पहली बारिश में ही क्षतिग्रस्त हुआ 26 लाख का रपटा पुल, ग्रामीणों ने उठाए निर्माण गुणवत्ता पर सवाल
अरुण कुमार मिश्रा
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ जालौन
कोरीपुरा और रनवां गांव के बीच आवागमन प्रभावित, तकनीकी जांच और कार्रवाई की मांग
जालौन। रनवां और कोरीपुरा गांव के लोगों को बेहतर आवागमन की सुविधा देने के उद्देश्य से मलंगा नाला पर बनाया गया रपटा पुल पहली बारिश के बाद ही क्षतिग्रस्त होने से सवालों के घेरे में आ गया है। करीब 26 लाख रुपये की लागत से तैयार किए गए इस रपटा पुल के

आसपास की मिट्टी पानी के बहाव में बह गई है। कई स्थानों पर गहरा कटाव दिखाई दे रहा है, जबकि पुल के कुछ हिस्सों में टूट-फूट भी सामने आई है। ऐसे में ग्रामीणों को अब इस रास्ते से गुजरने में दुर्घटना की आशंका बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस निर्माण से दोनों गांवों के बीच आवागमन आसान होने और बरसात के दिनों में होने वाली परेशानी से राहत मिलने की उम्मीद थी, वही निर्माण पहली बारिश के बाद ही परेशानी का कारण बन गया है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी समीर से मामले की तकनीकी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जांच में निर्माण कार्य में मानकों की अनदेखी या गुणवत्ता संबंधी खामी सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जानी चाहिए और सरकारी धन की वसूली भी सुनिश्चित की जाए।
नाले के कारण वर्षों से बनी थी आवागमन की समस्या
रनवां गांव से कोरीपुरा की दूरी लगभग एक किलोमीटर है। दोनों गांवों के बीच मलंगा नाला होने के कारण बरसात के मौसम में लोगों की आवाजाही मुश्किल हो जाती थी। पानी बढ़ने पर ग्रामीणों को दूसरे रास्तों का सहारा लेना पड़ता था। इससे विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों और रोजमर्रा के काम से एक गांव से दूसरे गांव जाने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता था।
इसी समस्या को देखते हुए रनवां गांव से आगे मलंगा नाला पर रपटा पुल का निर्माण कराया गया। ग्रामीणों के मुताबिक इस निर्माण पर लगभग 26 लाख रुपये खर्च किए गए। रपटा बनने के बाद दोनों गांवों के बीच सीधा संपर्क बेहतर होने की उम्मीद जगी थी। लोगों को विश्वास था कि बारिश के दौरान भी उन्हें नाला पार करने में पहले जैसी परेशानी नहीं होगी।
निर्माण के समय ही उठे थे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य के दौरान ही उन्होंने काम की गुणवत्ता को लेकर आपत्ति जताई थी। उनका कहना है कि निर्माण में इस्तेमाल की जा रही सामग्री और कार्य की पद्धति को लेकर सवाल उठाए गए थे, लेकिन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
ग्रामीणों के अनुसार ठेकेदार रजनीकांत कुशवाहा द्वारा रपटा पुल का निर्माण कराया गया था। निर्माण पूरा होने के बाद ग्रामीणों ने उम्मीद की थी कि पुल मजबूत होगा और लंबे समय तक उपयोगी रहेगा। हालांकि, बारिश के बाद सामने आई स्थिति ने उनकी चिंताएं बढ़ा दी हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण के समय यदि संबंधित अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर कार्य की गुणवत्ता और तकनीकी मानकों की सही तरीके से जांच की होती तो वर्तमान स्थिति सामने नहीं आती। अब ग्रामीण निर्माण की गुणवत्ता की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने की मांग कर रहे हैं, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
मिट्टी बहने से रास्ते पर गहरे कटाव
रपटा पुल के दोनों तरफ आवागमन के लिए मिट्टी की भराई की गई थी। ग्रामीणों का आरोप है कि इस भराई को पर्याप्त मजबूती नहीं दी गई। बारिश के दौरान पानी का बहाव तेज होने पर पुल के आसपास की मिट्टी कटकर बह गई। इसके चलते रास्ते के कई हिस्सों में गड्ढे और कटाव बन गए हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक कुछ स्थानों पर रास्ते का किनारा इस तरह कमजोर हो गया है कि वहां से गुजरने वाले वाहन चालकों को सावधानी बरतनी पड़ रही है। पैदल यात्रियों के लिए भी स्थिति सहज नहीं है। बारिश के बाद पानी और कीचड़ के कारण परेशानी और बढ़ जाती है।
