जालौन ARTO कार्यालय में कथित दलालों की सक्रियता पर सवाल, लाइसेंस के नाम पर 2 से 3 हजार रुपये वसूली के आरोप
अरुण कुमार मिश्रा
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ जालौन
जालौन, उत्तर प्रदेश। जालौन स्थित सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (ARTO) कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के नाम पर कथित बिचौलियों द्वारा आवेदकों से अतिरिक्त रकम वसूलने के आरोप सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि सामान्य ड्राइविंग लाइसेंस के लिए 2,000 रुपये और भारी वाहन का लाइसेंस बनवाने के लिए 3,000 रुपये तक मांगे जाने की शिकायतें हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना शेष है।

मामले को लेकर कार्यालय परिसर में कथित दलालों की भूमिका, लाइसेंस संबंधी कामकाज की पारदर्शिता और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर चर्चा तेज हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आवेदकों से निर्धारित सरकारी शुल्क से अलग पैसे लिए जा रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है और इस गतिविधि पर रोक लगाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?
लाइसेंस बनवाने के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगने के आरोप
परिवहन विभाग का कार्यालय आम नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। यहां लोग दोपहिया, चारपहिया और व्यावसायिक वाहनों से संबंधित लाइसेंस सहित विभिन्न सेवाओं के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में लोगों की अपेक्षा रहती है कि सरकारी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी हो और उन्हें किसी अनधिकृत व्यक्ति के चक्कर न लगाने पड़ें।
जालौन ARTO कार्यालय को लेकर सामने आए आरोपों के अनुसार, कुछ कथित बिचौलियों पर लाइसेंस बनवाने के बदले अतिरिक्त रकम मांगने का आरोप लगाया जा रहा है। चर्चा है कि सामान्य लाइसेंस के लिए करीब 2,000 रुपये और हैवी वाहन के लाइसेंस के लिए 3,000 रुपये तक की मांग की जाती है।
यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह जांच का विषय होगा कि संबंधित रकम किस काम के लिए ली जा रही है। क्या यह राशि किसी अधिकृत सेवा से जुड़ी है या आवेदकों से अनधिकृत तरीके से पैसे मांगे जा रहे हैं? इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष जांच और संबंधित अभिलेखों की पड़ताल के बाद ही सामने आ सकता है।
यह भी आवश्यक है कि सरकारी शुल्क और अन्य वैध भुगतान का स्पष्ट विवरण कार्यालय में प्रदर्शित किया जाए, ताकि लोगों को वास्तविक खर्च की जानकारी मिल सके और वे किसी के बहकावे में आकर अतिरिक्त रकम देने से बच सकें।
डीबीए के कमरा नंबर-6 को लेकर उठे सवाल
कार्यालय परिसर में डीबीए के कमरा नंबर-6 से लाइसेंस संबंधी कामकाज संचालित होने की बात भी चर्चा में है। इस कमरे में किस प्रकार के कार्य किए जाते हैं, वहां कौन-कौन लोग बैठते हैं और उनके पास किस तरह की आधिकारिक जिम्मेदारी है, इन बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
यदि किसी कमरे से आवेदकों के दस्तावेजों या लाइसेंस संबंधी प्रक्रिया में सहायता दी जाती है, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वहां काम करने वाले सभी व्यक्तियों की भूमिका अधिकृत और स्पष्ट हो। किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को सरकारी प्रक्रिया पर अनुचित प्रभाव डालने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
हालांकि, केवल किसी कमरे का उल्लेख होने से वहां अवैध गतिविधि साबित नहीं होती। इसलिए कमरा नंबर-6 से जुड़े आरोपों की जांच तथ्यों, उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित कर्मचारियों के बयान के आधार पर की जानी चाहिए। जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आवेदकों को वहां किस उद्देश्य से भेजा जाता है और भुगतान संबंधी व्यवस्था क्या है।
कुछ दिन पहले SDM के छापे में कर्मचारी नदारद मिलने का मामला
इस पूरे प्रकरण के बीच कुछ दिन पहले SDM द्वारा ARTO कार्यालय में किए गए छापे का मामला भी चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, निरीक्षण के दौरान कई कर्मचारी अनुपस्थित पाए गए थे। इस घटना ने कार्यालय की उपस्थिति व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों की समय पर उपस्थिति और निर्धारित जिम्मेदारियों का निर्वहन जरूरी है। नागरिक अपने जरूरी दस्तावेजों और सरकारी सेवाओं के लिए कार्यालय पहुंचते हैं। ऐसे में यदि संबंधित कर्मचारी उपलब्ध नहीं होते, तो लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है और कामकाज प्रभावित हो सकता है।
SDM के निरीक्षण में कर्मचारियों की अनुपस्थिति से जुड़ी जानकारी की आधिकारिक पुष्टि, निरीक्षण रिपोर्ट और उसके बाद हुई कार्रवाई का विवरण सामने आना महत्वपूर्ण होगा। यह जानना भी जरूरी है कि अनुपस्थित पाए गए कर्मचारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया या नहीं और यदि कोई अनियमितता मिली, तो उसके संबंध में क्या कदम उठाए गए।
