जातीय जनगणना पर कांग्रेस का सरकार पर हमला, जयराम रमेश बोले- 2027 की जनगणना में व्यापक जाति गणना जरूरी

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नई दिल्ली। देश में प्रस्तावित 2027 की जनगणना को लेकर जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की ओर से जारी जनगणना संबंधी तैयारियों पर सवाल उठाते हुए व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से जातियों की गणना कराने की मांग की है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई हैं।

जयराम रमेश के मुताबिक, जातीय जनगणना केवल आंकड़े जुटाने की कवायद नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और आरक्षण से जुड़ी नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक आधार प्रदान कर सकती है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार द्वारा 2027 की जनगणना के लिए प्रस्तावित प्रारूप में जाति से संबंधित व्यवस्था व्यापक सामाजिक वास्तविकताओं को सामने लाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

प्रधानमंत्री को कई बार पत्र भेजने का दावा

कांग्रेस नेता ने बताया कि विपक्ष की ओर से जातीय जनगणना को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार पत्र लिखे जाते रहे हैं। उनके अनुसार, विपक्ष के नेताओं ने इससे पहले 2023 और 2025 में भी सरकार के सामने व्यापक जातीय जनगणना की मांग रखी थी।

जयराम रमेश ने बताया कि 20 अप्रैल 2026 को लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेताओं की ओर से प्रधानमंत्री को 21 पन्नों का विस्तृत पत्र भेजा गया। इस पत्र में जातीय जनगणना की आवश्यकता, इसकी संभावित प्रक्रिया और सामाजिक न्याय से जुड़े विभिन्न पहलुओं को सामने रखा गया।

कांग्रेस का कहना है कि लंबे समय से इस विषय को उठाए जाने के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से विपक्ष की मांगों पर अपेक्षित स्तर पर चर्चा नहीं हुई। पार्टी अब चाहती है कि जनगणना की अंतिम प्रक्रिया शुरू होने से पहले राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जाए।

14 अगस्त की अधिसूचना पर कांग्रेस की आपत्ति

कांग्रेस ने 14 अगस्त 2026 को 2027 की जनगणना को लेकर जारी सरकारी अधिसूचना के प्रारूप पर भी सवाल उठाया है। पार्टी की मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर है कि लगभग 40 आबादी संबंधी सवालों के बीच जाति को लेकर केवल एक सवाल रखने की योजना पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

कांग्रेस का तर्क है कि भारत जैसे सामाजिक रूप से विविध देश में जातीय संरचना को समझने के लिए केवल औपचारिक रूप से एक प्रश्न जोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी चाहती है कि जनगणना की प्रक्रिया इस तरह तैयार की जाए जिससे विभिन्न सामाजिक समूहों की वास्तविक स्थिति का विश्वसनीय और विस्तृत आंकड़ा सामने आ सके।

जयराम रमेश ने इस व्यवस्था को लेकर सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाया। कांग्रेस के अनुसार, यदि जातीय जनगणना को सीमित प्रारूप में किया गया तो इससे सामाजिक संरचना की वास्तविक तस्वीर सामने आने के बजाय अधूरी जानकारी मिल सकती है।

बिहार और तेलंगाना के मॉडल का हवाला

कांग्रेस ने अपनी मांग के समर्थन में बिहार और तेलंगाना में किए गए जाति संबंधी सर्वेक्षणों का उदाहरण दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इन राज्यों में अपनाई गई प्रक्रियाओं से यह साबित होता है कि बड़े स्तर पर सामाजिक और जातीय आंकड़े एकत्र किए जा सकते हैं।

बिहार में 2023 में कराए गए जाति आधारित सर्वेक्षण और तेलंगाना में 2025 में अपनाई गई प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कांग्रेस ने केंद्र से इसी तरह की व्यापक पद्धति पर विचार करने की मांग की है।

पार्टी का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास इस तरह के बड़े पैमाने के आंकड़े जुटाने के लिए प्रशासनिक ढांचा, तकनीकी क्षमता और विशेषज्ञता पहले से मौजूद है। ऐसे में कांग्रेस के अनुसार चुनौती क्षमता की नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकता की है।

सामाजिक न्याय और आरक्षण से जुड़ा मुद्दा

जातीय जनगणना की मांग को कांग्रेस ने सीधे सामाजिक न्याय की नीतियों से जोड़ा है। पार्टी का मानना है कि सरकारी योजनाओं, प्रतिनिधित्व और आरक्षण से संबंधित नीतियों को प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न सामाजिक समूहों की वास्तविक जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भरोसेमंद डेटा आवश्यक है।