पुल के स्लैब में भी दिखी क्षति
ग्रामीणों ने केवल आसपास की मिट्टी के कटाव पर ही चिंता नहीं जताई है, बल्कि रपटा पुल के स्लैब में दिखाई दे रही टूट-फूट को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि निर्माण को पूरा हुए ज्यादा समय नहीं हुआ और पहली ही बारिश में पुल के हिस्से क्षतिग्रस्त होने लगे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार पुल के क्षतिग्रस्त हिस्से को देखकर इसकी मजबूती को लेकर आशंका पैदा हो रही है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इसकी मरम्मत और तकनीकी जांच नहीं कराई गई तो आने वाले दिनों में समस्या और गंभीर हो सकती है।
ग्रामीणों ने की जांच और रिकवरी की मांग
रनवां और कोरीपुरा के ग्रामीणों ने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि जांच केवल कागजी स्तर पर न हो, बल्कि मौके पर पहुंचकर निर्माण की स्थिति, इस्तेमाल की गई सामग्री, आधारभूत संरचना और पानी के बहाव को ध्यान में रखते हुए तकनीकी परीक्षण कराया जाए।
रामकरन प्रजापति, तीरथराम, पर्वत सिंह कुशवाहा, रहीश खान, कलू प्रजापति, मानसिंह कुशवाहा, बरनाम सिंह, राजा भइया, दशरथ कुशवाहा, आकाश, मुनेश, वीर प्रताप, रमाकांत और पप्पू प्रजापति समेत अन्य ग्रामीणों ने मांग की है कि यदि जांच में निर्माण कार्य में लापरवाही प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों ने सरकारी धन के इस्तेमाल की भी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि सार्वजनिक धन से तैयार की गई किसी भी सड़क या पुलिया का निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। यदि गुणवत्ता में कमी के कारण निर्माण कम समय में खराब हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।
बरसात में बढ़ सकती है परेशानी
मलंगा नाला पर बने इस रपटा पुल की मौजूदा स्थिति को देखते हुए ग्रामीणों को आगामी बारिश को लेकर भी चिंता है। यदि दोबारा तेज बारिश होती है और नाले में पानी का बहाव बढ़ता है तो पहले से क्षतिग्रस्त हिस्सों को और नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत, किनारों की मजबूती और जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं की गई तो दोनों गांवों के बीच आवागमन फिर प्रभावित हो सकता है। इससे ग्रामीणों को पहले की तरह वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ सकता है।
प्रशासनिक जांच से साफ होगी वास्तविक स्थिति
फिलहाल रपटा पुल के क्षतिग्रस्त होने को लेकर ग्रामीणों की ओर से लगाए गए आरोपों की वास्तविकता तकनीकी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। जांच में यह देखा जाना जरूरी होगा कि निर्माण निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार किया गया था या नहीं, पुल के आसपास की मिट्टी की सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय किए गए थे या नहीं और बारिश के पानी के दबाव को ध्यान में रखकर निर्माण किया गया था या नहीं।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन मामले को गंभीरता से लेते हुए मौके का निरीक्षण कराएगा और आवश्यक कार्रवाई करेगा। उनका कहना है कि पुल की मरम्मत के साथ-साथ उसकी वास्तविक मजबूती सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि रनवां और कोरीपुरा के लोगों को सुरक्षित और स्थायी आवागमन की सुविधा मिल सके।
26 लाख रुपये की लागत से तैयार इस रपटा पुल का पहली बारिश में क्षतिग्रस्त होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उद्देश्य ग्रामीणों की वर्षों पुरानी आवागमन की समस्या का स्थायी समाधान करना था। अब ग्रामीणों की निगाहें प्रशासनिक जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।