हालांकि, कर्मचारियों की अनुपस्थिति और लाइसेंस के नाम पर कथित वसूली के आरोप दो अलग-अलग विषय हैं। इनके बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए प्रमाण आवश्यक हैं। फिर भी, दोनों मामलों को लेकर उठ रहे सवाल कार्यालय की व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही की जांच की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
आखिर किसके संरक्षण में सक्रिय हैं कथित बिचौलिए?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि कार्यालय परिसर में कथित बिचौलिए सक्रिय हैं, तो वे किस हैसियत से काम कर रहे हैं। क्या वे केवल आवेदकों को जानकारी देने का दावा करते हैं, या फिर लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं? क्या उनके खिलाफ पहले भी शिकायतें की गई हैं? इन सभी बिंदुओं पर संबंधित अधिकारियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यह भी जांच का विषय है कि कार्यालय परिसर में अनधिकृत व्यक्तियों की गतिविधियों पर निगरानी के लिए क्या व्यवस्था लागू है। यदि कोई व्यक्ति सरकारी कर्मचारी होने का दावा करके पैसे मांगता है या अधिकारियों से काम कराने के नाम पर रकम वसूलता है, तो उसकी पहचान और भूमिका की जांच की जानी चाहिए।
बिना प्रमाण किसी कर्मचारी, अधिकारी या अन्य व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायतें सामने आने पर उनकी अनदेखी करना भी सही नहीं है। प्रशासन को चाहिए कि वह आरोपों की गंभीरता को देखते हुए तथ्यों की जांच करे और जो भी व्यक्ति दोषी पाया जाए, उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे।
आवेदकों को सरकारी शुल्क की सही जानकारी मिलना जरूरी
लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सबसे पहले निर्धारित शुल्क, आवेदन की प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। कार्यालय में सूचना पट्ट, आधिकारिक वेबसाइट और अन्य अधिकृत माध्यमों से लोगों को बताया जा सकता है कि किस सेवा के लिए कितना शुल्क निर्धारित है।
आवेदकों को यह भी स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि आवेदन कहां जमा करना है, भुगतान किस माध्यम से करना है और प्रक्रिया पूरी होने में किन चरणों से गुजरना पड़ता है। जहां ऑनलाइन आवेदन और डिजिटल भुगतान की सुविधा उपलब्ध है, वहां उसका सही तरीके से उपयोग करने के लिए मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए।
यदि किसी आवेदक से निर्धारित शुल्क से अधिक रकम मांगी जाती है, तो उसे भुगतान का कारण पूछने और अधिकृत माध्यम से शिकायत दर्ज कराने की जानकारी होनी चाहिए। शिकायतों की जांच के लिए जिम्मेदार अधिकारी और संपर्क विवरण भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
इस तरह की व्यवस्था से अनावश्यक बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और आम नागरिकों का सरकारी सेवाओं पर भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
निष्पक्ष जांच और विभागीय जवाबदेही की मांग
जालौन ARTO कार्यालय को लेकर उठे सवालों का समाधान केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच से संभव है। संबंधित प्रशासन को लाइसेंस संबंधी शुल्क, भुगतान के रिकॉर्ड, कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों की भूमिका और कमरा नंबर-6 में संचालित गतिविधियों की पड़ताल करनी चाहिए।
SDM के पूर्व निरीक्षण से संबंधित रिपोर्ट और कार्रवाई की जानकारी भी सार्वजनिक होने से स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है। यदि कथित वसूली के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि जांच में आरोप सही नहीं पाए जाते हैं, तो तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि आम लोगों को बिना अनधिकृत बिचौलियों के सरकारी सेवाएं प्राप्त करने का अवसर मिले। सरकारी कार्यालयों की जिम्मेदारी केवल आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि नागरिकों को नियमों के अनुरूप, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था उपलब्ध कराना भी है।
अब प्रशासन के जवाब का इंतजार
फिलहाल, जालौन ARTO कार्यालय में लाइसेंस के नाम पर 2,000 से 3,000 रुपये तक कथित वसूली, डीबीए के कमरा नंबर-6 से जुड़े सवाल और SDM के निरीक्षण में कर्मचारियों की अनुपस्थिति का मामला चर्चा में है। वसूली के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और ARTO प्रशासन का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना बाकी है।
अब निगाहें संबंधित अधिकारियों पर हैं कि वे इन शिकायतों की जांच के लिए क्या कदम उठाते हैं और आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए कौन-सी व्यवस्था लागू करते हैं। निष्पक्ष जांच, स्पष्ट शुल्क सूची और जवाबदेही तय होने से ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।