भारत में आरक्षण व्यवस्था लंबे समय से सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन से जुड़े सवालों के साथ जुड़ी रही है। ऐसे में जातीय आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बहस लगातार तेज होती रही है।

कांग्रेस का तर्क है कि जब तक देश के अलग-अलग सामाजिक समूहों की जनसंख्या और उनकी परिस्थितियों का पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं होगा, तब तक सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों की समीक्षा और उनका प्रभावी क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।

फरवरी 2027 से पहले बदलाव की मांग

कांग्रेस ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि देशव्यापी जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने से पहले मौजूदा पद्धति की समीक्षा की जाए। पार्टी चाहती है कि फरवरी 2027 में प्रस्तावित राष्ट्रीय प्रक्रिया शुरू होने से पहले सभी राजनीतिक पक्षों और संबंधित विशेषज्ञों के साथ बैठक आयोजित की जाए।

जयराम रमेश के मुताबिक, ऐसी बैठक में जनगणना की तकनीकी संरचना, जातीय वर्गीकरण, डेटा संग्रह की प्रक्रिया और आंकड़ों की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। कांग्रेस का मानना है कि एक बार जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद उसमें बड़े बदलाव करना कठिन हो सकता है, इसलिए तैयारी के स्तर पर ही आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए।

सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव

जातीय जनगणना का मुद्दा आने वाले समय में केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है। कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ रही है, जबकि सरकार की जनगणना संबंधी वास्तविक कार्यप्रणाली और अंतिम प्रारूप को लेकर आगे होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण होगी।

इस मुद्दे की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश में अलग-अलग सामाजिक समूह अपनी जनसंख्या, हिस्सेदारी और सरकारी अवसरों में प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से आंकड़ों की मांग करते रहे हैं।

कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों के बाद अब निगाहें केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर हैं। यदि सरकार विपक्ष की मांगों पर चर्चा के लिए राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों को साथ लेकर आगे बढ़ती है तो इससे जनगणना प्रक्रिया को लेकर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश हो सकती है।

आंकड़ों की विश्वसनीयता पर रहेगा जोर

जातीय जनगणना के मामले में केवल आंकड़े जुटाना ही पर्याप्त नहीं होगा। उनकी परिभाषा, वर्गीकरण, सत्यापन और सार्वजनिक उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। अलग-अलग क्षेत्रों में जातियों के नाम और सामाजिक पहचान अलग रूपों में दर्ज होने की संभावना रहती है। इसलिए एक समान और स्पष्ट प्रक्रिया तैयार करना बड़ी प्रशासनिक चुनौती हो सकती है।

कांग्रेस इसी वजह से पहले से विस्तृत तैयारी और विशेषज्ञों की भागीदारी की मांग कर रही है। पार्टी का कहना है कि जनगणना से प्राप्त आंकड़े भविष्य की नीतियों के लिए आधार बन सकते हैं, इसलिए डेटा संग्रह की प्रक्रिया पारदर्शी और वैज्ञानिक होनी चाहिए।

निष्कर्ष

2027 की जनगणना से पहले जातीय जनगणना को लेकर राजनीतिक बहस अब और गहराने के संकेत हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार से मौजूदा प्रारूप पर पुनर्विचार करने और बिहार तथा तेलंगाना में अपनाई गई व्यापक पद्धतियों से सीख लेने की अपील की है।

कांग्रेस का स्पष्ट मत है कि जातीय आंकड़ों को सामाजिक न्याय, आरक्षण और समान अवसर से जुड़ी नीतियों के लिए मजबूत आधार बनाया जाना चाहिए। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से इस मांग पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण रहेगा।

फरवरी 2027 में देशव्यापी जनगणना प्रक्रिया शुरू होने से पहले राजनीतिक दलों, प्रशासन और विशेषज्ञों के बीच सहमति बनाने की कोशिश इस पूरे मुद्दे की दिशा तय कर सकती है। फिलहाल जातीय जनगणना केवल जनसंख्या आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि भारत में सामाजिक प्रतिनिधित्व और नीतिगत प्राथमिकताओं से जुड़ी एक बड़ी राष्ट्रीय बहस बन चुकी है।

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