GDP वृद्धि पर खड़गे का मोदी सरकार पर हमला, बोले- आम जनता बेरोजगारी, महंगाई और असमानता से परेशान
नई दिल्ली, 1 सितंबर 2026: भारत की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही में दर्ज 7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि को लेकर जहां केंद्र सरकार इसे आर्थिक मजबूती और विकास की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस आंकड़े को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। खड़गे ने आरोप लगाया कि सरकार GDP ग्रोथ का जश्न मनाने में व्यस्त है, जबकि आम नागरिकों के सामने बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के माध्यम से सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने GDP वृद्धि के जश्न को लेकर तंज कसते हुए कहा कि सरकार के पास इसका उत्सव मनाने की सुविधा हो सकती है, लेकिन आम आदमी के लिए रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियां ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

लाइट्स, कैमरा एंड इनएक्शन’ के जरिए सरकार पर निशाना
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी पोस्ट की शुरुआत “Lights, Camera and INACTION” जैसे शब्दों से करते हुए प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक नीतियों पर कटाक्ष किया। उनका आरोप था कि अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार की ओर से उपलब्धियों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन जनता की वास्तविक समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।
खड़गे ने आम लोगों की आर्थिक स्थिति को तीन प्रमुख ‘U’ से जोड़ते हुए सरकार को घेरा। उन्होंने इन्हें अभूतपूर्व बेरोजगारी, असहनीय मूल्य वृद्धि और बेलगाम असमानता के रूप में प्रस्तुत किया।
उनके मुताबिक GDP का बढ़ना निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन तब होना चाहिए जब उसका लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचता दिखाई दे।
बेरोजगारी को लेकर कांग्रेस का बड़ा दावा
खड़गे ने बेरोजगारी के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए युवाओं की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि देश में बेरोजगारी का स्तर गंभीर बना हुआ है और बड़ी संख्या में युवा रोजगार के अवसरों की तलाश में हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष ने विशेष रूप से युवा स्नातकों का उल्लेख करते हुए रोजगार की स्थिति पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे युवा नौकरी की तलाश में हैं और युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होने से सरकार के पुराने रोजगार संबंधी वादों पर भी प्रश्न खड़े होते हैं।
उन्होंने युवाओं के भविष्य और रोजगार की संभावनाओं को लेकर सरकार से जवाबदेही की मांग की। खड़गे का कहना है कि केवल GDP के आंकड़े सामने रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि आर्थिक विकास से नौकरियों का सृजन कितना हुआ और युवाओं की आय में कितना सुधार आया।
हालांकि, ये आंकड़े और दावे कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा सरकार की आलोचना के संदर्भ में रखे गए हैं और इनके अलग-अलग आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित आधिकारिक स्रोतों से की जानी चाहिए।
महंगाई के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा
खड़गे ने महंगाई को लेकर भी केंद्र सरकार पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि आम परिवारों के घरेलू बजट पर लगातार दबाव बना हुआ है। उनके मुताबिक खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बदलाव का सीधा असर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ता है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने चीनी, प्याज, टमाटर, दाल, खाना पकाने के तेल, चावल और दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनकी कीमतों का असर सीधे रसोई के बजट पर पड़ता है। इसके अलावा उन्होंने पेट्रोल, डीजल, LPG और CNG की कीमतों को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा।
उनका कहना था कि महंगाई का प्रभाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों की बचत, खर्च और जीवन-यापन की क्षमता पर भी पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि मध्यम वर्ग आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है, जबकि गरीब तबके के सामने भी कई मुश्किलें हैं।
