कानपुर देहात जिला अस्पताल की व्यवस्था पर पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी ने उठाए सवाल, मरीजों की लंबी कतार को लेकर जताई नाराजगी

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अमरेश त्रिपाठी

हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात

कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश। सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचने वाले मरीजों को बेहतर और समयबद्ध स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का उद्देश्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। इसके बावजूद कई स्थानों पर पंजीकरण, ओपीडी और चिकित्सकीय परामर्श के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। कानपुर देहात के अकबरपुर स्थित स्वायत्त राज्य चिकित्सा महाविद्यालय से जुड़ा जिला अस्पताल भी अब इसी तरह की व्यवस्था को लेकर चर्चा में है। अस्पताल में मरीजों की लंबी कतार और पर्चा बनवाने में लगने वाले समय को लेकर पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी ने सवाल उठाए हैं।

पूर्व सांसद ने अस्पताल में आम नागरिक की तरह लाइन में खड़े होकर पर्चा बनवाने की प्रक्रिया को देखा। इस दौरान उन्होंने अस्पताल आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को होने वाली परेशानियों को करीब से समझने का प्रयास किया। उनका कहना है कि सरकारी अस्पताल में आने वाला व्यक्ति सामान्यतः अपनी मजबूरी के कारण वहां पहुंचता है। ऐसे में उसे इलाज से पहले ही घंटों तक अलग-अलग प्रक्रियाओं के लिए इंतजार करना पड़े, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

आम मरीज की तरह लाइन में खड़े हुए पूर्व सांसद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी जब स्वायत्त राज्य चिकित्सा महाविद्यालय, अकबरपुर पहुंचे तो उन्होंने छात्रों के साथ अस्पताल की व्यवस्था का निरीक्षण किया। इसी दौरान उन्होंने पर्चा बनवाने के लिए आम मरीजों की तरह लाइन में खड़े होकर पूरी प्रक्रिया को समझा।

इस दौरान उन्होंने देखा कि मरीजों को पंजीकरण के लिए काफी देर तक कतार में इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले लोगों के लिए यह स्थिति परेशानी का कारण बन रही थी। मरीजों में बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोग भी शामिल होते हैं। ऐसे लोगों के लिए लंबी कतार में खड़े रहना अतिरिक्त कठिनाई पैदा कर सकता है।

पूर्व सांसद ने इस स्थिति को केवल एक व्यक्ति की परेशानी के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा व्यापक विषय बताया।

“यह किसी व्यक्ति विशेष की शिकायत नहीं”

पूर्व सांसद की ओर से सामने रखी गई बातों में स्पष्ट किया गया कि मुद्दा किसी एक कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत शिकायत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था को लेकर है, जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के पास होती है।

उनका तर्क है कि सरकारी अस्पताल में आने वाला मरीज अपनी बीमारी, सीमित संसाधनों और समय की मजबूरी के बीच उपचार के लिए पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति को यदि पर्चा बनवाने और डॉक्टर तक पहुंचने के लिए अत्यधिक समय इंतजार करना पड़े, तो उसकी परेशानी और बढ़ जाती है।

उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि समस्या को व्यक्तिगत शिकायत के बजाय व्यवस्था में सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि अस्पतालों की व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति जानने के लिए अधिकारियों को समय-समय पर मौके पर जाकर निरीक्षण करना चाहिए।

पंजीकरण और ओपीडी व्यवस्था की समीक्षा की मांग

पूर्व सांसद ने अस्पताल में पंजीकरण व्यवस्था और ओपीडी संचालन को लेकर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, यदि मरीजों को केवल पर्चा प्राप्त करने के लिए लंबी कतार में खड़ा होना पड़ता है और इसके बाद चिकित्सक से मिलने के लिए अलग इंतजार करना पड़ता है, तो पूरी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की जरूरत है।

इसके लिए अस्पताल प्रशासन डिजिटल पंजीकरण, पर्याप्त पंजीकरण काउंटर, टोकन व्यवस्था और मरीजों की भीड़ के अनुसार अतिरिक्त काउंटर जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। जहां डिजिटल सुविधा उपलब्ध है, वहां लोगों को उसका इस्तेमाल करने में सहायता देने के लिए हेल्प डेस्क भी उपयोगी हो सकती है।

हालांकि, डिजिटल व्यवस्था लागू करना ही पर्याप्त नहीं होगा। सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज आते हैं जिन्हें तकनीकी प्रक्रियाओं की जानकारी कम होती है। इसलिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों विकल्पों को प्रभावी तरीके से संचालित करना जरूरी है।

