अप्रैल 11, 2026

एक्यूआईएस प्रशिक्षण मॉड्यूल मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया

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नई दिल्ली, 7 अगस्त 2025 – दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि “व्यक्ति की स्वतंत्रता एक तुच्छ विषय नहीं है, जिसे नज़रअंदाज़ किया जा सके।” यह टिप्पणी अदालत ने उस समय दी जब डॉ. इश्तियाक अहमद की ज़मानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी। उन पर आतंकी संगठन अल-कायदा इन इंडियन सबकॉण्टिनेंट (AQIS) के कथित प्रशिक्षण मॉड्यूल से जुड़े होने का आरोप है।

मामले की पृष्ठभूमि

डॉ. इश्तियाक अहमद, झारखंड के निवासी हैं, जिन्हें अगस्त 2024 में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का आरोप है कि वह AQIS के झारखंड स्थित प्रशिक्षण नेटवर्क का मुख्य संचालक हैं। उन पर आतंकवादी गतिविधियों को योजनाबद्ध तरीके से संचालित करने, वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने और कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

अदालत की सख्ती और टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को स्वीकारते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न उठे, तो अदालत की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अदालत ने पुलिस की लापरवाही पर नाराजगी जताई, क्योंकि इस स्तर के गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी उपस्थित नहीं थे

बचाव पक्ष की दलीलें

डॉ. अहमद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहरा ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि गिरफ्तार हुए एक साल बीत चुका है, लेकिन अभी तक UAPA के अंतर्गत अभियोजन की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है, जो कि कानूनी प्रक्रिया की गंभीर अनदेखी है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ गवाहों ने झारखंड की अदालत में यह शपथपत्र दिया है कि उनसे पुलिस द्वारा दबाव डालकर झूठे बयान दिलवाए गए।

प्रॉसिक्यूशन की प्रतिक्रिया और अगली कार्यवाही

सरकारी पक्ष की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक अमित अहलावत ने अदालत से दो सप्ताह का समय मांगा ताकि जांच अधिकारी की ओर से विधिवत रूप से दस्तावेज़ी स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत की जा सके। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई की तिथि 8 अक्टूबर 2025 तय की है।

आरोपित धाराएं और कानूनी प्रावधान

डॉ. इश्तियाक अहमद पर निम्नलिखित क़ानूनी धाराएं लगाई गई हैं:

  • UAPA की धाराएं 16, 17, 18, 18A, 18B
  • भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 61
  • विस्फोटक अधिनियम की धाराएं 4 और 5
  • शस्त्र अधिनियम की धारा 25

न्यायिक संतुलन की आवश्यकता

यह मामला भारत की न्याय व्यवस्था के उस मूल सिद्धांत को उजागर करता है, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। दिल्ली हाई कोर्ट की यह टिप्पणी कि “व्यक्ति की स्वतंत्रता को हल्के में नहीं लिया जा सकता” — भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को पुनः रेखांकित करती है।


निष्कर्ष:
यह प्रकरण केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और विधिक प्रक्रिया की निष्पक्षता का भी परीक्षण है। इस मामले में अदालत की गहन दृष्टि और स्पष्ट विचार यह दर्शाते हैं कि भारत का न्यायालय स्वतंत्रता और न्याय को सर्वोपरि मानता है।


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