फ़रवरी 12, 2026

कन्नौज की औद्योगिक ज़मीन पर खेती: व्यवस्था की चूक या सत्ता का खेल?

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उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले का अलीपुर गांव इन दिनों औद्योगिक विकास नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता और राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। जिस भूमि को राज्य में उद्योगों के विस्तार के लिए अधिग्रहित किया गया था, वहीं अब गेंहू की फसल काटे जाने का मामला सरकार और प्रशासन दोनों पर सवाल खड़े कर रहा है।


🏗️ जब उद्योग नहीं आए, तो खेत उग आए

अलीपुर गांव में वर्षों पहले औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था। किसानों को मुआवज़ा मिला, जमीन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो गई, लेकिन ज़मीन का वास्तविक उपयोग कभी शुरू नहीं हुआ। लंबे समय तक खाली पड़ी भूमि पर धीरे-धीरे स्थानीय लोगों ने खेती शुरू कर दी और देखते-देखते फसल तैयार हो गई।

हाल ही में प्रशासन ने अचानक कार्रवाई करते हुए ट्रैक्टर से खड़ी फसल जोत दी। इस कदम ने गांव में नाराज़गी और असंतोष को जन्म दे दिया, साथ ही यह सवाल भी उठाया कि यदि भूमि सरकारी थी, तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई।


🧭 निगरानी में चूक या जानबूझकर अनदेखी?

इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं:

  • सरकारी ज़मीन पर खेती वर्षों तक कैसे चलती रही?
  • फसल बोने से लेकर कटाई के समय तक किसी अधिकारी को जानकारी क्यों नहीं हुई?
  • औद्योगिक परियोजना के नाम पर ज़मीन लेकर उसे निष्क्रिय क्यों छोड़ा गया?
  • क्या ज़मीन अधिग्रहण केवल कागज़ों तक सीमित था?

इन सवालों ने पूरे मामले को साधारण अतिक्रमण से आगे बढ़ाकर जवाबदेही के संकट में बदल दिया है।


🗣️ अखिलेश यादव का सीधा हमला

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को राजनीतिक मंच पर उठाते हुए भाजपा सरकार पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में औद्योगिक विकास केवल घोषणाओं तक सिमट गया है और ज़मीनी हकीकत भ्रष्टाचार व लापरवाही की गवाही देती है।

अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि सिर्फ अधिकारियों का तबादला समाधान नहीं है, जब नीति और नीयत दोनों ही सवालों के घेरे में हों। उनके मुताबिक यह मामला राज्य सरकार के कथित “कमीशन आधारित विकास मॉडल” की एक और मिसाल है।


⚖️ कानून क्या कहता है?

सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का कब्जा या खेती कानूनन अपराध है, लेकिन उतनी ही ज़िम्मेदारी प्रशासन की भी बनती है कि वह समय पर निगरानी और नियंत्रण करे। देर से की गई कार्रवाई न केवल किसानों के लिए नुकसानदेह साबित होती है, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता को भी ठेस पहुंचाती है।

इस प्रकरण में सवाल यह नहीं है कि फसल क्यों जोती गई, बल्कि यह है कि यह स्थिति पैदा ही क्यों होने दी गई


🔎 निष्कर्ष: विकास के नाम पर खाली वादे?

अलीपुर गांव की घटना यह साफ दर्शाती है कि जब विकास योजनाएं धरातल पर नहीं उतरतीं, तो वहां भ्रम, अवैधता और टकराव जन्म लेते हैं। औद्योगिक गलियारे की ज़मीन पर खेती होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नीति के स्तर पर विफलता का संकेत है।

यदि सरकार सच में औद्योगिक निवेश और रोजगार को लेकर गंभीर है, तो उसे ज़मीन अधिग्रहण के बाद उसके उपयोग, निगरानी और पारदर्शिता को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा विकास की ज़मीन पर राजनीति की फसल यूं ही उगती रहेगी।


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