मरीज के इंतजार के समय का हो वास्तविक आकलन

पूर्व सांसद ने मरीजों के प्रतीक्षा समय की वास्तविक समीक्षा किए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। अक्सर किसी अस्पताल की व्यवस्था का आकलन केवल उपलब्ध काउंटर या कर्मचारियों की संख्या से किया जाता है, लेकिन मरीज को वास्तव में कितना समय लाइन में खड़ा होना पड़ता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी मरीज को अस्पताल पहुंचने के बाद पंजीकरण, जांच, ओपीडी और चिकित्सकीय परामर्श के लिए कई चरणों में लंबा इंतजार करना पड़े, तो इससे अस्पताल की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसलिए प्रशासन को अलग-अलग चरणों में लगने वाले समय का रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए।

ऐसी समीक्षा के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि सबसे अधिक भीड़ किस समय होती है, किस काउंटर पर दबाव अधिक रहता है और किस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हो रही है।

मरीजों के लिए व्यवस्था जमीन पर दिखनी चाहिए

पूर्व सांसद का कहना है कि जनता को केवल आश्वासन देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अस्पताल में आने वाले मरीजों को व्यवस्था में वास्तविक सुधार दिखाई देना चाहिए। उनके मुताबिक, पर्चा बनवाने से लेकर चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करने तक की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और सुविधाजनक बनाया जाना चाहिए।

अस्पताल में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी जरूरत के कारण वहां पहुंचता है। किसी के परिवार का सदस्य बीमार होता है, कोई स्वयं उपचार के लिए आता है और कई लोग आर्थिक कारणों से सरकारी अस्पताल को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार और सुव्यवस्थित सेवाएं बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

स्थानीय अधिकारियों से जवाबदेही की अपेक्षा

इस मामले में स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि निरीक्षण के दौरान मरीजों को वास्तव में लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, तो संबंधित अधिकारियों को इसके कारणों की पहचान करनी चाहिए।

जरूरत पड़ने पर पंजीकरण काउंटर बढ़ाना, कर्मचारियों की ड्यूटी का बेहतर प्रबंधन करना, भीड़ के समय अतिरिक्त व्यवस्था करना और टोकन प्रणाली को मजबूत करना जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि व्यवस्था लागू होने के बाद उसका नियमित निरीक्षण किया जाए।

केवल नई व्यवस्था घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। उसका संचालन सही तरीके से हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी भी जरूरी है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में संवेदनशीलता सबसे जरूरी

सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवा केवल चिकित्सा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होती। अस्पताल में पहुंचने के बाद मरीज को किस तरह की सुविधा मिलती है, कितना इंतजार करना पड़ता है और उसे सही जानकारी कितनी आसानी से मिलती है—ये सभी बातें स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता का हिस्सा हैं।

कानपुर देहात के जिला अस्पताल को लेकर उठाया गया यह मुद्दा इसी व्यापक सवाल की ओर संकेत करता है। यदि पंजीकरण जैसी शुरुआती प्रक्रिया ही लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है, तो प्रशासन को इसे गंभीरता से लेकर समाधान तलाशना चाहिए।

पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी ने अपने संदेश में यह भी संकेत दिया कि जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने रखना केवल अधिकार नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। उनका जोर किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के बजाय व्यवस्था में सुधार पर है।

निष्कर्ष

कानपुर देहात जिला अस्पताल में मरीजों की कतार और पर्चा बनवाने में लगने वाले समय को लेकर उठे सवाल ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी स्थिति पर चर्चा को फिर सामने ला दिया है। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासन शिकायत या आलोचना को केवल विरोध के रूप में न देखकर सुधार के अवसर के तौर पर देखे।

यदि पंजीकरण और ओपीडी व्यवस्था की नियमित समीक्षा हो, मरीजों के वास्तविक प्रतीक्षा समय का आकलन किया जाए और जरूरत के अनुसार मानव संसाधन तथा काउंटर बढ़ाए जाएं, तो अस्पताल आने वाले लोगों की परेशानी काफी कम की जा सकती है।

आखिरकार अस्पताल की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितने डॉक्टर या कितने विभाग मौजूद हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर पंजीकरण, चिकित्सकीय परामर्श और उपचार मिल सके। मरीज अस्पताल में केवल एक रजिस्ट्रेशन नंबर लेकर नहीं आता, बल्कि अपने परिवार की उम्मीद लेकर पहुंचता है। इसलिए उस उम्मीद का सम्मान करना किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