आर्थिक असमानता पर तीखी टिप्पणी
खड़गे ने अपनी आलोचना में आर्थिक असमानता को भी प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में संपत्ति का वितरण समान नहीं है और समाज के एक छोटे हिस्से के पास बड़ी मात्रा में संपत्ति केंद्रित है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने शीर्ष 1 प्रतिशत और निचले 50 प्रतिशत लोगों के बीच संपत्ति के अंतर का उल्लेख करते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि आर्थिक विकास का फायदा समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा।
उन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि देश में आर्थिक नीतियां ऐसी दिशा में जा रही हैं, जिससे बड़े कारोबारी समूहों को अधिक लाभ मिल रहा है। खड़गे ने इसे “क्रोनी कैपिटलिज्म” से जोड़ते हुए सरकार की नीतियों की आलोचना की।
हालांकि, आर्थिक असमानता से जुड़े आंकड़ों को समझने के लिए अलग-अलग संस्थाओं की रिपोर्ट, संपत्ति के वितरण के तरीके और इस्तेमाल की गई गणना पद्धति को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।
कॉरपोरेट लोन राइट-ऑफ को लेकर भी सवाल
खड़गे ने बैंकों और कॉरपोरेट ऋण से जुड़े मुद्दे को भी अपनी पोस्ट में उठाया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2014 के बाद बड़ी राशि के कॉरपोरेट ऋण को बट्टे खाते में डाला गया है।
उन्होंने एक अन्य ऋण मामले का जिक्र करते हुए कहा कि बड़ी रकम के दावों के मुकाबले वसूली बेहद कम हुई। कांग्रेस अध्यक्ष ने इसे लेकर सरकार की आर्थिक और बैंकिंग नीतियों पर सवाल उठाया।
यहां राइट-ऑफ और ऋण माफी के बीच अंतर समझना भी महत्वपूर्ण है। किसी ऋण को तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डालना और कर्जदार को भुगतान से पूरी तरह मुक्त कर देना एक ही बात नहीं होती। इसलिए ऐसे दावों का मूल्यांकन बैंकिंग नियमों और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
GDP ग्रोथ बनाम आम जनता की आर्थिक स्थिति
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि GDP वृद्धि और आम लोगों की आर्थिक स्थिति को किस तरह देखा जाए।
GDP में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि अर्थव्यवस्था में मजबूत गतिविधियों का संकेत दे सकती है। उत्पादन, निवेश, सेवाओं और विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों की गतिविधियां GDP को प्रभावित करती हैं। लेकिन दूसरी ओर, आम नागरिक के लिए रोजगार, आय, महंगाई और जीवन-यापन की लागत भी आर्थिक स्थिति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
यही वह अंतर है जिसे कांग्रेस अध्यक्ष अपनी आलोचना के माध्यम से सामने रखना चाहते हैं। उनका तर्क है कि केवल आर्थिक विकास की दर को उपलब्धि मानने के बजाय यह देखना चाहिए कि विकास का लाभ किस वर्ग तक पहुंच रहा है।
वहीं सरकार और उसके समर्थकों की ओर से GDP वृद्धि को आर्थिक मजबूती के प्रमाण के रूप में पेश किया जाता रहा है। ऐसे में आने वाले समय में रोजगार, निजी निवेश, उपभोग, महंगाई और प्रति व्यक्ति आय जैसे संकेतकों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
आर्थिक आंकड़ों पर बढ़ सकता है राजनीतिक विवाद
GDP के ताजा आंकड़ों के बाद कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच आर्थिक मुद्दों पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। एक ओर सरकार आर्थिक वृद्धि को अपनी नीतियों की सफलता से जोड़ सकती है, वहीं विपक्ष रोजगार, महंगाई और असमानता जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरता रहेगा।
खड़गे का बयान इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा है। कांग्रेस का प्रयास है कि GDP वृद्धि के साथ-साथ आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को भी राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में लाया जाए।
अंततः भारत की अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर केवल एक आंकड़े से तय नहीं होती। GDP वृद्धि, रोजगार, महंगाई, आय, उपभोग, निवेश और संपत्ति के वितरण जैसे कई संकेतकों को साथ देखकर ही व्यापक आर्थिक स्थिति को समझा जा सकता है। ऐसे में 7.8 प्रतिशत की GDP वृद्धि जहां आर्थिक गतिविधियों के लिए सकारात्मक संकेत देती है, वहीं बेरोजगारी, कीमतों और असमानता को लेकर उठाए जा रहे सवाल भी नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं।