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म और संसदीय प्रक्रियाओं तक हर स्तर पर पहुंच को ध्यान में रखना आवश्यक है।

इस दृष्टिकोण से संसदीय संस्थानों में दिव्यांगजनों की भागीदारी का प्रश्न केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

सम्मेलन में कई भारतीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी

केप टाउन में आयोजित इस कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों और संसद से जुड़े जनप्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो, राज्यसभा सांसद सी. सदानंदन मास्टर और महाराष्ट्र विधान परिषद के सभापति प्रोफेसर राम शिंदे मौजूद रहे और चर्चा में हिस्सा लिया।

इस सम्मेलन में विभिन्न संसदीय संस्थाओं से जुड़े प्रतिनिधियों के बीच लोकतंत्र, समावेशन और सुलभ संसदीय व्यवस्था जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

प्रतिनिधिमंडल के साथ केप टाउन पहुंचीं अध्यक्ष

ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी इस सम्मेलन में अकेले नहीं, बल्कि ओडिशा विधानसभा के प्रतिनिधिमंडल के साथ भाग ले रही हैं। उनके साथ उपाध्यक्ष भावानी शंकर भोई और सचिव सत्यव्रत राउत भी सम्मेलन में उपस्थित हैं।

अंतरराष्ट्रीय संसदीय मंच पर ओडिशा की ओर से दिव्यांगजनों की लोकतांत्रिक भागीदारी और सुलभ संस्थानों की आवश्यकता का मुद्दा उठाया जाना राज्य की संसदीय गतिविधियों को वैश्विक चर्चा से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।

समावेशी लोकतंत्र की दिशा में संदेश

केप टाउन सम्मेलन में सुरमा पाढ़ी का संबोधन इस व्यापक विचार पर केंद्रित रहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने या संस्थाओं के संचालन से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि समाज के अलग-अलग वर्गों को व्यवस्था में कितनी समान भागीदारी मिलती है।

तकनीक के बढ़ते उपयोग के बीच संसदीय संस्थाओं को अधिक सुलभ बनाने की जरूरत आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। दिव्यांग नागरिकों के लिए शिक्षा, मतदान, सार्वजनिक सेवाओं और प्रतिनिधित्व के अवसरों को आसान बनाने के साथ-साथ उन्हें नीति और निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका देने पर जोर इस चर्चा का प्रमुख हिस्सा रहा।

सुरमा पाढ़ी द्वारा भारतीय संवैधानिक व्यवस्था, दिव्यांगजन अधिकार कानून और ओडिशा की योजनाओं का उल्लेख करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखना इस बात को रेखांकित करता है कि समावेशन का विषय अब केवल स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वकारी, सुलभ और समान बनाने की चर्चा वैश्विक संसदीय विमर्श का भी हिस्सा बन रही है।

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