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कानपुर देहात जिला अस्पताल की व्यवस्था पर पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी ने उठाए सवाल, मरीजों की लंबी कतार को लेकर जताई नाराजगी

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:अक्टूबर 7, 2026

अमरेश त्रिपाठी

हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात

कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश। सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचने वाले मरीजों को बेहतर और समयबद्ध स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का उद्देश्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। इसके बावजूद कई स्थानों पर पंजीकरण, ओपीडी और चिकित्सकीय परामर्श के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। कानपुर देहात के अकबरपुर स्थित स्वायत्त राज्य चिकित्सा महाविद्यालय से जुड़ा जिला अस्पताल भी अब इसी तरह की व्यवस्था को लेकर चर्चा में है। अस्पताल में मरीजों की लंबी कतार और पर्चा बनवाने में लगने वाले समय को लेकर पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी ने सवाल उठाए हैं।

पूर्व सांसद ने अस्पताल में आम नागरिक की तरह लाइन में खड़े होकर पर्चा बनवाने की प्रक्रिया को देखा। इस दौरान उन्होंने अस्पताल आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को होने वाली परेशानियों को करीब से समझने का प्रयास किया। उनका कहना है कि सरकारी अस्पताल में आने वाला व्यक्ति सामान्यतः अपनी मजबूरी के कारण वहां पहुंचता है। ऐसे में उसे इलाज से पहले ही घंटों तक अलग-अलग प्रक्रियाओं के लिए इंतजार करना पड़े, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

आम मरीज की तरह लाइन में खड़े हुए पूर्व सांसद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी जब स्वायत्त राज्य चिकित्सा महाविद्यालय, अकबरपुर पहुंचे तो उन्होंने छात्रों के साथ अस्पताल की व्यवस्था का निरीक्षण किया। इसी दौरान उन्होंने पर्चा बनवाने के लिए आम मरीजों की तरह लाइन में खड़े होकर पूरी प्रक्रिया को समझा।

इस दौरान उन्होंने देखा कि मरीजों को पंजीकरण के लिए काफी देर तक कतार में इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले लोगों के लिए यह स्थिति परेशानी का कारण बन रही थी। मरीजों में बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोग भी शामिल होते हैं। ऐसे लोगों के लिए लंबी कतार में खड़े रहना अतिरिक्त कठिनाई पैदा कर सकता है।

पूर्व सांसद ने इस स्थिति को केवल एक व्यक्ति की परेशानी के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा व्यापक विषय बताया।

“यह किसी व्यक्ति विशेष की शिकायत नहीं”

पूर्व सांसद की ओर से सामने रखी गई बातों में स्पष्ट किया गया कि मुद्दा किसी एक कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत शिकायत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था को लेकर है, जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के पास होती है।

उनका तर्क है कि सरकारी अस्पताल में आने वाला मरीज अपनी बीमारी, सीमित संसाधनों और समय की मजबूरी के बीच उपचार के लिए पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति को यदि पर्चा बनवाने और डॉक्टर तक पहुंचने के लिए अत्यधिक समय इंतजार करना पड़े, तो उसकी परेशानी और बढ़ जाती है।

उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि समस्या को व्यक्तिगत शिकायत के बजाय व्यवस्था में सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि अस्पतालों की व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति जानने के लिए अधिकारियों को समय-समय पर मौके पर जाकर निरीक्षण करना चाहिए।

पंजीकरण और ओपीडी व्यवस्था की समीक्षा की मांग

पूर्व सांसद ने अस्पताल में पंजीकरण व्यवस्था और ओपीडी संचालन को लेकर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, यदि मरीजों को केवल पर्चा प्राप्त करने के लिए लंबी कतार में खड़ा होना पड़ता है और इसके बाद चिकित्सक से मिलने के लिए अलग इंतजार करना पड़ता है, तो पूरी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की जरूरत है।

इसके लिए अस्पताल प्रशासन डिजिटल पंजीकरण, पर्याप्त पंजीकरण काउंटर, टोकन व्यवस्था और मरीजों की भीड़ के अनुसार अतिरिक्त काउंटर जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। जहां डिजिटल सुविधा उपलब्ध है, वहां लोगों को उसका इस्तेमाल करने में सहायता देने के लिए हेल्प डेस्क भी उपयोगी हो सकती है।

हालांकि, डिजिटल व्यवस्था लागू करना ही पर्याप्त नहीं होगा। सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज आते हैं जिन्हें तकनीकी प्रक्रियाओं की जानकारी कम होती है। इसलिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों विकल्पों को प्रभावी तरीके से संचालित करना जरूरी है।

