मार्च 29, 2026

बिजली विभाग में आदेशों की अवहेलना, नियम ताक पर: बांदा ज़ोन (चित्रकूट) में संरक्षण की राजनीति उजागर

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उत्तर प्रदेश के बांदा ज़ोन अंतर्गत चित्रकूट जिले से बिजली विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने विभागीय पारदर्शिता, स्थानांतरण नीति और उच्चाधिकारियों के आदेशों के पालन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। बिजली विभाग के सूत्रों द्वारा दी गई पुख्ता जानकारी और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2025 में चेयरमैन द्वारा जारी स्पष्ट निर्देशों को नजरअंदाज करते हुए स्थानीय स्तर पर एक विवादित कर्मचारी को संरक्षण दिया जा रहा है और विभागीय कार्रवाई को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है।


चेयरमैन के आदेशों की खुलेआम अनदेखी


विभागीय सूत्रों के अनुसार, 2025 में चेयरमैन द्वारा जारी आदेश में साफ कहा गया था कि किसी भी निलंबित कर्मचारी की बहाली होने की स्थिति में उसे उसी जिले, मंडल या पुराने कार्यक्षेत्र में दोबारा तैनात नहीं किया जाएगा। इसका उद्देश्य वर्षों से बने स्थानीय गठजोड़, दबाव और भ्रष्टाचार की पुनरावृत्ति को रोकना था।
इसके बावजूद बांदा ज़ोन में इन निर्देशों को ताक पर रख दिया गया।


विवादित कर्मचारी की फिर उसी क्षेत्र में तैनाती


मिली जानकारी के मुताबिक, नलकूप (PTW) कनेक्शनों से जुड़े कार्य देखने वाला कर्मचारी संतोष कुमार (TG-2 / ड्राफ्ट मैन) पिछले करीब 20 वर्षों से चित्रकूट जिले में तैनात रहा है। भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों के बाद उसे निलंबित किया गया था, लेकिन बहाली के समय नियमों को दरकिनार कर उसे दोबारा उसी क्षेत्र चित्रकूट में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई।
यह निर्णय न केवल चेयरमैन के आदेशों का उल्लंघन है, बल्कि विभागीय निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।


जांच रिपोर्ट दबाने के आरोप


मीडिया सूत्रों के अनुसार द्वारा दी गई जानकारी में यह भी सामने आया है कि इस पूरे मामले की जांच के लिए गठित समिति ने अपनी दोषारोपण आख्या और प्रस्तावित सजा से जुड़ी रिपोर्ट तैयार कर ली है। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी इस रिपोर्ट को उच्च स्तर पर भेजने से बच रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि जानबूझकर देरी कर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की जा रही है, ताकि कार्रवाई आगे न बढ़ सके।


वर्षों से जमे अन्य नाम भी आए सामने


इस प्रकरण के साथ-साथ विजय सिंह (OA-2, EDC चित्रकूट) का नाम भी चर्चा में है, जो 10 वर्षों से अधिक समय से एक ही स्थान पर तैनात बताए जा रहे हैं। जबकि आकांक्षी जिलों में स्पष्ट निर्देश हैं कि तीन वर्ष से अधिक समय तक किसी कर्मचारी को एक ही पटल पर नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बावजूद ऐसे कर्मचारियों का वर्षों से जमे रहना विभागीय मिलीभगत की ओर इशारा करता है।


किसानों और ग्रामीण उपभोक्ताओं की बढ़ती परेशानी


सूत्रों के अनुसार, नलकूप कनेक्शन और अन्य बिजली संबंधी कार्यों के लिए दूर-दराज के गांवों से आने वाले किसान, महिलाएं और बुजुर्ग सुबह से शाम तक कार्यालयों में बैठने को मजबूर होते हैं। शिकायत है कि बिना स्पष्ट कारण कार्य लटकाए जाते हैं, जिससे किसानों की खेती और ग्रामीण जीवन दोनों प्रभावित हो रहे हैं।


बाहरी दबाव और आंतरिक मिलीभगत के आरोप


आरोप है कि इस पूरे मामले में कुछ स्थानीय प्रभावशाली लोग  सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। विभाग के एसडीओ और अधिशासी अभियंता (XEN) स्तर के अधिकारियों पर दबाव बनाकर जांच प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है, ताकि संबंधित कर्मचारियों पर कोई सख्त कार्रवाई न हो।


प्रशासनिक पारदर्शिता पर संकट


यह मामला केवल एक कर्मचारी की तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि जब विभाग के भीतर ही नियमों को तोड़ा जाता है और जांच प्रक्रियाओं को रोका जाता है, तो आम उपभोक्ताओं को मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर भी सीधा असर पड़ता है। पहले से दर्ज शिकायतों के बावजूद विवादित कर्मचारियों को संवेदनशील पदों पर बनाए रखना प्रशासनिक मंशा को संदिग्ध बनाता है।


अब आगे क्या?


मीडिया सूत्रों के अनुसार, कुछ जिम्मेदार लोग अब इस प्रकरण से जुड़े नियमों, आदेशों और जांच से संबंधित तथ्यों को शासन स्तर तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हो सके।
यदि समय रहते उच्चाधिकारियों ने संज्ञान लिया, तो बांदा ज़ोन में नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।


यह पूरा प्रकरण एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या बिजली विभाग में जारी आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं, या फिर उन्हें जमीन पर लागू करने की इच्छाशक्ति भी वास्तव में मौजूद है।

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