मरीज के इंतजार के समय का हो वास्तविक आकलन

पूर्व सांसद ने मरीजों के प्रतीक्षा समय की वास्तविक समीक्षा किए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। अक्सर किसी अस्पताल की व्यवस्था का आकलन केवल उपलब्ध काउंटर या कर्मचारियों की संख्या से किया जाता है, लेकिन मरीज को वास्तव में कितना समय लाइन में खड़ा होना पड़ता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी मरीज को अस्पताल पहुंचने के बाद पंजीकरण, जांच, ओपीडी और चिकित्सकीय परामर्श के लिए कई चरणों में लंबा इंतजार करना पड़े, तो इससे अस्पताल की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसलिए प्रशासन को अलग-अलग चरणों में लगने वाले समय का रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए।

ऐसी समीक्षा के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि सबसे अधिक भीड़ किस समय होती है, किस काउंटर पर दबाव अधिक रहता है और किस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हो रही है।

मरीजों के लिए व्यवस्था जमीन पर दिखनी चाहिए

पूर्व सांसद का कहना है कि जनता को केवल आश्वासन देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अस्पताल में आने वाले मरीजों को व्यवस्था में वास्तविक सुधार दिखाई देना चाहिए। उनके मुताबिक, पर्चा बनवाने से लेकर चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करने तक की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और सुविधाजनक बनाया जाना चाहिए।

अस्पताल में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी जरूरत के कारण वहां पहुंचता है। किसी के परिवार का सदस्य बीमार होता है, कोई स्वयं उपचार के लिए आता है और कई लोग आर्थिक कारणों से सरकारी अस्पताल को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार और सुव्यवस्थित सेवाएं बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

स्थानीय अधिकारियों से जवाबदेही की अपेक्षा

इस मामले में स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि निरीक्षण के दौरान मरीजों को वास्तव में लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, तो संबंधित अधिकारियों को इसके कारणों की पहचान करनी चाहिए।

जरूरत पड़ने पर पंजीकरण काउंटर बढ़ाना, कर्मचारियों की ड्यूटी का बेहतर प्रबंधन करना, भीड़ के समय अतिरिक्त व्यवस्था करना और टोकन प्रणाली को मजबूत करना जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि व्यवस्था लागू होने के बाद उसका नियमित निरीक्षण किया जाए।

केवल नई व्यवस्था घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। उसका संचालन सही तरीके से हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी भी जरूरी है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में संवेदनशीलता सबसे जरूरी

सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवा केवल चिकित्सा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होती। अस्पताल में पहुंचने के बाद मरीज को किस तरह की सुविधा मिलती है, कितना इंतजार करना पड़ता है और उसे सही जानकारी कितनी आसानी से मिलती है—ये सभी बातें स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता का हिस्सा हैं।

कानपुर देहात के जिला अस्पताल को लेकर उठाया गया यह मुद्दा इसी व्यापक सवाल की ओर संकेत करता है। यदि पंजीकरण जैसी शुरुआती प्रक्रिया ही लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है, तो प्रशासन को इसे गंभीरता से लेकर समाधान तलाशना चाहिए।

पूर्व सांसद अनिल शुक्ल वारसी ने अपने संदेश में यह भी संकेत दिया कि जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने रखना केवल अधिकार नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। उनका जोर किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के बजाय व्यवस्था में सुधार पर है।

निष्कर्ष

कानपुर देहात जिला अस्पताल में मरीजों की कतार और पर्चा बनवाने में लगने वाले समय को लेकर उठे सवाल ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी स्थिति पर चर्चा को फिर सामने ला दिया है। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासन शिकायत या आलोचना को केवल विरोध के रूप में न देखकर सुधार के अवसर के तौर पर देखे।

यदि पंजीकरण और ओपीडी व्यवस्था की नियमित समीक्षा हो, मरीजों के वास्तविक प्रतीक्षा समय का आकलन किया जाए और जरूरत के अनुसार मानव संसाधन तथा काउंटर बढ़ाए जाएं, तो अस्पताल आने वाले लोगों की परेशानी काफी कम की जा सकती है।

आखिरकार अस्पताल की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितने डॉक्टर या कितने विभाग मौजूद हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर पंजीकरण, चिकित्सकीय परामर्श और उपचार मिल सके। मरीज अस्पताल में केवल एक रजिस्ट्रेशन नंबर लेकर नहीं आता, बल्कि अपने परिवार की उम्मीद लेकर पहुंचता है। इसलिए उस उम्मीद का सम्मान करना किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।